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कब है देवउठनी एकादशी? जानें इसका महत्व और पूजा विधि
By Deshwani | Publish Date: 6/11/2019 12:37:46 PM
कब है देवउठनी एकादशी? जानें इसका महत्व और पूजा विधि

नई दिल्ली। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस बार देवउठनी एकादशी 8 नवंबर को है। देवउठनी एकादशी को हरिप्रबोधिनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए सो जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन चतुर्मास का अंत हो जाता है।

क्या है देवउठनी एकादशी का महत्व?
कहा जाता है कि इन चार महीनो में देव शयन के कारण समस्त मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। जब देव (भगवान विष्णु ) जागते हैं तभी कोई मांगलिक कार्य संपन्न हो पाता है। देव जागरण या उत्थान होने के कारण इसको देवोत्थान एकादशी कहते हैं। इस दिन उपवास रखने का विशेष महत्व है। कहते हैं इससे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

देवउठनी एकादशी के दिन व्रत रखने के नियम
- निर्जल या केवल जलीय पदार्थों पर उपवास रखना चाहिए।
- अगर रोगी, वृद्ध, बालक, या व्यस्त व्यक्ति हैं तो केवल एक बेला का उपवास रखना चाहिए।
- भगवान विष्णु या अपने इष्ट-देव की उपासना करें।
- तामसिक आहार (प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा, बासी भोजन ) बिलकुल न खायें।
- आज के दिन "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " मंत्र का जाप करना चाहिए।
- अगर आपका चन्द्रमा कमजोर है या मानसिक समस्या है तो जल और फल खाकर या निर्जल एकादशी का उपवास जरूर रखें।

क्या है देवउठनी एकादशी की पूजा विधि?
- गन्ने का मंडप बनाएं, बीच में चौक बनाया जाता है।
- चौक के मध्य में चाहें तो भगवान विष्णु का चित्र या मूर्ति रख सकते हैं।
- चौक के साथ ही भगवान के चरण चिन्ह बनाये जाते हैं, जिसको कि ढंक दिया जाता है।
- भगवान को गन्ना, सिंघाडा तथा फल-मिठाई समर्पित किया जाता है।
- घी का एक दीपक जलाया जाता है जो कि रात भर जलता रहता है।
- भोर में भगवान के चरणों की विधिवत पूजा की जाती है और चरणों को स्पर्श करके उनको जगाया जाता है।
- शंख-घंटा-और कीर्तन की ध्वनि की जाती है।
- इसके बाद व्रत-उपवास की कथा सुनी जाती है।
- इसके बाद से सारे मंगल कार्य विधिवत शुरु किये जा सकते हैं।
- भगवान के चरणों का स्पर्श करके जो मनोकामना कही जाती है वह पूरी होती है।

 

इस खास दिन तुलसी विवाह करने की भी है परंपरा
इस दिन भगवान शालिग्राम और तुलसी के विवाह की परंपरा है। शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण की एक कथा के अनुसार तुलसी ने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दिया था। इसलिए भगवान विष्णु को शालिग्राम बनना पड़ा और इस रूप में उन्होंने तुलसी से विवाह किया। इसलिए इनका विवाह करवाने से भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।

जानिये इस दिन शालिग्राम की पूजा करने से क्या फल मिलता है
- तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से मिलता है कन्यादान करने का फल
- जहां भगवान शालिग्राम की पूजा होती है, वहां विष्णुजी के साथ महालक्ष्मी भी निवास करती हैं।
- इसे स्वयंभू माना जाता है यानी इनकी प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी व्यक्ति इन्हें घर या मंदिर में स्थापित करके पूजा कर सकता है।
- शालिग्राम अलग-अलग रूपों में मिलते हैं। कुछ अंडाकार होते हैं तो कुछ में एक छेद होता है। इस पत्थर में शंख, चक्र, गदा या पद्म से निशान बने होते हैं।
- भगवान् शालिग्राम की पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं होती है और तुलसी अर्पित करने पर वे तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं।
- शालिग्राम और भगवती स्वरूपा तुलसी का विवाह करने से सारे अभाव, कलह, पाप, दुःख और रोग दूर हो जाते हैं।
- तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से वही पुण्य फल प्राप्त होता है जो कन्यादान करने से मिलता है।
- पूजा में शालिग्राम को स्नान कराकर चंदन लगाएं और तुलसी अर्पित करें। भोग लगाएं। यह उपाय तन, मन और धन सभी परेशानियां दूर कर सकता है।
- विष्णु पुराण के अनुसार जिस घर में भगवान शालिग्राम हो, वह घर तीर्थ के समान होता है।
- शालिग्राम नेपाल की गंडकी नदी के तल से प्राप्त होते हैं। शालिग्राम काले रंग के चिकने, अंडाकार पत्थर को कहते हैं।
- पूजा में शालिग्राम पर चढ़ाया हुआ भक्त अपने ऊपर छिड़कता है तो उसे तीर्थों में स्नान के समान पुण्य फल मिलता है।
- जो व्यक्ति शालिग्राम पर रोज जल चढ़ाता है, वह अक्षय पुण्य प्राप्त करता है।
- शालिग्राम को अर्पित किया हुआ पंचामृत प्रसाद के रूप में सेवन करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
- जिस घर में शालिग्राम की रोज पूजा होती है, वहां के सभी दोष और नकारात्मकता खत्म होती है।

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