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संपादकीय
ताजमहल सांस्कृतिक धरोहर क्यों नहीं? : राजनाथ सिंह ''सूर्य''
By Deshwani | Publish Date: 25/10/2017 4:29:29 PM
ताजमहल सांस्कृतिक धरोहर क्यों नहीं? : राजनाथ सिंह ''सूर्य''

ताजमहल पर भारतीय जनता पार्टी के किसी विधायक की अभिव्यक्ति को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ चलाये गये अभियान में कोई नवीनता नहीं है। पार्टी अध्यक्ष, प्रधानमंत्री या दायित्व संभाल रहे, व्यक्तियों की अभिव्यक्ति को उसकी आधिकारिक विचारधारा मानकर भाजपा या संघ के खिलाफ अभियान आम चलन में रहा है, जो अभी भी कायम है। एक उदाहरण इस स्थिति को समझने में सहायक होगा। जनसंघ रहा हो या आज की भारतीय जनता पार्टी अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सभी ने अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थल पर राममंदिर बनाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त किया है। ये संगठन आज भी विभिन्न माध्यमों से उस पर कायम हैं। इस प्रतिबद्धता को सफल बनाने के लिए तीन विकल्प की बात भी कही गई है। आपसी सहमति से समस्या का समाधान हो, न्यायिक प्रक्रिया से निपटारा हो या फिर कानून बनाकर निपटारा किया जायेगा। आपसी सहमति के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनुकूलता व्यक्त की है और उसके लिए प्रयास जारी हैं। मामला न्यायालय में लंबित है, जिसकी अब प्रतिदिन सुनवाई होने जा रही है। न्यायालय से निपटारा न होने पर कानून बनाने की बात आती है, जिसके लिए संसद में बहुमत चाहिए। यह बात जब भाजपा द्वारा कही जाती है तो आरोप लगाया जाता है कि वह राम मंदिर बनवाने के अपने वादे से मुकर रही है। 

गो रक्षा और गो संवर्धन में भारतीय आत्मा बसती है। महात्मा गांधी ने भी इसे अपने अभियान को मुद्दा बनाया था। संविधान निर्माताओं ने राज्यों द्वारा इस सम्बन्ध में कानून बनाने की अपेक्षा की थी। अधिकतर राज्यों में यह कानून तभी बन गया था जब कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन उस पर अमल नहीं होता था। अब अमल हो रहा है। कुछ अतिशयवादी जिसमें प्राथमिक स्तरीय भाजपाई भी कहीं- कहीं शामिल पाये गये हैं, अन्यथा गौ रक्षा में कानून को हाथ में लेने का काम करने वाले अधिकांश हुल्लड़ी या असमाजिक तत्व ही लिप्त पाये गये। उनकी करतूतों का सारा दोष भाजपा-संघ के माथे मढ़ देने का अभियान चलाया गया। हुल्लड़ करने वालों की ओर से इस तथ्य की उपेक्षा की गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या संघ ने आधिकारिक रूप से क्या कहा है। फिर मोदी को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देने से लेकर उनको अनेक अपमानजनक उपाधि दी जाती है। केंद्रीय मंत्री रहे चिदंबरम, मणिशंकर अय्यर आदि के अलावा वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा की गई अभिव्यक्ति या देश के टुकड़े-टुकड़े करने वालों का हौसला बढ़ाने के लिए उनके बीच में जाकर खड़े होने को इस पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उनके उत्तराधिकारी राहुल गांधी द्वारा अपनी सुविधानुसार ‘व्यक्तिगत’ मामला कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। जिस जीएसटी को कांग्रेस ने जन्म दिया और सभी दलों के सांसदों और मुख्यमंत्रियों ने वर्तमान रूप में लागू रखना स्वीकार किया था, उसे राहुल गांधी द्वारा गब्बर सिंह टैक्स कहकर नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराना दोमुंहापन का नवीनतम उदाहरण है।

ऐसे कितने उदाहरण दिए जा सकते हैं जो यह साबित कर सकते हैं कि नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को निर्वाध रखने की संवैधानिक व्यवस्था को आज इनके सियापा करने वालों ने अपने आचरण से चोट पहुंचाया है। इसके विपरीत मोदी के सत्ता संभालने के बाद इस पक्ष से इसके एक भी उदाहरण नहीं दिए जा सकते।मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ अभिव्यक्ति के माध्यमों का उपयोग जिस पैमाने पर किया जा रहा है, उससे ऐसा लगता है, इस देश में अराजकता और विभाजक शक्तियां बौखलाई हुई हैं। 

प्रधानमंत्री के रूप में देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का बताने से लेकर गुजरात के प्रस्तावित चुनाव में कांग्रेस की ओर से जाति और संप्रदाय के आधार पर समाज को बांटने वालों को खुला आमंत्रण देने से यह स्मरण हो आता है कि भारत का विभाजन कराने वाली मुस्लिम लीग के साथ सबसे पहले कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व वाली पार्टी ने ही दशकों पूर्व समझौता किया था। यह इस बात का प्रतीक है कि सबका साथ और सबका विकास के जिस माहौल को शासकीय नीति बनाकर भाजपा सरकार कदम बढ़ा रही है, उसको खंडित करने के प्रयास में कांग्रेस उसी प्रकार विभाजक और अराजक तत्वों को बढ़ावा दे रही है, जैसा अंग्रेजों ने कांग्रेस के खिलाफ किया था। इसके परिणाम भुगतने जाने के बावजूद वह अपनी आदत से मजबूरी का ही उदाहरण पेश कर रही है। 

देश की राजनीति को समाजवाद के नाम पर विदेशी तानाशाही का अनुसरण करने वालों को जिस प्रकार अवाम ने हाशिये से भी अलग कर दिया है, उससे उबरने के लिए भारतीयत्व की प्रधानता की अवाम में पैठ का संज्ञान लेने के बजाय कांग्रेस के लोग असामाजिक और देश विभाजक शक्तियों को प्रोत्साहन देने में उसी प्रकार लगे हैं, जैसा 1947 के पूर्व लगे थे। इन सबका लक्ष्य किसी की व्यक्तिगत शत्रुता में हत्या, क्षणिक उदिग्नता में किए गए सामूहिक आचरण को ‘‘हिन्दुत्व का एजेंडा’’ कहकर अवाम का ध्यान विकास से भटकाने का ही रहता है। इसी साजिश के तहत ताजमहल पर किसी विधायक की अभिव्यक्ति का सहारा लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस अभिव्यक्ति की भर्त्सना की जा रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि ताजमहल हमारी संस्कृति का प्रतीक नहीं है। ऐसे साजिशकर्ता मुख्यमंत्री का यह बयान भूल जाते हैं कि ताजमहल विश्वभर के लिए वास्तुकला का एक दर्शनीय स्थल है, जिसको संरक्षित रखने की सरकार की बहुत सी योजनाएं हैं। 

तजमहल के विवाद में जो मुद्दा मुख्य रूप से विचार के लिए उभरा है, वह यह कि क्या ताजमहल हमारी संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहर है? ताजमहल एक मकबरा है। देश में मुगल एवं अन्य इस्लामीमतावलंबी आक्रमणकारियों के अनेक मकबरे हैं, जो वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। इनमें से कई को ऐतिहासिक भवन के रूप में पहचान अवश्य मिली है और उनका संरक्षण भी पुरातत्व विभाग कर रहा है लेकिन वे मंदिरों के समान भारतीय संस्कृति के प्रतीक इसलिए नहीं हो सकते क्योंकि भारतीय संस्कृति में कब्र को पूजने का चलन कभी भी नहीं रहा है। सांस्कृतिक धरोहर वहीं हो सकता है जो भारतीयता के संस्कार को जागृत करे। मुगल बादशाह शाहजहां जिनको उनके एक पुत्र ने अपने भाइयों की हत्या करने के साथ ही बंदी गृह में डाल दिया था, सौंदर्य की प्रतीक मानी जाने वाली मुमताज महल की स्मृति में उनकी कब्र पर यह मकबरा बनवाया था। मरने के बाद शाहजहां की कब्र भी वहीं बना दी गई। मुमताज महल की मृत्यु महज बत्तीस वर्ष की अवस्था में हो गई। उन्नीस वर्ष के वैवाहिक जीवन में उनकी चौदह संतानें हुई थी जिनमें से आठ की अकाल मृत्यु हो गई। औरंगजेब ने अपने दो भाइयों को मार डाला और बहनों को विवाह नहीं करने दिया। इसमें मुमताज महल का कोई दोष नहीं हो सकता। हां इतना अवश्य है कि औरंगजेब की कब्र पर कोई मकबरा नहीं बना। ताजमहल या हुमाऊं का मकबरा अथवा फैजाबाद में नवाब सिराजुद्दीन और उनकी बेगम का बना भव्य मकबरा या देशभर में स्थान-स्थान पर बने मकबरे सूफी संतों की कब्र के समान भी सांस्कृतिक धरोहर नहीं हो सकते। भले ही अपने वास्तु सौंदर्य के कारण आकर्षण का प्रतीक हों। इसलिए योगी आदित्यनाथ का ताजमहल को सांस्कृतिक धरोहर न स्वीकार करना और सिर्फ वास्तु के ही श्रेष्ठ स्मारक के रूप में संरक्षित रखनेके उपाय करना, उनकी स्पष्ट धारणा का ही प्रतीक है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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