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भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय महिला विधायक सम्मेलन-2022 का उद्घाटन किया
By Deshwani | Publish Date: 26/5/2022 10:02:32 PM
भारत के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय महिला विधायक सम्मेलन-2022 का उद्घाटन किया

दिल्ली। भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविंद ने आज (26 मई, 2022 को) तिरुवनंतपुरम में राष्ट्रीय महिला विधायक सम्मेलन-2022 का उद्घाटन किया। सम्मेलन का आयोजन केरल विधानसभा ने 'आजादी का अमृत महोत्सव' के अंतर्गत किया है। सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब राष्ट्र स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा है। 'आजादी का अमृत महोत्सव' के अंतर्गत हम पिछले एक साल से अधिक समय से स्मारक कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। विभिन्न समारोहों में लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी, अतीत से जुड़ने और अपने हित में, हमारे गणतंत्र की नींव को फिर से खोजने के उनके उत्साह को दर्शाती है।







राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की गाथा में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक शोषक औपनिवेशिक शासन की बेड़ियों से आजाद होने के भारत के प्रयास बहुत पहले ही शुरू हो गए थे, और सबसे पहले 1857 में हमें इसकी अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। 19वीं सदी के मध्य के समय में भी, जबकि दूसरी ओर केवल पुरुष थे, भारतीय पक्ष में कई महिलाएं शामिल थीं। रानी लक्ष्मीबाई उनमें से सबसे उल्लेखनीय थीं, लेकिन उनके जैसी कई और भी थीं, जो अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ बहादुरी से लड़ रही थीं। गांधी जी के नेतृत्व वाले ‘असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन’ तक कई सत्याग्रह अभियान चलाए गए, जिनमें महिलाओं की व्यापक भागीदारी थी। पहली महिला सत्याग्रहियों में कस्तूरबा शामिल थीं। जब गांधीजी को गिरफ्तार किया गया, तो उन्होंने दांडी तक के नमक मार्च का नेतृत्व सरोजिनी नायडू को सौंपने का फैसला किया। कमलादेवी चट्टोपाध्याय चुनाव लड़ने वाली देश की पहली महिला थीं। राष्ट्रपति ने मैडम भीकाजी कामा के साहसपूर्ण बलिदान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में इंडियन नेशनल आर्मी की कैप्टन लक्ष्मी सहगल और उनकी सहयोगियों के योगदान को भी याद किया। उन्होंने कहा कि जब हम राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी का उदाहरण देते हैं, तो प्रेरणा देने वाले बहुत से नाम दिमाग में आते हैं, लेकिन उनमें से कुछ का ही उल्लेख कर पाते हैं।





अपने सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान करने की भारत की उपलब्धि के बारे में बताते हुए, राष्ट्रपति ने कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे पुराने आधुनिक लोकतंत्र में भी महिलाओं को देश की स्वतंत्रता की एक सदी के बाद तक वोट का अधिकार प्राप्त करने का इंतजार करना पड़ा। यूनाइटेड किंगडम में रहने वाली उनकी बहनों ने भी लगभग उतना ही लंबा इंतजार किया। इसके बाद भी, यूरोप के कई आर्थिक रूप से उन्नत देशों में महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। लेकिन भारत में ऐसा समय कभी नहीं आया जब पुरुषों को मताधिकार मिला हो, और महिलाओं को नहीं। इससे दो बातें सिद्ध होती हैं। पहली, कि हमारे संविधान निर्माताओं का  लोकतंत्र में और जनता के विवेक में गहरा विश्वास था। वे प्रत्येक नागरिक को एक नागरिक के तौर पर मानते थे, न कि एक महिला या किसी जाति और जनजाति के सदस्य के रूप में, और वह मानते थे कि हमारे समन्वित भविष्य को आकार देने में उनमें से हर एक की आवाज सुनी जानी चाहिए। दूसरा, प्राचीन काल से ही इस धरती ने स्त्री और पुरुष को समान माना है- निस्संदेह एक दूसरे के बिना अधूरे।





राष्ट्रपति ने कहा कि महिलाएं एक के बाद एक विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति कर रही हैं। नवीनतम है, सशस्त्र बलों में उनकी बढ़ती भूमिका। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित और प्रबंधन के पारंपरिक रूप से पुरुषों के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में भी, जिन्हें एसटीईएमएम कहा जाता है, उनकी संख्या बढ़ रही है। कोरोना संकट के समय में जिन लोगों ने आगे बढ़कर राष्ट्र के लोगों की सुरक्षा का जिम्मा उठाया, उन योद्धाओं में भी पुरुषों से ज्यादा महिलाएं ही रही होंगी। उन्होंने कहा कि जब स्वास्थ्य क्षेत्र में सेवा करने वाले लोगों की बात आती है तो केरल ने हमेशा अपनी ओर से अधिक से अधिक योगदान दिया और इस राज्य की महिलाओं ने संकट की इस अवधि के दौरान व्यक्तिगत जोखिम उठा कर भी निस्वार्थ सेवा का उदाहरण स्थापित किया है।
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