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मोदी के रोड शो में मुसलमान, यह कैसा रुझान : सियाराम पाण्डेय ''शांत''
By Deshwani | Publish Date: 7/3/2017 4:46:54 PM
मोदी के रोड शो में मुसलमान, यह कैसा रुझान : सियाराम पाण्डेय ''शांत''

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिवसीय वाराणसी प्रवास को लेकर सियासत की वादियों में चर्चा का बाजार गरम है। विपक्षी दल जो चुनाव मैंदान में हैं वे भी और जो नहीं हैं, वे भी प्रधानमंत्री के वाराणसी प्रवास पर सवाल उठा रहे हैं। बसपा, सपा और कांग्रेस तो प्रधानमंत्री के खिलाफ पहले से ही मुखर हैं। सपा और कांग्रेस तो खुलकर प्रधानमंत्री को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दे रहे हैं। इसकी वजह भी है और वह यह कि आजाद भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी प्रधानमंत्री ने एक शहर में तीन दिन बिताए हों। सपा नेता कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री ने तीन दिन वाराणसी में रोड शो किया जबकि सच क्या है, इसे वे भी जानते हैं।

पहले दिन प्रधानमंत्री को वाराणसी के दो प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन करना था। रोड शो तो दरअसल दूसरे दिन था और तीसरे दिन उन्हें गढ़वाघाट में सभा करनी थी। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के रामनगर स्थित घर जाना था। प्रधानमंत्री शहर की सड़कों से गुजरे तो भीड़ लगना स्वाभाविक ही है। अब इसे कोई रोड शो कहे तो इसे उसके दिमाग का दिवालियापन नहीं तो और क्या कहा जाएगा? पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के घर कोई प्रधानमंत्री गया हो, इसका दृष्टांत तो नहीं मिलता। अगर इसे भी कुछ राजनीतिक दल नौटंकी मानें तो इससे उनकी अज्ञानता का ही परिचय मिलता है। प्रधानमंत्री वाराणसी के सांसद भी हैं। क्या प्रधानमंत्री को बतौर सांसद अपने प्रिय शहर की उपेक्षा कर देनी चाहिए, जैसा कि अन्य प्रधानमंत्री करते रहे हैं। ऐसे में यह कहना मुनासिब नहीं होगा कि पहले दिन का रोड शो फेल हो गया तो प्रधानमंत्री ने दूसरे दिन रोड शो किया। उसमें भी मजा नहीं आया तो तीसरे दिन रोड शो कर लिया।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो यहां तक कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी का दिल दिल्ली में नहीं लग रहा है। इधर उन्होंने विदेश यात्राएं भी बंद कर दी हैं। उन्हें मुझसे अपना पद बदल लेना चाहिए। सवाल यह उठता है कि अखिलेश उत्तर प्रदेश का भला तो कर नहीं पाए, अब क्या उनका इरादा पूरे देश का बेड़ा गर्क करने का है? राहुल गांधी को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुजुर्गियत और उनके विश्राम की चिंता है लेकिन वे उनके प्रति जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अनुकूल तो नहीं है। बसपा प्रमुख मायावती भी प्रधानमंत्री के हर कार्य व्यवहार में एक खास किस्म की नौटंकी देख रही हैं। यह दरअसल इन तीनों नेताओं का दृष्टि दोष है या आने वाले परिवर्तन की आहटजन्य छटपटाहट। क्या ये राजनेता प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से घबराए हुए हैं और जिस तरह प्रधानमंत्री के रोड शो, मतलब नगर दर्शन को वाराणसी के सर्वसमाज का समर्थन मिला है, उससे इनकी बौखलाहट स्वाभाविक भी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुनने और देखने वाली जमात में वाराणसी के मुसलमानों की भारी तादाद थी। खासकर मुस्लिम महिलाओं ने तो उनके रोड शो में भी हिस्सा लिया। इसे क्या कहा जाएगा? तीन तलाक के मसले पर केंद्र सरकार के समर्थन का प्रभाव या मुस्लिम तबके का भाजपा खासकर नरेंद्र मोदी के प्रति झुकाव। प्रधानमंत्री की इस बात में दम तो है ही कि एक ओर भाजपा है जो सबका साथ-सबका विकास की परंपरा में यकीन रखती है और एक तरफ बसपा, सपा और कांग्रेस हैं जिनका अभीष्ठ है कुछ का साथ-कुछ का विकास। आजादी के बाद से लेकर आज तक मुसलमान कांग्रेस, सपा और बसपा के हाथ की कठपुतली ही तो रहा है। आजादी के बाद से लंबे समय तक मुस्लिम और दलित मतों की बदौलत ही कांग्रेस की केंद्र और राज्य में सरकारें बनती रही लेकिन उसने उनके लिए किया क्या? बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद के बाद मुस्लिमों का कांग्रेस से मन फिर गया और अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियां चलवाकर मुस्लिम मतों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया लेकिन मुस्लिमों की हालत सुधारने की दिशा में उन्होंने कुछ भी नहीं किया। मुस्लिम मदरसों को अनुदान देने का सिलसिला उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह और केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में ही शुरू हुआ। अब बसपा भी मुसलमानों के हित की बात कर रही है। निश्चित तौर पर उसने सौ मुस्लिमों को अपना प्रत्याशी बनाया है जो उत्तर प्रदेश के किसी भी राजनीतिक दल द्वारा उतारे गए प्रत्याशियों के मुकाबले कहीं ज्यादा है लेकिन बसपा प्रमुख मायावती क्या आजम खान की राय से इत्तेफाक रखती हैं। क्या वे किसी मुसलमान को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के बारे में सोच भी सकती हैं। वैसे तो मायावती बसपा को गरीबों की पार्टी बताती है और केंद्र सरकार को पूंजीपतियों की सरकार करार देती हैं लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में उनके 400 में से 335 प्रत्याशी करोड़पति और अपराधी हैं।

'जाकै पैर न फटी बेवाई सो का जानै पीर पराई।'ऐसे लोग गरीबों के कितने काम आएंगे, यह भी सोचने वाली बात है। मायावती कभी गरीब थीं। दलित की बेटी थीं। साइकिल के कैरियर पर भी बिजनौर में घूम लिया करती थीं लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद वे कितने दलितों के घर गईं। उनके दुख-दर्द में शामिल र्हुईं, इसका जवाब उनके पास भी नहीं है। उनकी पार्टी से निकले या निकाले गए लोगों ने भी उन्हें दौलत की बेटी कहा। हालांकि वे अभी भी खुद को दलितकी बेटी ही कहती हैं। रही उनके मुस्लिम हितैषी होने की बात तो वे कई मौकों पर खुलेआम मुसलमानों को गद्दार तक कह चुकी हैं। सपा के लिए भी मुसलमान कठपुतली भर ही हैं। उनके मत का जब जैसे चाहा, इस्तेमाल किया। एक अकेली भाजपा ही है जो मुसलमानों का विकास करते वक्त भी आगा-पीछा नहीं सोचती। क्या यह बात उत्तर प्रदेश और देश के मुसलमानों की समझ में नहीं आ रही है। उनके कम पढ़े-लिखे होने का लाभ अन्य राजनीतिक दल उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में मुसलमानों की भारी उपस्थिति इस बात का संकेत है कि उन्होंने भी भाजपा के बारे में सोचना शुरू किया है। यह केवल उनकी उत्सुकता भर नहीं है बल्कि इसके पीछे उनका बदलता मानस भी है तो क्या इसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने में मुसलमानों की भूमिका अहम होगी। इसके विश्लेषण में जाएं तो मुमकिन भी लगता है क्योंकि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार का बनना या न बनना बहुत कुछ मुस्लिमों पर निर्भर है। उत्तर प्रदेश में इस बार किसकी सरकार बनेगी, इसे लेकर देश भर में बहस मुबाहिसों का दौर चल रहा है। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं जो अपनी जीत के दावे न कर रहा हो। दावों-प्रतिदावों के बीच वोटों का गुणा-भाग भी चल रहा है। 2007 और 2012 में जीत-हार को लेकर सवर्ण खासकर ब्राह्मण मत चर्चा के केंद्र में हुआ करते थे लेकिन इस बार के चुनाव में चर्चा के केंद्र में मुस्लिम मतदाता हैं। गौरतलब है कि इन दोनों चुनावों में ब्राह्मण मतों को हासिल कर क्रमशः बसपा और सपा की सरकार बनी थी। ऐसे में यह मानना कदाचित गलत नहीं हो सकता कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा की सरकार का बनना भी इस बार मुस्लिम मतदाताओं के ऊपर निर्भर है। सपा की रार से इस बार मुस्लिमों का विश्वास सपा नेतृत्व पर से डगमगाया है।

इसका जिक्र भी सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव कर चुके है। सपा की इस कमजोरी का लाभ उठाने में बसपा ने कोई कोर कसर शेष नहीं रखी है। उत्तर प्रदेश में लगभग 19 फीसद मुस्लिम मतदाता हैं। 150 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट 20 से 30 फीसद के आस पास है। 22 फीसद दलितों के बाद मुसलमान वोटरों का हिस्सा सबसे बड़ा है। उनकी संख्या 19 से 20 प्रतिशत के बीच है। यही मायावती की उम्मीद का आधार भी है। इसी वजह से उन्होंने लगभग सौ मुसलमान उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। सपा और बसपा दोनों का जोर मुसलमानों को अपने पाले में करने का रहा है और इसमें दोनों ही दल बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। मुस्लिम मौलानाओं के फतवे ने भी मुसलमानों को असमंजस में डाला है। मतों के ध्रुवीकरण में भी 'नवली नवै न गहमर टरै ' वाले हालात रहे हैं। ऐसे में मुसलमानों का रूझान जिस तरफ एकमुश्त होगा, वह सरकार बनाने के लिए काफी मजबूत स्थिति में होगी अन्यथा पिछले लोकसभा चुनाव की तरह इस विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की सरकार यूपी में बन सकती है। मुस्लिमों के असमंजस की स्थिति के प्रमुख कारण मायावती पर उनका अविश्वास भी है। वे दो बार भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना चुकी हैं। राखी बंधवाने वाली बात कहकर अखिलेश यादव मुसलमानों को मायावती के स्वभाव का परिचय भी कराते रहे हैं। असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन भी सपा-बसपा का खेल बिगाड़ने के लिए मैदान में है। मुसलमानों का वोट बंटा तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को होगा और भाजपा उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत कि सरकार भी बना सकती है।

2002 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को 55 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे। 2007 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा घटकर 45 फीसदी हो गया और 2012 में तो यह 40 प्रतिशत ही रह गया। इसका मतलब साफ है कि मुसलमानों का सपा से मोहभंग होता जा रहा है। जबकि 2002 से ही बसपा का मुस्लिम वोट बढ़ रहा है। 2002 के चुनाव में बसपा को 8 प्रतिशत, 2007 में 17 प्रतिशत और 2012 में 21 प्रतिशत मुस्लिम मत मिले थे। कांग्रेस को 2002 के विधानसभा चुनावा में 10 फीसदी मुसलमानों के वोट मिले थे जो 2012 तक बढ़कर 19 प्रतिशत पर पहुंच गए। जानकारों की मानें तो 2017 के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं के लिहाज से समाजवादी पार्टी की हालत सबसे ज्यादा खराब है। दादरी के बिसाहड़ा गांव में अखलाक की हत्या और 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने सपा का बड़ा नुकसान किया है। वह लाख चाहकर भी मुसलमानों का दिल जीत नहीं पाई है। मुसलमानों को यह तो सोचना ही होगा कि हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। उसे अपना भला-बुरा बखूबी सोचना है। उसे भाजपा को हराना है। यह तो तय है लेकिन क्यों? उनका तर्क हो सकता है कि भाजपा ने जब एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया तो उसे हम वोट क्यों दें। इस बात पर चिंता केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के एक मुस्लिम मंत्री भी जाहिर कर चुके हैं। हर दल की अपनी स्ट्रेटजी होती है। वह उसी के आधार पर चुनाव लड़ती हैं। इस बार भाजपा ने जिस तरह अति दलितों और अति पिछड़ों को खुद से जोड़ने की रणनीति पर काम किया है, उसका लाभ उसे मिल सकता है और इसका प्रभाव बसपा और सपा के वोट बैंक पर पड़ सकता है। बाबा रामदेव का झुकाव पहले ही भाजपा की ओर है और प्रधानमंत्री ने जिस तरह यादवों की प्रमुख मठ गढ़वाघाट आश्रम का रुख किया है,वह पूर्वांचल के सात जिलों में यादव मतों को अपनी ओर आकृष्ट करने का ही प्रयोग है।

मुसलमानों को सोचना होगा कि उन्होंने तो राजनीतिक दलों को अपना शत-प्रतिशत समर्थन दिया लेकिन उन्हें मिला क्या और जिसके बारे में उनकी धारणा कभी ठीक नहीं रही। अगर वह भाजपा उनके हित के बारे में सोचती है, सबका साथ-सबका विकास की बात करती है तो उसमें कुछ तो खास होगा। प्रधानमंत्री ने एक मुस्लिम शख्स द्वारा भेंट की गई चादर को सिर माथे लगाकर यह संकेत तो दिया है कि उनके लिए जाति-धर्म नहीं, मानवता अहम है। वैसे इस चुनाव में मुस्लिमों खासकर महिलाओं का भाजपा के प्रति आकर्षण बढ़ा है। यह वोट में तब्दील होगा या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इस आकर्षण का देर-सबेर भारतीय राजनीति में असर तो दिखेगा ही। अगर ऐसा होता है तो अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही नरेंद्र मोदी भी मुसलमानों के प्रिय नेता होंगे लेकिन अभी इसमें समय लगेगा क्योंकि युगों पुरानी जड़ता के टूूटने में समय तो लगता ही है।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)
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