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जीवन की नींव को निःस्वार्थ सेवा से मजबूत बनाये
By Deshwani | Publish Date: 14/3/2017 1:05:49 PM
जीवन की नींव को निःस्वार्थ सेवा से मजबूत बनाये

 प्रदीप कुमार सिंह 

आईपीएन। उत्तर प्रदेश के शामली के जैन मोहल्ला निवासी श्री नीरज गोयल वर्ष 2010 में मुंडेट कलां प्राथमिक विद्यालय नंबर एक में बतौर सहायक अध्यापक नियुक्त हुए। प्राथमिक सरकारी स्कूल का नाम सुनते ही जेहन में शिक्षा के नाम खानापूरी का विचार आता है। मिड डे मील और वजीफे के बीच शिक्षा की बदहाली सामने आती है। शिक्षा को इस बदहाली से निकालने के लिए श्री नीरज गोयल अब शामली के मोहल्ला बरखंडी स्थित प्राथमिक विद्यालय नंबर दस के प्रधानाध्यापक के रूप में इस प्रवृत्ति के खिलाफ लड़ रहे हैं। उनके स्कूल में छात्र संख्या के नाम पर खानापूरी नहीं होती है। वह अभिभावकों को प्रेरित करते हैं और शिक्षा की गुणवत्ता बनाने के लिए भरसक प्रयास करते हैं। गरीब परिवार के बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए उन्होंने अभियान चला रखा है। उन्होंने मोहल्ला चैपाल नामांकन भ्रमण के नाम से कार्यक्रम चलाया। स्कूल की छुट्टी के बाद नीरज गोयल मोहल्लों में पहुंचते और वहां ठेले वाले, सब्जी बेचने वाले, रिक्शा चलाकर गुजर बसर करने वाले परिवारों के बीच जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते हैं। रात में मोहल्लों में बैठक कर उन्हें शिक्षा का महत्व बताते हैं। इसी का असर है कि विद्यालय में नामांकन 300 हुआ और ज्यादातर बच्चे रोज स्कूल भी आते हैं। वह बच्चों को हर कदम पर अपनेपन का अहसास कराते हैं। ताकि उन्हें किसी तरह की कोई कमी महसूस न हो।
जंगल की हरियाली निगल रही चीड़ की पत्तियों से अब वन संपदा नहीं बल्कि चूल्हे जल रहे हैं। इन बेकार पत्तियों का ईंधन उपयोग में लाए जाने से कुछ घरों का चूल्हा भी जलता है। पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी चीड़ की पत्तियों का ईधन इसलिए उपयोगी है, क्योंकि यह धुआं रहित है। हिमाचल प्रदेश के मंडी के सुंदरनगर की ग्राम पंचायत चांबी के गांव द्रमण निवासी श्री श्रवण कुमार की कोशिशों से यह संभव हो पाया है। श्री श्रवण कुमार न केवल खुद चीड़ की पत्तियों से ईंधन तैयार करते हैं, बल्कि ग्रामीणों को इसका प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से सृदृढ़ करने का रास्ता दिखा रहे हैं। गांव के 15 लोग उनके साथ इस काम में जुटे हैं। श्री श्रवण घर के निकट जंगल से चीड़ की पत्तियां पशुओं के नीचे डालने के लिए लाते थे। जब उन्हें पता चला कि इनका इस्तेमाल स्वरोजगार के लिए भी कर सकते हैं तो राजकीय बहुतकनीकी संस्थान, सुंदरनगर से सम्पर्क किया। यहां उन्होंने चीड़ की पत्तियों से कोयला बनाने की तकनीक का प्रशिक्षण लिया। विभाग ने लगभग 14 हजार रूपये का बायोमास संयंत्र तथा कोयला बनाने का खांचा भी निःशुल्क उपलब्ध कराया। यह कोयला धुंआरहित होता है तथा इसके उपयोग से पर्यावरण पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता है।
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के खड्डा थानांतर्गत सिसवा निवासी दिव्यांग श्री बलराम पांडेय की हिम्मत हर किसी के लिए प्रेरणा बन सकती है। भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर श्री बलराम ने जो किया, उस कार्य को करने का साहस बहुधा कम लोग ही उठा पाते हैं और किसी प्रकार से ले-देकर अपना काम बनवाने की जुगत भिड़ाते हैं। हम यह क्यों नहीं समझते कि भ्रष्टाचार देश सहित सारे विश्व के लिए अभिशाप है? यही भ्रष्टाचार देश-प्रदेश तथा सारे विश्व की जड़ांे को निरन्तर खोखला कर रहा है। पेंशन के लिए कर्मचारियों के सामने रोते गिड़गिड़ाते लोगों को देख श्री बलराम ने तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह घूसखोरों को पकड़वा कर ही चैन लेंगे। राज्य बीमा निगम के घूस मांगने वाले कर्मचारियों को पकड़वाने के लिए श्री बलराम ने पत्नी संगीता के गहने गिरवी रख दिए और सात हजार रूपये राज्य बीमा निगम के कर्मचारियों को देकर सीबीआई के हाथों उन्हें गिरफ्तार करा दिया। श्री बलराम पाण्डेय ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध जैसी दृढ़ता दिखाई है यदि ऐसी ही जागरूक तथा साहस के साथ प्रत्येक नागरिक संकल्प ले तो भ्रष्टाचार की घातक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकता है। किसी महापुरूष ने कहा है कि अपना अपना करो सुधार तभी मिटेगा भ्रष्टाचार। 
उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के हैबतपुर ग्रामसभा की प्रधान श्रीमती मंजू मौर्या ‘हम सबने यह ठाना है, भारत स्वच्छ बनाना है’ के नारे पर अमल कर प्रदेश में महिला प्रधानों की आईकॉन बन चुकी हैं। सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़ी इस ग्रामसभा में प्रधान के प्रयास ने स्वच्छ भारत मिशन को अमलीजामा पहनाने के लिए शौचालय, सफाई व विकास कार्य की बदौलत गांव की सूरत बदल दी। अति पिछली ग्रामसभा होने के वजह से यह ग्रामसभा साफ-सफाई में नगण्य रही, लेकिन महिला प्रधान श्रीमती मंजू मौर्य ने एक साल के कार्यकाल में गांव की तस्वीर बदलकर चमाचम कर दी। इसके लिए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के हाथों सम्मान पाने का गौरव प्राप्त हुआ। 
प्रोफेसर क्लास में आते ही बच्चों से बोले, आज मैं आपसे एक पहेली पूछूंगा। क्या आप लोग तैयार हैं? बच्चे बहुत उत्साहित हो गए। प्रोफेसर बोेले, एक राजा का दरबार लगा हुआ था। चूंकि सर्दी का दिन था, इसलिए दरबार खुले में लगा हुआ था। उसी समय एक व्यक्ति दरबार में आकर कहने लगा, मेरे पास दो वस्तुएं हैं। वे दोनों वस्तुएं देखने में एक जैसी है। समान आकार, समान रूप रंग, समान वजन, सब कुछ समान था। इनमें से एक है बेशकीमती हीरा और एक है कांच का टुकड़ा। उसने राजा से शर्त लगायी कि आपके राज्य का जो व्यक्ति हीरे को पहचान पायेगा तो मैं हीरे को राज्य के खजाने में जमा कर दूंगा। हारने पर हीरे की कीमत की धनराशि मुझे देनी पड़ेगी। राजा ने उसकी शर्त मान ली। राज्य का कोई व्यक्ति हीरे की पहचान नहीं कर पाया। अन्त में एक अंधा व्यक्ति आया उसने हीरे की पहचान कर ली। जब उस व्यक्ति से इसका राज पूछा गया तो उसने बताया कि सीधी सी बात है। हम सब धूप में बैठे हैं। मैंने दोनों वस्तुओं को छुआ। जो ठंडी थी, वह हीरा था, और जो धूप में गरम हो गया, वह कांच था। प्रोफेसर बोले ऐसा ही कुछ हमारे जीवन में भी होता है। जो आदमी बात-बात पर गरम हो जाए, दूसरों से उलझ जाए, वह व्यक्ति कांच है, और जो विपरीत परिस्थिति में भी ठंडा रहे, वह व्यक्ति हीरा है। विपरीत परिस्थिति हमें सिर्फ मजबूत बनाने के लिए होती है।
प्रसिद्ध लेखक हृदयेश ने अपनी विदेश यात्रा का वर्णन करते हुऐ बताया कि मैं दोबारा अपने बेटे-बहू के अमेरिका के न्यूजर्सी स्थित घर आ गया। इस बार अकेला ही आया हूं। पत्नी एक तो अस्वस्थ रहती हैं, दूसरे उनके साथ भाषा और पुराने आचार-विचारों की भी समस्या है। पत्नी छोटे बेटे के पास मुंबई चली जाएंगी। चलने लगा, तो वह बाहर तक छोड़ने आई। उनकी आंखों में आंसू थे। मैं इतना लंबा सफर अकेले कर रहा हूं, वह भी सात समुद्र पार के देश के लिए। बेटे-बहू के घर पहुंचते ही पांच साल की पोती कली ने एक शर्मीली मुस्कान सेे स्वागत किया। पिछली बार 1989 में जब आया था, तब घर में कोई बच्चा नहीं था। बच्चा होने से घर कितना आत्मीय बन जाता है। बच्चे के सहज, निष्कलुष क्रियाकलाप परिवेश में संगीत जैसा कुछ घोल देते हैं। संगीत का स्वाद कभी भी बासी नहीं पड़ता। बाहर सड़क पर या आसपास घरों में कहीं भी कोई शोरोगुल, चीख-चिल्लाहट नहीं है। ऐसी शांति आध्यात्मिकता के अति निकट होती है। आध्यात्मिकता का यह एक दूसरा नाम है। ऐसी शांति में ही अपने अंदर में गहरे उतरा जा सकता है। 
19वी सदी के आखिरी वर्ष थे। ठाकुरदास नामक एक बुजुर्ग सज्जन कोलकता में रहते था। परिवार में केवल एक बच्चा और पत्नी थी। आर्थिक तंगी के कारण इन तीन लोगों का भरण-पोषण भी ठीक से नहीं हो पाता था। कुछ समय बाद वे मेदिनीपुर के एक गांव में आकर रहने लगे। वहां ठाकुरदास को दो रूपये महीने की नौकरी मिली। कुछ ही समय बाद उनका देहांत हो गया। पत्नी के कंधों पर बेटे के पालन-पोषण का पूरा दायित्व आ गया। मां-बेटे का गुजारा किसी तरह चलता रहा। एक दिन बेटे ने मां से कहा कि मैं पढ़-लिखकर बहुत बड़ा विद्वान बनूगा और आपकी खूब सेवा करूंगा। मां ने बेटे से अपनी इच्छा बतायी कि तुम गांव में एक स्कूल बनवाना, दवाखाना भी खुलवाना, गरीब बच्चों के रहने-खाने की व्यवस्था भी करना। तभी से उसे कुछ ऐसी धुन सवार हुई कि उसने अपनी मां की इन तीन इच्छाओं को सदैव ध्यान रखा। वह बड़ा होकर बराबर स्कूल, औषधालय और सहायता केन्द्र खोलता चला गया। यह मातृभक्त कोई और नहीं, प्रसिद्ध विद्वान एवं समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे। 
लोग अपने-अपने कारणों से जीवन जी रहे हैं। किसी को धन चाहिए, किसी को पद-प्रतिष्ठा, किसी को सारे भौतिक सुख चाहिए। हर कोई लेना चाहता है, देने में किसी की दिलचस्पी नही है। सेवामय जीवन सहज, सरल और सुन्दर है। सेवामय जीवन प्रेम, आनंद तथा उत्साह से भरा होता है। यदि हम दूसरों को सेवा की राह पर चलने की राह देखेगे तो कभी पृथ्वी लक्ष्य को नहीं हासिल कर पायेंगे जिसके लिए हमने मानव योनि में जन्म लिया है। हमें जीव मात्र की सेवा करने की शुरूआत अपने से करनी चाहिए। सेवा के भरपूर अवसर वर्तमान में अभी इसी क्षण हैं। सेवा भाव से अपनी नौकरी या व्यवसाय करते हुए इस अनमोल जीवन का सम्मान करना चाहिए। हम अपने अंदर सर्वोत्म समाज को देने का जज्बा पैदा करें। सेवा का कार्य अभी से नहीं किया तो फिर कभी नहीं होगा।    
(उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो।)
 
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