संपादकीय
राम के धाम से योगी की चुनाव प्रचार यात्रा : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 15/11/2017 12:17:40 PM
राम के धाम से योगी की चुनाव प्रचार यात्रा : सियाराम पांडेय ‘शांत’

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि राम के बिना भारत में कोई काम नहीं हो सकता क्योंकि राम हमारी आस्था के प्रतीक हैं। भारत की संपूर्ण आस्था के केंद्र बिंदु हैं। जाहिर है, उनके यह विचार उनके विरोधियों को रास नहीं आएंगे और वह योगी के राम को राजनीति के कठघरे में खड़ा जरूर करेंगे। योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव के प्रचार का आगाज जय श्रीराम से किया तो अपनी वाणी को विराम भी उन्होंने श्रीराम के उद्घोष से ही किया। योगी संत हैं। योगी हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो राम नाम की अलख जगाना उनका काम है। उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। इस पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन बतौर मुख्यमंत्री जब वे यह कहते हैं कि राम के बिना इस देश में कोई काम नहीं हो सकता तो वे बहुत बड़े आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन कर रहे होते हैं लेकिन इस पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। 

 

जो बात योगी आदित्यनाथ आज कह रहे हैं, उसे गोस्वामी तुलसीदास बहुत पहले कह गए हैं। ‘उमा दारु मरकट की नाईं। सबहिं नचावत राम गोसाईं।’ अर्थात भगवान राम पूरी दुनिया को कठपुतली की तरह नचा रहे हैं। इसी बात को अन्यत्र कहा गया है कि राम के बिना कुछ नहीं होता। ‘यस्याज्ञया वायवो वान्ति लोके ज्वलत्यग्नि सविता यातु तप्यन। शीतांशु खे तारका संग्रहश्च प्रवर्तंन्ते निशिदिनं प्रपद्ये। यस्य श्वासात सर्व धात्री धरित्री देवो वर्षति अंबुकालः प्रमाता। मेरुमध्ये भुवनानां च ईश तमीशानं विश्वरूपं नमामि।’ अर्थात जिसकी आज्ञा से संसार में वायु बहती है। अग्नि जलती है। सूर्य तपता है। ताराओं का समूह चमकता है। जिसकी श्वास से धरती सबको धारण करती हैै, बादल बरसते हैं। उस विश्वरूप ईश्वर को प्रणाम है। भारतीय संस्कृति में राम का स्थान अहम है। आत्मा को भी राम कहा गया है। राम विश्वरूप है। उनके बारे में कहा गया है कि राम से बड़ा तो उनका नाम है। ‘राम सकल नामन्ह ते अधिका। ’ इससे आगे बढ़े तो ‘राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।’ राम नाम इस देश का संबल है। तभी तो लोग सहज ही कहते हैं कि वही होगा जो राम चाहेंगे। ‘ होइहैं सोई जो राम रचि राखा।’ मतलब राम पर लोगों का विश्वास बहुत पुराना है। योगी तो बस इस विश्वास परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उस पर अपनी सहमति जता रहे हैं। 

 

राम घट-घट व्यापी हैं। यह पूरा संसार ही उसकी इच्छा का विस्तार है लेकिन राजनीति में धर्म तलाशने वालों के लिए योगी आदित्यनाथ के बयान में मसाला जरूर मिल गया होगा। विपक्ष का तर्क हो सकता है कि भाजपा के पास राम के अलावा कोई मुद्दा नहीं है। पहली बात तो यह कि राम कोई मुद्दा नहीं हैं। वे जन-गण-मन की आस्था के बिंदु हैं। आस्था तर्क-वितर्क का विषय नहीं है। वह विश्वास का विषय है। योगी आदित्यनाथ 16 नगर निगमों क्षेत्रों में से कहीं से भी अपने चुनाव अभियान की शुरुआत कर सकते थे लेकिन उन्होंने अयोध्या को ही चुना। अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। वह इसलिए भी अहम है कि अयोध्या विवाद को सुलझााने के लिए अहम प्रयास हो रहे हैं। वे 27 नवंबर तक प्रदेश के पूर्वांचल, अवध, ब्रज, काशी, पश्चिम, कानपुर क्षेत्र के विभिन्न जिलों में धुआंधार रैली और जनसभाएं करने वाले हैं। योगी ने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत राम की अयोध्या से की है। राम के नाम से की है। प्रचार अभियान के तुरंत बाद उन्होंने हनुमानगढ़ी में रामदूत हनुमान जी के दर्शन और पूजन किए हैं। मंगलवार से की है। मतलब ‘मंगलामुखी सदा सुखी।’ भगवान राम के बारे में कहा गया है कि ‘भाव, कुभाव अनख आलसहूं। नाम जपत मंगल दिसि दसहूं।’ राम का नाम चाहे जैसे भी लें, उससे व्यक्ति का दसों दिशाओं में मंगल होता है।

 

उदाहरण के लिए सुंदरकांड के एक प्रसंग को लिया जा सकता है। हनुमान जी ने भगवान राम का नाम लेकर लंका में प्रवेश किया था और सारी परिस्थितियां उनके अनुकूल हो गई थीं। ‘प्रविसि नगर कीजै सब काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा। गरल सुधा रिपु करय मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।’ सर्पों की माता सुरसा का विष भी उनके लिए अमृत हो गया। रावण का भाई सुग्रीव मित्र हो गया। समुद्र लांघना गाय के खुर से बने गड्ढे के समान आसान हो गया और लंका दहन की आग भी उनके लिए ठंडी हो गई। इस नाम का ही प्रभाव था कि उन्हें जानकी से अजर- अमर होने का वरदान मिल गया। ‘ अजर-अमर गुणनिधि सुत होहू।’ इसके विपरीत रावण के साथ क्या हुआ। ‘राम विमुख संपति प्रभुताई। जाई रही पाई बिनु पाई।’ रावण के एक लाख पुत्र, सवा लाख नाती थे, सब मारे गए। ‘ इक लख पूत, सवा लख नाती। ता रावन घर दिया न बाती।’ 

 

विचारणीय है कि राम क्या है? भगवान क्या है। रमंतेति रामः अर्थात जो सबमें बसता है वह राम है। तभी तो कबीर ने इस बात को इन शब्दों में कहा- ‘ एक राम घट-घट में बोला। एक राम दशरथ गृह डोला। एक राम का जगत पसारा। एक राम सब जग से न्यारा।’ और भगवान तो इसका अर्थ है आदर्शों का समुच्चय। जो आदर्शों और सिद्धांतों का आदमी है। वही राम का आदमी है। वही भगवान का आदमी है और सीधे-सपाट शब्दों में कहूं तो वही काम का आदमी है। नीति भी कहती है कि जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं। इस लिहाज से योगी आदित्यनाथ के विचार बहुत प्रासंगिक हैं कि राम के बिना भारत का काम नहीं चलता। वणिक तौल की शुरुआत करता है तो रामो राम से करता है और तौल का समापन वह संख्या के साथ राम जोड़कर करता है। व्यक्ति के जीवन की अंतिम यात्रा भी राम नाम के साथ ही पूरी होती है। हनुमान जी तो अक्सर कहा करते थे कि ‘राम काज कीन्हें बिनु मोहिं कहां विश्राम।’ राजनेताओं के लिए इस देश की जनता ही राम है। वे जनता के हनुमान हैं। मुख्यमंत्री ने नगर निकाय चुनाव में इस बावत इशारा कर दिया है। 

 

योगी आदित्यनाथ ही नहीं, पूरी भाजपा को भगवान राम पर अटूट विश्वास है। जब यह पार्टी दो सांसदों की थी तब भी और जब लोकसभा में सर्वाधिक सदस्य संख्या के साथ विराजित है, तब भी उसने भगवान राम पर से अपना विश्वास नहीं खोया है। योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डाॅ. महेंद्रनाथ पांडेय के साथ अयोध्या, गोंडा और बहराइच में सभा की। जिस राम का उलटा नाम जपकर बाल्मीकि ऋषि शुद्ध हो गए। ‘जानि आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।’ उसी राम नाम के सहारे भाजपा नगर निकाय चुनाव की बैतरणी पार करने को बेताब है। योगी आदित्यनाथ ने तो यहां तक कहा था कि अयोध्या में दीपावली मनाई है। निकाय चुनाव जीतने के बाद पूरे प्रदेश में दीपावली मनाएंगे। उनका उत्साह और मतदाताओं को प्रेरित करने की यह भावना भाजपा को बल प्रदान करती है। यह सच है कि निकाय चुनाव के लिए जारी महासंग्राम में भाजपा से भिड़ने को कांग्रेस, सपा, बसपा और अपना दल की सेनाएं भी सज्ज हो गई हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में शामिल ओमप्रकाश राजभर की पार्टी भी ताल ठोंक रही है। कुल मिलाकर चुनाव दिनों दिन पेंचीदा होता जा रहा है। भाजपा जहां नगर निकाय चुनाव को अपने सात माह की उपलब्धियों का लिटमस टेस्ट मान रही है, वहीं विपक्ष उस पर सरेआम वादाखिलाफी के आरोप लगा रहा है। अखिलेश यादव ने तो भाजपा के विजय संकल्पपत्र को छल पत्र तक कह दिया है। इससे यह तो पता चलता है कि भाजपा द्वारा बनाई जा रही विश्वास की दीवार पर पिक्ष निरंतर विरोध के हथौड़े बरसा रहा है और वहां संशय के कीड़े छोड़ रहा है। जो कुलबुलाकर आम मतदाता को दिग्भ्रमित करने का काम कर रहे हैं। लेकिन भाजपा का विश्वास राम पर है। अपने काम पर है। वह विकास का वादा ही नहीं कर रही है, काम भी कर रही है। हर बेघर गरीब शहरी को आवास देने का वादा कर भाजपा ने मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की बड़ी कोशिश की है। भ्रष्टाचार मामलों में निरंतर कार्रवाई से भी विपक्ष तिलमिलाया हुआ है। ऐसे में जनता को वह बता रहा है कि भाजपा ने अपने पहले चुनावी वादे ही पूरे नहीं किए हैं। अब वह नए वादे और लेकर आ गई है।

 

जनता भी जानती है कि जब हम विकास की सोचते हैं तो हर बात एक झटके में दिमाग में नहीं आती। धीरे-धीरे आती है। अच्छे विचार जब भी आएं, उनका स्वागत किया जाना चाहिए। उन पर अमल किया जाना चाहिए और अगर भाजपा के लोग इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो इसमें हर्ज क्या है? अखिलेश की कृष्ण भक्ति, राहुल की शिवभक्ति और योगी की रामभक्ति कहीं इस बात का संकेत तो नहीं कि इस चुनाव में आस्था की छौंक कुछ ज्यादा ही लग रही है। इसका लाभ किसे कितना और किस रूप में होगा, यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही तय होगा। अब जनता को तय करना है कि वह नगर निकाय चुनाव में भाजपा का साथ देकर प्रदेश में विकास की केंद्रीयता सुनिश्चित करेगी या विपक्ष के साथ जोर सत्ता के दो केंद्रों की खींचतान झेलेगी। विवेक का तकाजा तो यही कहता है कि विकास के लिए जनता भाजपा का साथ दे अन्यथा विकास का पूर्व मंजर ही देखने को मिलेगा। चुनाव में मतदाता सर्वोपरि होता है, उसके विवेक को चुनौती नहीं दी जा सकती लेकिन अभी तक जो माहौल बन रहा है, उसमें नगर निकाय चुनाव में भाजपा का पल्ला भारी नजर आ रहा है। 

 

(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं)

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