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त्वरित टिप्पणी/ डॉ. प्रभात ओझा... कांग्रेसः नई चमक को वजूद की तलाश!
By Deshwani | Publish Date: 16/12/2017 3:20:53 PM
त्वरित टिप्पणी/ डॉ. प्रभात ओझा... कांग्रेसः नई चमक को वजूद की तलाश!

कांग्रेस का असर सूबा-दर-सूबा सिकुड़ भले रहा हो, शनिवार का दिन उसी के नाम रहा। मां के बाद पुत्र को ही गद्दी सही, देश की 130 साल पुरानी पार्टी में करीब 20 साल बाद नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। इससे इंकार नहीं कर सकते कि यह एक बड़ी राजनीतिक घटना है। इसीलिए दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय और उसके बाहर जश्न के साथ देश के दूसरे हिस्सों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं ने खुशी मनाई। बात यहीं तक नहीं रही, तमाम टीवी चैनल के साथ सोशल मीडिया पर भी इस पर चर्चा का दौर जारी है। ऐसे में खुद कांग्रेस के अंदर क्या हाल हैं, इस पर भी विचार करना होगा। इसकी शुरुआत निवर्तमान और वर्तमान अध्यक्ष के भाषण से करना ठीक होगा। भाषण देते समय निवर्तमान और अब पूर्व हो चुकीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राजीव गांधी के साथ अपनी शादी का जिक्र करते हुए आजादी के संघर्ष में नेहरू- गांधी परिवार के समर्पण और बलिदान को याद किया। उन्होंने अपने अध्यक्ष पद सम्भालने के समय का जिक्र किया, जब उन्हीं के शब्दों में यह पद सम्भालते उनके हाथ कांप रहे थे। फिर उन्होंने विपक्ष के रूप में कांग्रेस के जुझारूपन और दस साल तक डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यों को याद किया। इसके बाद सोनिया गांधी आईं आज के समय पर, जब उन्होंने कांग्रेस के सामने चुनौतीपूर्ण समय बताया। ध्यान देना होगा कि इसी के साथ उन्होंने 'बेटे राहुल के धैर्य और मजबूती' की दाद दी कि विपरीत हमलों के बीच भी वह डटे रहे। 

अपनी मां और निवर्तमान अध्यक्ष की बात को आगे बढ़ाते समय नये अध्यक्ष ने कांग्रेस के 'ग्रैंड ओल्ड ऐंड यंग पार्टी' बनाने की तरफ इशारा किया। साफ है कि वह कांग्रेस की परंपराओं और नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य की बात कर रहे थे। यहां प्रश्न है कि वह किस परंपरा की चर्चा कर रहे हैं। याद करना होगा, जब 1909 में पंडित मदन मोहन मालवीय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ हिन्दू महासभा के भी अध्यक्ष हुआ करते थे। ऐसा भी हुआ कि मालवीय जी कांग्रेस की सभा के बाद सीधे हिन्दू महासभा की बैठक में पहुंचे। ऐसे मदनमोहन मालवीय बाद में भी 1918 और 1932 में भी पार्टी अध्यक्ष निर्वाचित हुए और हिन्दू महासभा से उनके रिश्ते बने रहे। आजादी के बाद कांग्रेस की यह स्थिति नहीं रही। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वह बहुमत समाज की जगह अल्पसंख्यक हितों की वकालत करती दिखने लगी। उसकी इस हालत को बाद में लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता ने 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' का नाम दिया। हालांकि भारतीय जनता पार्टी और उसके मजबूत पड़ते नेता नरेंद्र मोदी के दबाव में वोटों के लिए आज कांग्रेस को अपने नये नेता के जनेऊधारी छवि को प्रसारित-प्रकाशित कराना पड़ रहा है। यह परंपरा छोड़ती कांग्रेस की एक बानगी भर है। नई पीढ़ी के साथ सामजंस्य का यह हाल है कि अध्यक्ष पद के लिए राहुल गांधी के नामांकन के समय पुरानी पीढ़ी के नेता भले दिख जायं, उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय निर्वाचन प्रक्रिया में पार्टी उम्मीदवारों को समय पर चुनाव चिह्न पहुंचाने वाले लोग नहीं थे। फिर जो उम्मीदवार मैदान में थे, उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया। फिर क्षेत्रों में उम्मीदवार का अपना असर न हो, तो संगठन का नाम-ओ-निशान तक नहीं था। यह भी कांग्रेस के नये दौर में उसमें संगठन का एक नमूना ही है। घूम कर देखें तो देश के कई राज्यों में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। तो परपंरा के नाम पर बराबर पलटी खाती पार्टी, कार्यकर्ताओं के नैराश्य के साथ नेतृत्व के बीच आपसी संघर्ष के हाल से कैसे निकलेगी, यह विचारणीय प्रश्न है। पंजाब एक उदाहरण है, जहां कैप्टन अमरेंद्र सिंह अपनी क्षमता के बूते केंद्रीय नेतृत्व पर भी भारी दिखे थे। निश्चित ही राहुल गांधी को समझना होगा कि वह कांग्रेस के 'कस्टोडियन' हैं, अध्यक्ष के रूप में 'डिक्टेटर' नहीं। यह आजादी की लड़ाई का दौर नहीं है, जब जिलों में नियुक्त कांग्रेसी डिक्टेटर के एक हुक्म पर कार्यकर्ता अंग्रेजी सरकार के खिलाफ निकल पड़ते थे। आज आजाद भारत में एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार और उसका नेता चुनौती बनकर सामने है, जो राहुल गांधी के 'ग्रैंड ओल्ड ऐंड यंग पार्टी' को बराबर कठघरे में ही खींच रहा है। स्वाभाविक है कि कांग्रेस के अंदर 'नई चमक' को स्थायित्व देने का रास्ता बहुत सुगम नहीं है। 

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)

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