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दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए
By Deshwani | Publish Date: 2/3/2017 4:01:26 PM
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए

प्रदीप कुमार सिंह 

आईपीएन। देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री लोहपुरूष सरदार वल्लभभाई पटेल ने पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर कहा था कि भारत के इतिहास का एक नया अध्याय हमारे सामने खुल रहा है। हमारे पास अपने आप को बधाई देने की वजह है कि हम सब इस मुबारक मौके के भागीदार बन रहे हैं। यह हमारे लिए गर्व का भी अवसर है। लेकिन इस गौरव बोध और जश्न के साथ हमें अपने कर्तव्यों और दायित्वों को भी याद रखने की जरूरत है। हमें अपने-अपने दिल व दिमाग को साफ करके खुद से, नए गणराज्य से और देश से यह वादा करना चाहिए कि हम ईमानदार आचरण करेंगे। हमें याद रखने की जरूरत है कि हम कौन हैं, हमें क्या विरासत मिली है और हमने क्या हासिल किया है? 

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कहना है कि नकदी रहित लेन-देन होने से अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी। 25 जनवरी को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि 2016-17 की शुरूआत में पिछले वर्ष की तरह 7.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। देश मजबूती से वित्तीय दृढ़ता के पथ पर अग्रसर है। हालांकि नोटबंदी से आर्थिक गतिविधियों में कुछ समय के लिए मंदी आ सकती है। भ्रष्टाचार तथा आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए उठाया गया नोटबंदी के साहसिक कदम की जितनी सराहना की जाये वह कम हैं। हम इस तरह के लोकहितैषी कदमों का हार्दिक स्वागत करते हैं। 
नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने बताया कि कुछ दिनों पहले मैं राजस्थान के एक गांव गढ़बसई में हुए बाल पंचायत के चुनाव में मौजूद था। यह बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा देश में बनाए गए उन 517 गांवों में से एक है, जहां सालाना बाल पंचायतें चुनी जाती हैं। गढ़बसई में 14 साल की लड़की मुखिया चुनी गई। उस गांव के समाज में यह नई बात थी। यह पिछली बाल पंचायतों की मेहनत का नतीजा था, जिन्होंने सभी बच्चों की मजदूरी, बाल विवाह, छेड़खानी जैसी बुराइयों को खत्म कर दिया। युवाओं को आगे बढ़कर देश में फैली बुराइयों, अपराधों और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और समाज को उस आवाज का सम्मान करना सीखना चाहिए। लोकतंत्र सिर्फ शासन-व्यवस्था नहीं होता, जिंदगी जीने का तरीका होता है। इसके मायने यह हैं कि प्रजातंत्र एक संस्कृति बन जाए। ताकि गण से दूर न रह जाए हमारा तंत्र।
हम 26 जनवरी, 1950 के उस उत्साह से बहुत दूर आ चुके हैं, जिसमें उल्लास से कहीं ज्यादा आशंकाएं थी। जब हमने देश के तंत्र को गण के हवाले किया था, तो बहुत से लोग इसके भविष्य को लेकर सशंकित थे। आशंकाएं इसलिए भी गहरी थीं कि कुछ ही समय पहले देश का विभाजन हुआ था और हमारा समाज हिंसा व अस्थिरता के एक मुश्किल दौर से गुजरा था। गणतंत्र में अगर उपलब्धियां सबकी और सामूहिक होती हैं, तो असफलताओं में भी सबका सामूहिक योगदान होता है। असफलताओं के दंश से मुक्ति पाने का काम भी अंत में सभी को मिलकर ही करना होगा। भारत ने सबसे बड़ा काम यह किया कि उसने खुद को विश्व के सबसे बड़े स्थिर लोकतांत्रिक देश के रूप में साबित किया। उसने यह दिखाया कि वह इतनी सारी विभिन्नताओं के साथ भी जी सकता है और हर हाल मंे लोकतंत्र को बरकरार रख सकता है। इसलिए यह छोटी उपलब्धि नहीं है। 
संयुक्त अरब अमीरात की गल्फ न्यूज ने लिखा है कि भारत-यूएई के बीच यह रिश्ता चार दशकों का है, मगर किसी एक पहलू में सिमटा नहीं है। इसके कई पहलू हैं। इसीलिए संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और भारत की दोस्ती खास है। दोनों मुल्कों के नेताओं व जनता में एक गहरा नाता है, जो ऐतिहासिक है, और बेमिसाल भी। कारोबार के लिए भारतीय समुद्र की यात्रा करते रहे हैं, इसलिए दोनों मुल्कों के रिश्तों की जड़ें उन दिनों में तलाशी जा सकती है, जब हिन्दुस्तानी कारोबार के सिलसिले में अमीरात आए। इसने दोनों मुल्कों के बीच कूटनीतिक रिश्ता गढ़ने का काम किया। क्राउन प्रिंस की गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के मैत्री रिश्तों के नए आयाम छूने का संदेश भी साफ हो गया। 
ट्रेडिंग के क्षेत्र के मुस्लिम देशों के लिए इंडिया का गेटवे संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) आगामी कुछ सालों में इंडिया में करीब 75 अरब डाॅलर का इन्वेस्टमेंट करने को राजी है। अबू धाबी के प्रिंस शेख मोहम्मद बिन जाएद और नरेंद्र मोदी के बीच हैदराबाद हाउस के गार्डन में सैर करते हुए अहम चर्चा हुई और 14 एग्रीमेंट्स पर समझौते हुए। इंडिया-यूएई के बीच डिफेंस सिक्युरिटी, आईटी सर्विस और हाईवे प्रोजेक्ट को लेकर एग्रीमेंट्स साइन हुए हैं। भारत और संयुक्त अरब अमीरात अब कारोबारी रिश्तों से आगे बढ़ते हुए रणनीतिक साझेदार बन गए हैं। यह शान्तिप्रिय एवं लोकतांत्रिक देश भारत की लोकप्रियता का सुन्दर उदाहरण है। आज खाड़ी देशों में लाखों भारतीय इन देशों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। दुबई में मौजूद दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा को भारत के 68वें गणतंत्र दिवस पर तिरंगे जैसी रोशनी से सजाया गया। भारत और संयुक्त अरब अमीरात एशिया की नई कहानी लिखने जा रहे हंै। 
मांट्रियाल ओलंपिक में देश की हाॅकी टीम से प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व ओलंपियन सैयद अली ने दशकों तक हाॅकी खेलकर देश का नाम रोशन किया। खेल से मुकाम मिला और शोहरत भी। एक दिन सोचा कि इतना ही काफी नहीं है, कुछ और तरीके से देश की सेवा करनी चाहिए। बस उसी दिन से लखनऊ में रहते हुए बच्चों को हाॅकी सिखाना शुरू कर दिया। 25 से अधिक साल से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। वर्तमान में वह जूनियर हाॅकी टीम के कोच भी हैं। पूर्व ओलंपियन सैयद अली के खेल जज्बे को लाखों सलाम।  
कौन कहता है आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछाली यारों। जी हां यह पंक्तियां लखनऊ के चिनहट ब्लाक के निजामपुर मल्हौर की ग्राम प्रधान सुश्री अफरोज जहां पर सटीक बैठती हैं। 35 वर्षीय सुश्री अफरोज स्नातक हैं और उनकी पढ़ाई का लाभ गांव को मिल रहा है। गांव में बिजली, पानी, सड़क के साथ ही गांव के विकास पर उनका फोकस हमेशा रहता है। महिला प्रधान ने स्कूलों की हालत सुधार कर नया रूप दे दिया, गांव के विद्यालय में उन्होंनें कम्प्यूटर लगवाये हैं। उनका मानना है कि शिक्षा सबसे शक्तिशाली औजार है जिससे सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। साथ ही इस उत्साही प्रधान ने गांव की मुख्य सड़क का निर्माण बेहतर आवागमन के लिए करवाया है। 
संजय गांधी पीजीआई में एनेस्थेसिया विभाग के प्रमुख ओर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक प्रो, पीके सिंह को पटना एम्स का निदेशक बनाया गया है। वह नई भूमिका के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि नया करने के लिए पुराने को त्यागने की जरूरत होती है। तभी जीवन में आगे बढ़ा जा सकता है और आप समाज को कुछ देने की कोशिश कर सकते हैं। प्रो, पीके सिंह संयुक्त परिवार से मिले संस्कारों को इसका श्रेय देते हैं। उन्होंने एक दर्दनाक घटना में अपना बेटा खोया था, उनकी कोशिश है कि अब किसी और का कोई प्रिय ऐसी घटनाओं के कारण से उनसे न खोए। 
राजधानी लखनऊ में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने बुढ़ापे को बेहतर तरीके से जीने के लिए अभी से पूरी रणनीति बनाकर जी रहे हैं। अगर खून के रिश्तों ने साथ नहीं दिया तो उनके आसपास निवास करने वाले सहयोगी और रिश्तेदार साथ देंगे। जी हां, वृंदावन कालोनी हो या फिर शहीद पथ स्थित विकसित हो रही निजी डेवलपर्स की कालोनी। इनमें ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल सकते हैं, जहां बच्चों से ज्यादा लोगों ने हम उम्र साथियों और सगे संबंधियों पर विश्वास जताया है। 
लखनऊ के जानकीपुरम में रहने वाले स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के सेवानिवृत्त अधिकारी राजीव कपूर ने अपनी जिंदगी में त्रासदी के पीड़ितों के जख्मों पर मरहम उनकी सहायता कर लगाया। वह अभी तक 17 निर्धन कन्याओं का वह विवाह करवा चुके हैं। इसमें सीतापुर के मिश्रिख व महमूदाबाद की दो लड़कियां हैं जिनकी शादी होनी थी और घर आग में जल चुका था। मलिहाबाद में जब जहरीली शराब पीने से लोगों की मौत हुई तो वह पीड़ित परिवारों को मदद देने के लिए वहां पहुंच गये। राजीव कपूर जी ने अस्पतालों में पंखे लगवाए हैं तथा जरूरतमंदों को कंबल बांटे हैं। राजीव कपूर कहते है कि अगर आप अपने मन में ठान लें कि दूसरों की मदद करेंगे तो आपके पास धन की कमी नहीं होगी। मैंने जीवन में अपनी नौकरी में परिवार का भरण-पोषण करने के बाद जो रकम बची उससे समाज में जरूरतमंद लोगों की मदद की। 
राष्ट्रीय मतदाता दिवस के अवसर पर लोगों ने पूरे उत्साह से नारा लगाया कि लोकतंत्र की है पहचान, शत-प्रतिशत हो मतदान। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में 3500 स्कूली बच्चों ने गिनीज वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने के लिए एक विशाल रंगोली बनाकर संदेश दिया कि शत-प्रतिशत मतदान से लोकतंत्र के महापर्व को बनाएंगे ऐतिहासिक। लखनऊ के विभिन्न स्कूलों में मतदाताओं को जागरूक करने की बच्चों ने शपथ ली। देश भक्ति के इस जज्बों को लाखों सलाम। 
सोलह और तेरह वर्ष आयु के दो भाइयों अदवय राजगुरू तथा अथर्व राजगुरू ने भारतीय निराश्रित बच्चों की मदद के लिए एक ई-काॅमर्स सक्षम वेबसाइट ूूूण्कवदंजमंचवेजमतण्बवउ तैयार की है, जिसके माध्यम से वे अपनी पेटिंग और पोस्टर बेचकर धन संग्रहित करेंगे और अनाथों को शिक्षित करने के लिए लोगों में जागरूकता कायम करेंगे। अदवय राजगुरू तथा अथर्व राजगुरू के इस मानवीय जज्बे को लाखों सलाम। मानव जाति को इन बच्चों से मानव मात्र की सेवा की सीख लेनी चाहिए। 
इंदौर की रहने वाली वयोवृद्ध महिला और ‘डाॅक्टर दादी’ के नाम से चर्चित भक्ति यादव और दृष्टिहीन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान शेखर नाइक जैसी तमाम ऐसी हस्तियां हैं, जिनकी पद्म श्री सम्मान देने की घोषणा हुई। इस साल के पद्म पुरस्कारों में चर्चा से दूर चुपचाप काम करने वाली हस्तियों को प्रमुखता दी गई है। इंदौर की ‘डाॅक्टर दादी’ 91 साल की हैं। वह पिछले 68 सालों से निशुल्क मरीजों का इलाज कर रही हैं। लक्ष्य न ओझल होने पाये कदम मिलाकर चल, मंजिल तेरे पग चुमेगी आज नहीं तो कल। उपरोक्त विचार हमें लोकप्रिय देशभक्ति गीत की इन पंक्तियों को गुनगुनाने की बाध्य करती है - दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए। हर कर्म अपना करेंगे ऐ वतन तेरे लिए। 
(उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो।)
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