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जोड़ तोड़ की राजनीति
By Deshwani | Publish Date: 20/5/2018 10:34:17 AM
जोड़ तोड़ की राजनीति

 जय प्रकाश राय 

राजनीति और खरीद फरोख्त का मानों चोली दामन का साथ है। अभी कर्नाटक को लेकर ऐसी बातें हो रही हैं लेकिन साल 1992 में जो कुछ हुआ था वैसा शायद ही देश के इतिहास में कभी देखने को मिला था। कांग्रेस की अगुवाई वाली नरसिंह राव सरकार को विश्वास मत हासिल करने के लिये झामुमो के सांसदों को रिश्वत दी गयी थी। इसे बाद में बहुत चतुराई से झामुमो रिश्वत कांड का नाम दे दिया गया। हालांकि इसमें कांग्रेस की उतनी ही भूमिका थी। इसे कांग्रेस रिश्वतकांड ही कहा जाना चाहिए था। ऐसा घोषित रिश्वत का मामला इसके पहले नहीं सुना गया और बाद में भी नहीं। हॉर्स ट्रेडिंग की बात तो होती है मगर उसका कोई प्रमाण नहीं मिलता।

 

राजनीति में अंकों की गणित का तो बहुत महत्व होता ही है लेकिन साथ ही जोड़-तोड़ की भी उतनी ही अहमियत रहती है। कर्नाटक विधान सभा चुनाव परिणाम के बाद एक बार फिर ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। 222 सीटों पर हुए चुनाव में बहुमत के लिए 112 सीटों की जरूरत थी। मगर भाजपा 104 पर अटक गई। पूरा प्रयास हुआ मगर इस जादुई आंकड़ा को नहीं हासिल किया जा सकता। 78 सीटें जीतने वाली कांग्रेस और 38 सीटों पर कामयाबी हासिल करने वाले जद (एस) ने परिस्थितियों को भांपते हुए तुरंत आपस में गठबंधन कर सरकार बनाने का दावा ठोक दिया। सत्ता हाथ से निकलने के बाद कांग्रेस कोई मौका नहीं गंवाना चाहती। यही कारण है कि अपनी सीटों के कम जीतने वाले जद (एस) को मुख्यमंत्री का पद भी तुरंत आफर कर दिया।

 

कांग्रेस के इस मास्टर स्ट्रोक ने भाजपा के होश उड़ा दिये और उसके खेमे में मायूसी हो गई। लेकिन तुरंत भाजपा भी सक्रिय हो गई और सरकार बनाने का दावा ठोकने लगी। और आखिरकार येदुरप्पा ने शपथ ले ली। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा जहां येदुरप्पा के शपथ लेने पर तो रोक नहीं लगी लेकिन राज्यपाल ने बहुमत हासिल करने की 15 दिनों की जो मोहलत दी थी उसे एक दिन का कर दिया। सभी को साल 2005 की झारखंड की घटना याद आ गयी। सबकुछ ऐसा ही हुआ था। तब के झारखंड के राज्यपाल सैयद सिप्ते रजी ने अपने कांग्रेसी साथियों के पक्ष में फैसला दिया था और 15 दिनों की मोहलत शिबु सोरेन सरकार को दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ठीक इसी तरह इसे एक दिन का कर दिया था और वहां विधान सभा के पटल पर शिबू सोरेन को हार का सामना करना पड़़ा था। उस समय भाजपा झारखंड में लोकतंत्र की हत्या की बात कह रही थी और कांग्रेस उस तमाम घटनाक्रम को जायज साबित करने में लगी थी आज कर्नाटक में दोनो दो छोर पर हैं और उससे ठीक उलट बात कर रहे हैँ। उस वक्त जो लाभ में था आज घाटे में है और जो घाटे में था आज वह लाभ की स्थिति में है। 

 

कांग्रेस का तर्क है कि जिस तरह गोवा, मिजोरम में कम सीटें जीतने के बाद भी भाजपा को चुनाव बाद के गठबंधन के आधार पर सरकार बनाने का मौका मिल गया वैसा ही कर्नाटक में उसके साथ होना चाहिए। सीटों का गणित देखे तो साफ-साफ दिखता है कि कांग्रेस और जद (एस) मिलाकर सरकार बना लेगें क्योंकि इन दोनों दलों का आंकड़ा मिलकर 116 हो जाता है जो 112 के बहुमत के आंकड़े से अधिक है। जब कांग्रेस की तूती बोलती थी तो वह इसी तरह के जोड़-तोड़ के सहारे सरकारें बनाती, गिराती रही। आज भाजपा इसी राह पर चलकर कांग्रेस को पटकनी दे रही है। सत्ता में जो भी दल होता है उसके पास जोड़ तोड़ का भरपूर अवसर रहता है। कांग्रेस अब तक जो जोड़-तोड़ करती रही उसका वह  अपना तर्क देती थी।  आज वह इसे पैसे का खेल बता रही है।  

कर्नाटक में आरोप लगाया जा रहा है कि भाजपा विधायकों को 100 करोड़ रुपये एवं मंत्री का आफर दे रही है। ऐसे मामलों को बड़ी चतुराई से अंतरात्मा की आवाज दे दी जाती है। मगर साफ है कि यहां सब विकाऊ हैं, खरीदने वाले की जेब भरी होनी चाहिए। अब राजनीति में सुचिता की बात बेमानी सी लगती है। संविधान को अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जाता है। एक दिन जो सही है वही दूसरे दिन उसी के लिये गलत हो जाता है।

 
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