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दलितों के हितैशी
By Deshwani | Publish Date: 3/4/2018 9:20:39 AM
दलितों के हितैशी

जय प्रकाश राय

वोट बैंक की राजनीति के कारण देश को काफी नुकसान सहना पड़ता है। फूट डालो राज करो की नीति अपनाई जाती है और इसका भरपूर रानजीतिक लाभ उठाने की कोशिश की जाती है। आग लगा दी जाती है। किसी आम जनता को कोई लाभ नहीं मिलता लेकिन राजनीति चमक जाती है।अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दलित समुदाय गुस्से में है. इस मुद्दे को लेकर  भारत बंद के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से जमकर हिंसा की गयी, उत्पात मचाया गया। सात लोगों की जान चली गई। संपत्ति का कितना नुकसान हुआ इसका आकलन नहीं लगाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले को केंद्र की ओर मोड़ दिया गया है और भाजपा को दलित विरोधी साबित करने वालों की चांदी कट रही है। देश की आबादी के करीब 17 फीसदी  दलितों की नाराजगी को देखते हुए मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी है. विपक्ष हो या सरकार कोई भी इस समय खुद को दलितों के खिलाफ नहीं दिखाना चाहता और इसकी वजह भी है. भले सामाजिक स्तर पर दलितों को वह स्थान नहीं मिल पाता लेकिन देश की सियासत में वे बहुत बड़ी ताकत माने जाते हैं। सरकार बनाने बिगाडऩे में उनकी भूमिका निर्णायक हो जाती है। यदि आदिवासियों को उनके साथ जोड़ दिया जाये तो यह आबादी 30 प्रतिशत तक हो जाती है। यही कारण है कि वर्तमान आंदोलन काफी संवेदनशील हो गया है। और हर राजनीतिक दल इन समुदायों को अपने पक्ष में करने में लगा हुआ है। 31 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित जातियां अधिसूचित हैं. 1241 जातीय समूहों को अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है.

देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में 80 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 80 सीटों में से बीजेपी ने 41 सीट पर जीत दर्ज की थी.उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के चुनाव में दलित मतदाताओं की काफी अहम भूमिका रहती है. दलितों की सियासी ताकत देखते हुए देश की सियासी पार्टियां उन्हें अपने पाले में लाने की कवायद में लगी रहती हैं.

माना जाता है कि पिछले 2014 के आम चुनाव में दलितों, आदिवासियों ने बड़े पैमाने पर भाजपा को समर्थन दिया था. मगर पिछले चार सालों में भाजपा को दलित विरोधी साबित करने में विपक्षी पार्टियों ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी के नियमों में बदलाव क्या किया, राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गयी है कि कौन सी पार्टी खुद को दलितों का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करे.आज के भारत बंद के दौरान जिस तरह का उत्पात और ंिहसा हुई उससे साफ है कि पूरे आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश की गयी है। जो लोग आज दलितों के लिये आंसू बहा रहे हैं, उनसे सवाल पूछा जाना चाहिये कि जब वे सत्ता में रहे तो दलितों के लिये क्या किया गया।आजादी के 70 साल के बाद भी दलितों के उत्थान के लिये क्या किया गया। उनकी सामाजिक अहमियत कितनी बढी। केवल आरक्षण दे देने और कानून में उनको कुछअलग अधिकार दे देने मात्र भर से क्या दलितों का उत्थान हो जाएगा। यदि ऐसा हुआ होता तो आज उनके हालात इतने बदतर नहीं होते। देखा गया है कि जिनको भी वोट बैंक बनाया जाता है उनकी दशा को सुधरने नहीं दी जाती। यदि वोटबैंक की स्थिति बेहतर हो जाएगी तो फिर कौन राजनीतिकों के आगे पीछे चलेगा। सबसे जरुरी है समाज के कमजोर वर्ग को अपने पैर पर खड़ा होने के योग्य बनाया जाये। इसके लिये जो प्रयास किया जाना चाहिये वह तो किया नही ंजाता। केवल आग लगाने में लोग लगे रहते हैं और भड़काऊ बातें की जाती हैँ। बात केवल दलितों, दबों कुचलों की की जाती है लेकिन उनके लिये काम नहीं किये जाते।

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