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जरा किसानों की भी सुनों
By Deshwani | Publish Date: 24/5/2018 5:12:05 PM
जरा किसानों की भी सुनों

जय प्रकाश राय 

कभी बंपर पैदावार तो कभी दाने दाने के लाले। भारतीय कृषि की यही कहानी सालो साल से चल रही है। सरकारें आती जाती रहीं। हम विकास की नई ऊंचाइयों को छूते रहे। संचार का माध्यम कहां से कहां चला गया। कभी सायकिल पर चलना बड़ी बात होती थी, आज करोड़ों का गाडियां लोगों के पास हैं। जिस क्षेत्र मे देखें काफी तरक्की हुई है। लेकिन एक क्षेत्र है जहां का हाल वैसा का वैसाही बना रहा और वह है किसानी। किसानों की हालत में किसी तरहका सुधार नहीं हुआ। खेती के तरीके जरुर बदल गये हैं। बैलों का स्थान ट्रैक्टरों ने ले लियाहै। लेकिन जो मूल समस्या है वह आज भी बनी हुई है। वह है पैदावार को लेकर अनिश्चितता। मध्य प्रदेश की एक खबर के अनुसार  न नीमच की सबसे बड़ी प्याज मंडी में प्याज की खरीदी शुरू होने के बाद व्यापारियों की ऐश गई है तो किसानों की हालत पस्त है। मंडी में व्यापारी गुटबाजी करके किसानों से मनमाने तरीके से भाव लगाकर बोली लगा रहे हैं। बोली की शुरुआत 50 पैसे से शुरू हुई और एक-दो रुपये पर जाकर खत्म हो रही है। व्यापारियों की इस हरकत से किसान गुस्साए हुए हैं। 50 पैसे शुरू हुई बोली ज्यादा से ज्यादा 5 से 6 रुपये पहुंच रही है। वहीं यही माल दो दिन पहले तक लगभग दो गुने दामों पर बिक रहा था। व्यापारियों ने मंडी में बिक्री शुरू होते प्याज के भावों में गिरावट कर दी है। किसानों का कुछ प्याज तो व्यापारी खरीद तक नहीं रहे हैं। वहीं अगर उन्हें खरीदने को कहा भी जाता है तो बोली 50 पैसे से शुरू हो रही है। व्यापारी मालामाल हो रेहे हैं लेकिन जो किसान खून पसीने की मेहनत से खेती करते हैं, उनको उनकी पैदावार की कीमत नहीं मिल रही। केवल प्याज के सैाथ ऐसा नहीं होता। 

 

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब  दाल की कीमत ने हडक़ंप मचा रखा था। उसकी कीम्त 150 रूपये प्रति किलो पार कर गई थी। उसके बाद देश के किसानों ने जीतोड़ मेहनत कर दाल की खेती पर जोर दिया। अब दाल की ऐसी बम्फर पैदावार हो रही है कि किसानों को उसका खरीददार नहीं मिल रहा है। सरकार ने दाल का समर्थन मूल्य साल 2016 से 39 हजार रूपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 42 हजार रूपये कर दिया। लेकिन  सरकार दाल खरीद नहीं रही, जो हालत प्याज के साथ हो रहा है वैसा ही दाल के साथ भी किया जा रहा है।  व्यापारी इससे काफी कम दाम में दाल खरीद रहे है। हमने आजादी के 70 सालों में कई क्षेत्र में बहुत तरक्की की लेकिन अनाज का भंडारन कैसे किया जाये, इस ओर किसी का कभी ध्यान नहीं गया। किसान मेहनत कर जो पैदावार इकट्ठा करते हैं वह उनके खेतों, खलिहानों में पड़े रहते हैँ।  किसानों के खेत-खलिहान में दालों के ढेर लगे हुए है। इन किसानों पर क्या बीत रही है यह देखने-सुनने वाला कोई नहीं।

 किसानों की ऐसी समस्या आज की नहीं है। किसानों की आय कैसे बढ़े इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। यही कारण है कि किसान अब खेती से विमुख हो रहे हैँ। सभी जानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कृषि पर ही टिकी है। लेकिन हमारे अन्नदाताओं की ओर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया जाता। किसानों के प्रति वह सम्मान भी आम जनमानस  में नहीं है।  पिछले चार साल में किसानों की सालाना आय  44 प्रतिशत के दर से बढ़ी है। जबकि महंगाई कई सौ गुणा बढ चुकी है। जब किसान ही कराह रहा हो तो फिर देश को कैसा संपन्न माना जा सकता है। अभी आंकड़ा आया है कि भारत दुनियां का छठा सबसे संपन्न  देश है लेकिन इससे किसानों की सेहत पर तो कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। 

 

लोग मॉल, शो रूम में जाकर हजारों भले खर्च कर दे, वहां कीमत कोई नहीं देखता, मगर किसानों की आय कैसे बढ़े इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। वहीं खरीददार मॉल में फिकस्ड दर पर सामान खरीदता है। लेकिन सब्जी वाले से यदि मोल भाव नहीं करे तो उसका पेट नहीं भरता। उलटे  उसे झिडक़ ही देता है।

 

 इसी मानसिकता के कारण हमारे अन्नदाताओं की यह हालत है। पिछले चार साल में किसानों की सालाना आय  44 प्रतिशत के दर से बढ़ी है। लेकिन उनके बच्चों के स्कूल की फीस सालाना 20 प्रतिशत बढ़ा दी जाती है। स्कूल प्रबंधन का तर्क रहता है कि हर किसी की आय सालाना 15 से 20 प्रतिशत बढ़ती है। यह बात कौन समझाये कि आज भी देश की आधी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही कृषि है। जिस साल मानसून थोड़़ी आंखे फेर लेता है, महंगाई आसमान पर पहुंच जाती है अर्थ व्यवस्था चरमरा जाती है। दशकों से यही सिलसिला चल रहा है। सरकारें आती है किसानों की कर्ज माफी को चुनावी मुद्दा बनाया जाता है उससे कोई गुणा अधिक का एन पी ए कुछ धन्ना सेठ डकार लेते है। कोई चूं तक नहीं करता। मगर किसानों की तर्ज यदि माफ की जाती है तो आर्थिक विशेषज्ञ इस पर ऐतराज जताते हैं। उनकी नजर में अर्थव्यवस्था के लिये ऐसा करना अनुचित है और सरकारें भी वोट किसान से लेती है मगर राय विशेषज्ञों की सुनती है। ऐसे में किसान करे तो क्या करें?

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