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संपादकीय
शिक्षा प्रणाली में सुधार का वक्त .....
By Deshwani | Publish Date: 14/1/2017 5:41:36 PM
शिक्षा प्रणाली में सुधार का वक्त .....

 नई दिल्ली। अनिल कुमार

किसी भी देश की संपन्नता और उसकी गुणवता वहां की शिक्षा प्रणाली और उसकी गुणवता के आधार पर आंकी जाती है। कोई भी देश आर्थिक रूप से सशक्त तभी हो सकता है जब उस देश की शिक्षा प्रणाली बेहतर हो... उस देश के सभी नागरिक बेहतर शिक्षा हासिल करने में सक्षम हो। भारत देश की बात करें तो शिक्षा के मामले में हम विश्व के कई छोटे देशों से भी कोसों पीछे खड़े हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली और उसकी गुणवत्ता में काफी अंतर है। यही कारण है कि विश्व की 100 श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी भारत की एक भी युनिवर्सिटी शामिल नहीं है। बहरहाल आज हम उच्च कोटी की बात नहीं करगें बल्कि आज इस संदर्भ में बात करेंगे जो शिक्षा शब्द के परिचय से हीं वंचित है और हमारे देश में लाखों ऐसे बच्चे हैं जो अपनी पढ़ाई पूरी हीं नहीं कर पाते हैं।

संविधान के 86वां संशोधन अधिनियम, 2002 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में छह से चौदह वर्ष के आयु के सभी बच्‍चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया ताकि सभी बच्चों को समान रूप से शिक्षा मिल सके। इसे आरटीई अर्थात शिक्षा का अधिकार कानून नाम दिया गया जिसके तहत शिक्षा पाना हर बच्चे का कानूनी अधिकार है। संविधान के अनुच्‍छेद 21-क और आरटीई अधिनियम को 1 अप्रैल, 2010 को लागू कर दिया गया। इसके बाद से यह जरूर देखा गया कि स्कूलों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो हुई लेकिन शिक्षा की गुणवता में कोई बदलाव नहीं आया.. इसके विपरित बच्चों के अंदर शिक्षा की गुणवता और उसकी योग्यता में काफी कमी दर्ज की गई। आठवीं तक के बच्चों को फेल न करने के पीछे का मकसद जरूर यह था कि फेल होने के डर से बच्चे डिप्रेशन का शिकार होते हैं और आत्महत्या जैसे कदम को उठाने को मजबूर होते हैं उसमें लगाम लगेगी और बच्चों को मानसिक रूप से तैयार किया जा सकेगा... बच्चों के अंदर फेल होने की आशंका दूर हो जाएगी और वह पढ़ाई में मन लगा सकते है... लेकिन हालात ठीक इसके विपरित हुए.... आत्महत्या जैसे मामलों में तो जरूर कमी हुई परन्तु पढ़ाई और बच्चों की मानसिक क्षमता का ह्रास हुआ.... वक्त-वक्त पर आ रही मीडिया रिपोर्टों में भी यह खुलासा हुआ कि आठवीं में पढ़ने वाला बच्चा पहली या तीसरी कक्षा का किताब पढ़ने में सक्षम नहीं है... नतीजतन यह देखा गया कि बच्चे सीधे बोर्ड परीक्षा में शामिल होने लगे और फिर रिजल्ट के स्तर में गिरावट दर्ज की गई... इसका खामियाजा 12वीं और अन्य तरह के बोर्ड और शिक्षा पद्धतियों पर भी पड़ने लगा... इसी के मद्देनजर वर्तमान में नीति आयोग ने एक राय में कहा है कि आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं करने के प्रावधान की समीक्षा होनी चाहिए और बच्चों को फेल नहीं करने की मौजूदा नीति में तमाम विसंगतियों को दूर करने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। आयोग ने हवाला दिया कि इस प्रावधान के कारण बड़ी कक्षाओं में जाकर भी छोटी कक्षाओं का भी ज्ञान नहीं हो पाता है.. इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर भी विपरीत असर पड़ता है....

यह बात सत्य है कि फेल नहीं के प्रावधान से बच्चों को इस बात की इजाजत मिल जाती है कि अब पढ़ने-लिखने की कोई जरूरत नहीं है। बच्चों के बौद्धिक विकास और उसके उन्नयन के लिए इस नीति को किसी भी मायने में सही नहीं माना जा सकता है। हालांकि फेल करने या न करने के बीच एक साकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है जिसके तहत बच्चों के अंदर पढ़ाई की और रूझान बढ़े... 

आरटीई कानून के पक्ष और विपक्ष में समाज के वुद्धिजीवी बंटे हुए हैं.. एक पक्ष इसे सही बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे गलत बता रहा है। एक पक्ष फेल करने के कारण पढ़ाई छोड़ने वालों की बढ़ती संख्या से चिंतित है तो दूसरा पक्ष उसकी गुणवत्ता और बौद्धिकता में ह्रास को लेकर चिंतित है। मेरा मानना है कि मौजूदा सिस्टम में बदलाव जरूरी है... चूंकी बच्चों को फेल या पास करना और उसकी गुणवत्ता बनाए रखना दोनों अलग-अलग है..... 

आज भी हमारे देश के कई ऐसे गांव हैं जहां के लाखों बच्चे शिक्षा शब्द से ही अपरीचित हैं...करोड़ों बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर हैं... इसलिए यह जरूरी है और अब वक्त आ गया है कि शिक्षा पद्धति में व्यापाक सुधार की जाए... एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जाए जिससे परीक्षा नामक भूत का भय बच्चों से निकल जाए...स्कूलों का माहौल बदला जाए... हमारे देश में कई प्रकार के शिक्षा बोर्ड चल रहे हैं परन्तु सभी की पद्धति लगभग एक समान है.. इसलिए जरूरत है एक ऐसे पद्धति पर विचार करने की जिससे सभी बच्चों को समान रूप से शिक्षा मिल सके और बच्चों में फेल होने की दुर्भावना भी खत्म हो जाए....

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