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हादसों से सबक नहीं लेते रेल महकमे के जिम्मेदार
By Deshwani | Publish Date: 16/4/2017 12:06:14 PM
हादसों से सबक नहीं लेते रेल महकमे के जिम्मेदार

-सियाराम पांडेय ‘शांत’

हादसे चाहे छोटे हों या बड़े, हमें सुधरने का मौका देते हैं। सड़क पर लगने वाली छोटी ठोकर भी हमें देख-संभलकर चलने की प्रेरणा देती है लेकिन तमाम हादसों के बाद भी रेल प्रशासन कोई सबक नहीं ले रहा है। इसे लापरवाही कहा जाए या कि रेल प्रशासन का अति आत्मविश्वास, इसका जवाब रेल महकमे के भी पास नहीं है। कुल मिलाकर सुरेश प्रभु की रेल प्रभु के भरोसे ही चल रही है। इसका कोई माई-बाप नहीं है। धरी-धोरा नहीं है। रेल यात्रा अब निरापद नहीं रही। रेल पटरियों पर रोज मौत दौड़ रही है। टूटी पटरियों पर रात भर ट्रेनें दौड़ती रहती हैं और जिम्मेदार तंत्र इस बावत पूरी तरह गाफिल रहता है। रेल अधिकारियों की अन्यमनस्कता, स्थितप्रज्ञता का आलम यह है कि अकेले उत्तर प्रदेश राज्य में विगत 6 माह में हुए पांच बड़े रेल हादसे हो जाते हैं और रेल महकमे की सेहत पर असर तक नहीं पड़ता। देश के अन्य राज्यों में हुए हादसों का तो जिक्र ही मत करिए। 

एक रेल हादसे से देश को कितनी क्षति होती है। कई ट्रेनें रद्द करनी पड़ती हैं। अनेक ट्रेनों के मार्ग परिवर्तित करने पड़ते हैं। संबंधित ट्रैक कभी कभी-कभी कई कई दिनों तक बाधित रहता है। इससे रेल राजस्व का कितना नुकसान होता है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। मृतकों के परिजनों या घायलों को मुआवजा देना ही काफी नहीं है। रेल हादसों से होने वाले नुकसान की भरपाई भी तो सुनिश्चित की जानी चाहिए। हादसों के लिए जब तक बड़े अधिकारी सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराए जाएंगे तब तक रेल हादसों का सिलसिला अंतहीन बना रहेगा और अव्यवस्था का आलम यथावत बना रहेगा। 

मेरठ से लखनऊ जा रही राज्यरानी एक्सप्रेस के 8 डिब्बे शनिवार की सुबह रामपुर के कोसी पुल के पास पटरी से उतर गए। इस हादसे में 20 लोग घायल हो गए। रेल अधिकारी कह रहे हैं कि बीस नहीं, केवल दो यात्री घायल हुए हैं। मतलब घायलों की संख्या छिपाने में भी विभाग को महारत हासिल है। रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और वही लगभग रटा-रटाया जवाब दोहराया है कि वे घटना पर नजर रखे हुए हैं। घटना के बाद ही वे नजर क्यों रखते हैं? जरूरत तो घटना से पहले नजर रखने की है। वे कह रहे हैं कि घटना की जांच में कोई लापरवाही पाई गई तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। सवाल उठता है कि इससे पूर्व जितने भी रेल हादसे हुए हैं, उनकी जांच का क्या हुआ, कितनी बड़ी मछलियों पर कार्रवाई की गाज गिरी, इस सवाल का जवाब संभवतः उनके पास भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गंभीर रूप से घायल लोगों को 50 हजार और हर घायल को 25 हजार रुपए की मदद देने का एलान किया है। यह उनकी सदाशयता ही है कि उन्होने अपने एक राज्यमंत्री को घटनास्थल पर भेजा। जिम्मेदार अधिकारियों को राहत और बचाव में किसी भी तरह की लापरवाही न बरतने के निर्देश दिए। रेलवे प्रवक्ता की मानें तो दो लोग ही घायल हुए हैं। वे गंभीर रूप से घायल हैं या सामान्य रूप से, इसका जिक्र उनके वक्तव्य में नहीं है। मौके पर पहुंची पुलिस घायलों की संख्या कुछ बताती है और वातानुकूलित कमरे में बैठे रेल प्रवक्ता कुछ और संख्या बताते हैं। अंकों का यह विरोधाभास कहीं सच पर पर्दा डालने का प्रयास तो नहीं है? 

आतंकवाद रोधी दस्ता के महानिरीक्षक असीम अरुण ने अगर मामले की जांच के लिए एक दल रामपुर भेजा है तो मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक दलजीत सिंह चैधरी को इस बात का ही संतोष है कि ट्रेन में कोई यात्री फंसा नहीं है। सब अपनी -अपनी मति और सोच के हिसाब से काम करते हैं। मौजूदा बयान तो इसी बात का इशारा करता है। 

उत्तर प्रदेश में रेल हादसे का यह पहला और आखिरी मामला नहीं है। विगत 6 माह में उत्तर प्रदेश की सीमा में यह पांचवां रेल हादसा है। 8 मार्च को रात करीब 1 बजे रक्सौल से दिल्ली जाने वाली सत्याग्रह एक्सप्रेस सीतापुर स्टेशन के पास मालगाड़ी से टकरा गई थी। हादसे में ट्रेन का दूसरा डिब्बा मालगाड़ी के आखिरी कोच से टक्कर गया था, जिसमें 5 यात्री जख्मी हो गए थे। 20 फरवरी को फिरोजाबाद के पास टुंडला स्टेशन पर कालिंदी एक्सप्रेस मालगाड़ी से भिड़ गई थी। यह अलग बात है कि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। टक्कर के बाद एक्सप्रेस ट्रेन के कई डिब्बे पटरी से उतर गए थे। कानपुर देहात के पास 29 दिसंबर की सुबह सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए थे जिसमें 50 से ज्यादा यात्री घायल हो गए थे। 20 नवंबर, 2016 की भोर में कानपुर देहात के रेलवे स्टेशन पुखरायां के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस के 14 डिब्बे पटरी से उतर गए थे। इसमें 145 लोगों की जान चली गई थी और 175 लोग जख्मी हो गए थे। एटीएस की जांच में यह बात भी खुलकर सामने आई थी कि कुख्यात आंतकी संगठन आईएसआईएस का नेटवर्क कानपुर और आसपास के इलाकों में सक्रिय हो गया है जो रेल पटरियों के साथ छेड़छाड़ कर रहा है। लखनऊ के मोहनलालगंज स्टेशन के आस-पास टूटी पटरियों का पाया जाना भी इस शक को पुख्त करने में सहायक बना था। 

उज्जैन में एक पैसेंजर ट्रेन में विस्फोट के आरोपी की लखनऊ में एटीएस के साथ मुठभेड़ में मौत हो चुकी है। इसके बाद भी उत्तर प्रदेश पुलिस के एडीजी का सुकूनजनक बयान अब ट्रेन में कोई यात्री फंसा नहीं है, सोचने पर विवश करता है। उत्तर प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन भले हो गया हो लेकिन स्थानीय पुलिस की कार्यशैली में कोई खास बदलाव नहीं आया है। लूटपाट, बलात्कार और हत्या के मामले थम नहीं रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अच्छा काम कर रहे हैं और उन्हें इस बावत गंभीरता से सोचना पड़ेगा। जब एक बात स्थापित हो चुकी है कि पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई और अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठन रेल पटरियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो उत्तर प्रदेश पुलिस की क्या जिम्मेदारी बनती है? राजकीय रेलवे पुलिस में तैनात यूपी पुलिस के जवान रेल को होने वाले नुकसान का दोष रेल सुरक्षा बल पर डालकर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकते और जब मामला संदिग्ध हो। उसके तार आतंकी संगठनों से जुड़ते हां तो फिर तो किसी भी तरह की कोताही वैसे भी क्षम्य नहीं है। रेल महकमा भी आतंकियों पर ही ठीकरा फोड़कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। रेल पटरियों की सुरक्षा व्यवस्था को रामभरोसे तो नहीं छोड़ा जा सकता। पीडब्ल्यूआई जैसी संस्था क्या कर रही है? अगर रेल पटरियों की समुचित देख-रेख होती है। उसकी मरम्मत होती है तो बार-बार ट्रेनों के डिरेल होने की घटनाएं कैसे हो जाती हैं, इस यक्ष प्रश्न का उत्तर तो रेल महकमे की ओर से आना ही चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं है कि रेल महकमा किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा हो। आखिर रेल सुरक्षा तंत्र, पुलिस और आतंक विरोधी दस्ता तभी सक्रिय क्यों होता है, जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है। इससे पहले सभी कुंभकर्णी नींद में क्यों सोए रहते हैं। रेल हादसे अकेले उत्तर प्रदेश में ही हो रहे हों, ऐसा भी नहीं है। उत्तर प्रदेश के अधिकारी इस बात की दलील दे भी सकते हैं लेकिन दलील देने मात्र से उनकी जिम्मेदारियां खत्म नहीं हो जाती। 

नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली रेल पटरियां उखाड़ रहे हैं और उत्तर प्रदेश में आतंकवादी। और रेलवे महकमा और इस प्रदेश का महकमा यह भी नहीं जान पाता कि पटरियां सुरक्षित भी हैं या नहीं। सवाल इस बात का है कि रेल यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़ का यह सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बावत खुद संज्ञान लेना चाहिए। जिम्मेदार लोग अगर हमेशा यही बात कहें कि हादसे पर उनकी नजर है और इसके बाद भी हादसे के लिए जिम्मेदार तंत्र का बाल भी बांका न हो तो फिर इस हालात में रेल परिवहन निरापद नहीं रह सकता। रेलवे के जिम्मेदार अधिकारियों को स्टेशन ही नहीं, कभी रेल पटरियों का भी निरीक्षण करना चाहिए। एक और प्रधानमंत्री विदेशों में चलने वाली हाई स्पीड बुलेट ट्रेनों को भारत में दौड़ाना चाहते हैं जबकि इन पटरियों पर सामान्य एक्सप्रेस और पैसेंजर ही नहीं चल पा रही हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। एक दौर था जब छोटे से रेल हादसे की नैतिक जिम्मेदारी नेता लेते थे और रेल मंत्री तक अपने पद से त्यागपत्र दे देते थे और अब तो हादसे पर हादसे होते रहते हैं और रेलमंत्री व बड़े रेल अधिकारी देखते रहते हैं। यह सब आखिर कब तक चलता रहेगा, यह भी तो सुस्पष्ट होना चाहिए।

हादसे एक बार हों तो समझ भी आता है लेकिन जब हादसों की बढ़वार हो जाए और हादसों की मॉडस आपरेंडी एक जैसी हो तो सोचने को विवश होना पड़ता है। देश को आतंकी नुकसान पहुंचा रहे हैं, यह विचारणीय बिंदु हैं लेकिन इस देश का तंत्र भी इस देश के नुकसान में बराबर का हिस्सेदार है, इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बेहतर तो यही होता कि सभी अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाते तो रेल परिवहन को आए दिन इस तरह के संकट न झेलने पड़ते। अब भी कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ा है, हमें सोचना होगा कि हम जागरूक नागरिक बनना चाहते हैं या लापरवाह। रेल देश की संपत्ति है। उसका नुकसान देश का नुकसान है। हमारा नुकसान है। अपने इस बड़े नुकसान की अनदेखी आखिर हम कब तक करते रहेंगे? 

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं )

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