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38 सालों की भाजपा
By Deshwani | Publish Date: 7/4/2018 9:57:16 AM
38 सालों की भाजपा

जय प्रकाश राय

6 अप्रैल 1980 को जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी बनी थी। तो उस समय यह राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर खुदको स्थापित करने में लगी थी। भाजपा को जनसंघ का परिष्कृत रुप माना गया उसके बाद के 38 सालों का पार्टी का सफर आज अपने चरम पर है। इस दौरान भाजपा ने पांच बार कांग्रेस के केंद्र की सत्ता छीनी और आज पूरे देश के 20 राज्यों में भाजपा की सरकार है। देश के इतिहास में इसके पहले कभी किसी एक पार्टी की इतने राज्यों में सरकार नहीं रही। कांग्रेस को 19 राज्यों में एक साथ सत्ता पर काबिज होने का मौका मिला था। इंदिरा गांधी द्वारा लगाये आपातकाल के  दौरान तमाम विपक्षी पार्टियां एक मंच पर आई थीं और जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई की अगुवाई में बनी थी। अटल बिहारी वाजपेयी उस सरकार में विदेश मंत्री थे। यह सरकार अंतरविरोधों के कारण गिर गयी और इसी के बाद 1980 में भाजपा का गठन किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी के पहले अध्यक्ष थे। अटल- आडवाणी की युगल जोड़ी ने भाजपा का विस्तार देश के विभिन्न हिस्सों में किया। 1984  में लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी की कमान संभाली और उन्होंने रामजन्म भूमि विवाद को जोरशोर से उछालना शुरु किया। 

उनकी छवि एक हार्ड कोर हिन्दू नेता के रुप में बढती चली गयी। हलांकि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में भाजपा को केवल 2 सीटें मिलीं लेकिन उसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार बढता चला गया। अटल बिहारी वाजपेयी को तीन बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला।  2014 में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत लाकर देश पर शासन शुरु किया। आज 20 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगियों की सरकार है। इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में 19 राज्यों में कांग्रेस सरकार का रिकार्ड था जिसे भाजपा ने तोड़ दिया है। पार्टी विद डिफरेंश का भाजपा का नारा जनता को खूब रास आया हलांकि कई ऐसे मौके आये जब भाजपा पार्टी विद डिफरेंसेज वाली भी प्रतीत हुई। मगर अपने 39वें साल में 22 करोड़ सदस्यों के साथ भाजपा दुनियां की नंबरएक राजनीतिक पार्टी बन चुकी है और जिस आक्रामक अंदाज में वह अपना पैर फलाने में लगी है वह विपक्षी दलों के लिये बड़ी चुनौती है। भाजपा ने 

इन 38 सालों में 10 पार्टी अध्यक्ष दिये हैं जिसके जरिये यह पार्टी लोकतांत्रिक होने का दावा करती है और दूसरी पार्टियों खासकर कांग्रेस को एक परिवार के इर्द गिर्द होने का आरोप मढती रहती है। इस दौरान भाजपा को कई राजनीतिक विरोधों का भी सामना करना पड़ा। उसे राजनीतिक अछूत साबित करने का भी प्रयास होता रहा। उसके नाम पर वोटरों को डराया जाता रहा है। मुसलमानों के बीच तो भाजपा का खौफ पैदा करने की कोशिश होती ही है , भाजपा को आरक्षण विरोधी साबित करने का भी कौई मौका विरोधी नहीं चूकते। भाजपा को बार बार खुद को आरक्षण का समर्थक होने का प्रमाण देना पड़ता है और 38वें स्थापना दिवस पर पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने आरक्षण के समर्थन में फिर जोरदार वयान दिया। जो भाजपा अटल -आडवाणी के इर्द गिर्द शुरु हुई वह आज मोदी शाह की नजर आती है। अब भाजपा खुद को हिन्दी प्रदेश की पार्टी से बाहर निकलकर  पूरे देश में पैर फैला रही है। पूर्वोत्तर भारत के असम, त्रिपुरा जैसे प्रदेशों में भाजपा की सरकार का बनना एक बड़ी राजनीति का बदलाव है। भाजपा ने सबका साथ सबका विकास का नारा दिया था लेकिन राजनीतिक तौर पर हिन्दुत्व वाली छवि ही उसे पसंद आती है।

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