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कुशीनगर के मिठास पर पोक्का बोइंग रोग का हमला, गन्ना विभाग सर्तक
By Deshwani | Publish Date: 19/7/2020 9:46:24 PM
कुशीनगर के मिठास पर पोक्का बोइंग रोग का हमला, गन्ना विभाग सर्तक

कुशीनगर। भानु तिवारी। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में गन्ना किसानों की मिठास पर टिड्डियों के हमले के बाद अब ‘पोक्का बोइंग’ रोग का हमला हो गया है। अकेले कुशीनगर में गन्ना विभाग के दावे के मुताबिक सिर्फ 1500 हेक्टेयर में ही अब तक यह रोग दिखा है। हालांकि इस रोग का असर  प्रदेश के अन्य जिलों में भी दिखाई देने लगा है जिसे लेकर बीमारी की रोकथाम के लिए सर्वेक्षण के साथ किसानो को जागरुक भी किया जा रहा है। 

 
 
 
जिला गन्ना अधिकारी वेद प्रकाश सिंह ने बताया कि   कुशीनगर में 750 हेक्टेयर में गन्ना की फसल पोक्का बोइंग बीमारी से प्रभावित है। गन्ना विकास विभाग, गन्ना विभाग और चीनी मिले अपने अपने क्षेत्र में सर्वेक्षण करा रहीं हैं। कुशीनगर के सेवरही स्थित गन्ना शोध केंद्र की टीम के अलावा गन्ना विभाग भी किसानों को इस रोग पर नियंत्रण के लिए जागरूक कर रहा है।  किसानों की जागरूकता के लिए पम्फलेट्स, हैंडबिल, दीवार लेखन, वालपेन्टिंग, चीनी मिल गेट, परिषद-समिति कार्यालय, खाद्य एवं राजकीय गोदामों एवं कार्यालय की दीवारों पर बीमारी के रोकथाम के उपायों से प्रचार - प्रसार कराया जाए। 
 
 
 
यह रोग फ्यूजेरियम स्पेशीज कवक द्वारा गन्ने में फैलता है। सर्वप्रथम गन्ने की अगोले की पत्तियों पर सिकुड़न के साथ सफेद धब्बे दिखाई पड़ते हैं। संक्रमण बढ़ने पर पत्तियां मुरझा कर काली पड़ जाती है। पत्ती का ऊपरी भाग सड़ कर गिर जाता है, जिसके कारण पौधे की बढ़वार रूक जाती है। अगोले में हरापन समाप्त होने लगता है। अगोला झुलसा हुआ दिखता है । रोग की प्रथम अवस्था को क्लोरोटिक फेज, दि्वतीय अवस्था को टाप राट फेज कहते हैं जिसमें गन्ने की पौध के ऊपरी हिस्से की सारी पत्तियों सड़ कर गिर जाती है। ऊपरी हिस्सा नुकीला हो जाता है। तीसरी अवस्था में गन्ने के पौध की ऊपर की पोरियॉ छोटी रह जाती है। इन पर चाकू जैसे कटे के निशान दिखाई पड़ते हैं, जिसे नाइफ कट अवस्था कहते हैं।   
 
 
 
जिला गन्ना अधिकारी कहते हैं कि ‘पोक्का बोइंग रोग’ की रोकथाम के लिए वर्षा काल की शुरुआत में ही किसानों को सतर्क रहना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर कापर आक्सीक्लोराइड 0.2 फीसदी का घोल यानी 500 ग्राम दवा को 200 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर में 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए। इसके अलावा बावस्टीन का छिड़काव कर फसल को नियंत्रित किया जा सकता है।
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