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ईवीएम पर प्रश्न चिह्न लोकतंत्र के लिए चिंतनीय : अनिल शर्मा
By Deshwani | Publish Date: 4/4/2017 2:55:34 PM
ईवीएम पर प्रश्न चिह्न लोकतंत्र के लिए चिंतनीय : अनिल शर्मा

 लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रणाली की ईवीएम की विश्वनीयता पर प्रश्न खड़ा होना चिंतनीय विषय है। समूचे देश में मतदान के लिए ईवीएम प्रणाली लागू है। ऐसे में ईवीएम पर बिना किसी ठोस सबूत के प्रश्न खड़ा करना राजनीतिज्ञों के लिए कितना सही है, इस पर तो उन्हें स्वयं ही विचार करना होगा। ईवीएम की गड़बड़ी के मामले को लेकर मीडिया की सुर्खियों में आया अटेर उपचुनाव की वलि ऐसे अधिकारी भी चढ़ गए जो जनता के काफी चहेते थे। उनका विकास के साथ-साथ कुछ नया करने का सोच भी था। आज मुद्दा ऐसे अधिकारियों के स्थानांतरण होने का इतना बड़ा नहीं है, जितना निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता की साख पर लगाया जाना है। निर्वाचन आयोग ने कहीं न कहीं अपनी साख को बचाने के लिए बिना किसी पड़ताल के राजनीतिक दवाब में आकर जो कार्रवाई की है, वह भी उचित नहीं ठहराई जा सकती।

उप्र में भारतीय जनता पार्टी की बंपर जीत को कोई भी राजनीतिक दल पचा नहीं पा रहा है। चाहे वह बसपा, सपा हो या फिर कांग्रेस। इतना बड़ा प्रचण्ड बहुमत मिलने की किसी को भी आशा नहीं थी, लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से देश की जनता दिल से प्रभावित है। उसे पता था कि उप्र के चुनाव परिणाम देश की राष्ट्रवादी राजनीति की दिशा तय करेंगे। जो लोग बढ़ते मोदी के वर्चस्व से परेशान थे, उनको मोदी की खिलाफत करने का मौका मिलेगा, जो देश की राष्ट्रवादी राजनीति को पीछे ढकेल सकती है। लोग सपा, बसपा से ऊब चुके थे। उन्होंने लोकसभा के चुनाव में ही इनको हटाने का मन बना लिया था। इस कारण एक-एक बोट राष्ट्रवाद की राजनीति के नाम से गिरा, बहन मायावती को लगता था कि सपा के विरोध का फायदा बसपा को होना ही है। इस मंसूबे पर भी उप्र की जनता ने पानी फेर दिया। तो उन्हें भी ईवीएम में खोट नजर आई। 
उनका तर्क था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र में भाजपा कैसे जीत गई। शायद उन्हें इस बात का अहसास नहीं कि देश में राष्ट्रवादी मुस्लिम भी रहते हैं और वे भाजपा सरकार में ज्यादा सुरक्षित हैं।इस कारण मुस्लिम समुदाय ने भी भाजपा के पक्ष में मतदान किया तो इसमें हैरानी की क्या बात है। देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा राजनैतिक दल जो अपने आपको स्वतंत्रता आंदोलन से निकला हुआ ही मानता है, उसको भी देश की जनता ने खूब सत्ता सुख भोगने का मौका दिया। अब जनता विकल्प की तलाश में थी, ऐसे में भाजपा ने धीरे-धीरे अपने राजनीतिक ग्राफ को बढ़ाया और आज वो देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। कांग्रेस के पास भाजपा की खिलाफत करने का कोई मुद्दा ही नहीं है। ऐसे मरी पड़ी कांग्रेस ने ईवीएम में गड़बड़ी होने को अपनी आक्सीजन बनाकर तहलका मचाया है। लेकिन मरते हुए व्यक्ति को आक्सीजन कुछ समय तक तो फडफ़ड़ाने का मौका दे सकती है, लेकिन जीवनदान नहीं।
भिण्ड जिले के अटेर विधानसभा उपचुनाव में डेमो के दौरान ईवीएम में कमल का फूल चुनाव चिन्ह निकलने की खबर में कितनी सत्यता है, इसका मैं स्वयं साक्षी हूं। यह बात सही है कि प्रदेश की निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह द्वारा डेमो के दौरान बटन दबाने पर पहली बार में ही कमल का फूल चुनाव चिह्न निकला, लेकिन जब हम कमल के बटन को दबाएंगे तो कमल तो निकलना ही है। इसके बाद हाथ का पंजा व हैण्डपंप भी निकला, इससे यह कहां साबित होता है कि ईवीएम में खराबी है। इतना जरूर हुआ कि जब पहलीबार में कमल का फूल निकला तो पत्रकारों के हंसने पर प्रदेश निर्वाचन पदाधिकारी नजाकत में यह कह गईं कि इसको प्रेस में मुद्दा बनाया तो मैं थाने में बिठवा दूंगी। उन्होंने ऐसा क्यों कहा, यह तो वह ही जानती होंगी। 
इस तरह की भाषा एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के मुंह से कितनी शोभा देती है? यदि उनकी नजर में किसी विशेष राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न डेमो में निकलना नियम विरुद्ध है तो उन्हें तत्काल निर्वाचन का कार्य देख रहे अधिकारी व कर्मचारियों पर कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन यह न करते हुए वे कुछ और ही कर बैठी, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर गई। पत्रकारों की चर्चा में यह भी बार-बार कहना कि पत्रकारों के प्रश्नों के जवाब देने के लिए वे वाध्य नहीं हैं। फिर भी मेरे जैसे स्तर का एक अधिकारी उपचुनाव में आपके बीच है। यह बहुत बड़ी बात है। पत्रकारों को भी खबर चाहिए थी, तो मतदान के दौरान मतदाता ने किसके पक्ष में वोट किया यह वोट डालने के समय ही सात सेकेण्ड में उसे दिख जाएगा। इसका डेमो कराने की गुजारिश कर डाली।
उप्र के चुनाव में ईवीएम की विश्वसनीयत पर लगे प्रश्न चिह्नों के शंका समाधान के लिए निर्वाचन आयोग ने प्रयोग के तौर पर उपचुनाव से यह व्यवस्था शुरू की है, जिसमें व्यक्ति को यह पता चल सकेगा कि बोट किसको गया है। इसमें सात सेकेण्ड का अतिरिक्त समय भी लगेगा। इसकी शुरुआत अटेर उपचुनाव से हो रही है। खबर महत्वपूर्ण बने इस दृष्टि से पत्रकारों ने डेमो दिखाने का अनुरोध किया। जिसे तत्काल निर्वाचन पदाधिकारी ने स्वीकार भी कर लिया। आनन-फानन में डेमो के लिए ईव्हीएम मंगाई गई और जैसे ही बटन दबाया तो पहला चुनाव चिह्न कमल इत्तेफाक से निकल पड़ा, जिसे ईव्हीएम का कोई भी बटन दबाने पर कमल चुनाव चिन्ह निकलने का मुद्दा बना दिया। 
ईवीएम में गड़बड़ी होने का चर्चाओं का बाजार कांग्रेस, बसपा व सपा पहले ही गर्म किए हुई थी, लेकिन उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं था। ऐसे में अटेर उपचुनाव की ईवीएम के किसी भी बटन को दबाने पर कमल निकालने की तथाकथित खबर जो देश के सभी चैनलों व सोशल मीडिया पर ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में बिना किसी ठोस सबूत के तेजी से चलाई गई। उस खबर को आधार बनाकर भारत निर्वाचन आयोग पर विरोधी दलों ने दवाब बनाया और निर्वाचन आयोग ने भी इतनी जल्दी की, बिना किसी वास्तविकता की जांच कराए जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक समेत कई अधिकारियों को बदलने की बड़ी कार्रवाई कर डाली। इस कार्रवाई ने भी इस अफवाह को कहीं न कहीं बल दिया है कि कुछ तो था। यहां विद्वानों की यह वाणी सच साबित हो गई कि कलियुग में ऐसा समय आएगा कि सौ झूठ एक सच को दबाकर स्वयं सच साबित होने में कामयाब होंगी। ऐसा ही कुछ इस मामले में हुआ है। 
राष्ट्र स्तर पर अटेर उपचुनाव की ईवीएम गड़बड़ी के मुद्दे को विभिन्न विरोधी राजनीजिक दलों को तूल देने में मप्र की निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह की बोलने के सलीके ने अहम भूमिका निभाई है। निश्चित रूप से वे अटेर उपचुनाव में निष्पक्ष चुनाव कराने की मंशा से भिण्ड दौरे पर आई हों। लेकिन उनके बोलने के सलीके ने निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। उनके द्वारा जिस तरीके से मीडिया को इंगित करते हुए यह कहा गया कि इस मुद्दे को मीडिया में ले गए तो थाने बिठवा दूंगी। यह कहते हुए उनका बीडियो सोशल मीडिया व राष्ट्रीय स्तर के चेनलों में इतना जबरजस्त चला कि ईव्हीएम के बटन दबाने पर कमल का फूल निकलने की बात लोगों के मन में बैठ गई। कहीं ने कहीं लोकतंत्र व्यवस्था पर ईवीएम की गड़बड़ी के माध्यम से प्रश्नचिह्न खड़ा कराने में निर्वाचन पदाधिकारी जिम्मेदार हैं।
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