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भारत मां और नारी सशक्तिकरण, कहां खड़े हैं हम!
By Deshwani | Publish Date: 13/3/2021 7:59:39 PM
भारत मां और नारी सशक्तिकरण, कहां खड़े हैं हम!

सुमित शंशाक। 

भारतीय संस्कृति में जहां नारी को मातृत्व शक्ति के रूप में हजारों वर्षों से पूजा जा रहा है, हजारों वर्षों से भूमि को सिंचित करने वाली नदियों में माता का स्वरूप, प्रकृति में मातृत्व ,या यूं कहे तो जिसमें भी सृजन की क्षमता है वहां नारीत्व के भाव का स्वत: ही उद्भव होता है।

भारतीय संस्कृति में जहां हजारों वर्षों से पुरुषों से भी ऊंचा स्थान स्त्रियों को दिया जाता है, हिंदी साहित्य के छायावादी युग के महत्वपूर्ण चार स्तंभों में से एक महादेवी वर्मा की रहस्यवादी प्रवृत्ति एवं भावुकता भरे गद्य एवं पद्य रचनाएं इतिहास के विभिन्न काल खंडों में नारीत्व के विभिन्न पक्षों को समझने में सहायक है।

स्मृति की रेखाएं, अतीत के चलचित्र "युद्ध और नारी', "नारीत्व का अभिशाप', "आधुनिक नारी', "स्त्री के अर्थ', "स्वातन्त्र्य का प्रश्न', "नए दशक में महिलाओं का स्थान'आदि रचनाओं के माध्यम से अद्वितीय विचारक महादेवी वर्मा ने भारतीय नारी-जीवन के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला है।

एक तरफ जहां संपूर्ण विश्व का बुद्धिजीवी वर्ग महिला सशक्तिकरण पर बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ, आज भी इसका दूसरा पक्ष तथा दूसरी चुनौतियां मौजूद है। विगत कुछ वर्षों में बनी सरकार ने नारी सशक्तिकरण को एक महत्वपूर्ण मुद्दा माना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना महिलाओं के लिए मोदी सरकार की सबसे सफल योजना है।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना ..., सुरक्षित मातृत्व आश्वासन सुमन योजना ..., फ्री सिलाई मशीन योजना ...
महिला शक्ति केंद्र योजना ..., सुकन्या समृद्धि योजना आदि तो सरकार द्वारा किए जा रहे सराहनीय प्रयास है परंतु क्या हमें नारी सशक्तिकरण हेतु किए जा रहे प्रयासों को सरकारी प्रयासों तक ही सीमित रहने देना चाहिए? या फिर महादेवी वर्मा जैसे छायावादी कवयित्री से प्रभावित होकर पुरुष प्रधान समाज का इस संदर्भ में कुछ दायित्व बनता है! 

शास्त्रों में भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति)प्रजननशील प्राणी तथा पुरूष एवं स्त्री के सामान महत्व को दर्शाता है,परंतु इन सब के पश्चात आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा,जन्म लेने से पूर्व कन्या भ्रूण हत्या,कन्या कुपोषण दर तथा बालिका शिक्षा महत्वपूर्ण चुनौती है! जिससे बाहर निकलने के पश्चात ही हम एक सांस्कृतिक रूप से विकसित राष्ट्र की परिकल्पना कर सकते हैं ।
 
 
 
 
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