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संपादकीय
चुनाव में 'कालाधन' से परहेज करें सियासी दल
By Deshwani | Publish Date: 22/3/2019 4:34:28 PM
चुनाव में 'कालाधन' से परहेज करें सियासी दल

रमेश ठाकुर

देश में चुनावी मौसम है। यह ऐसा मौसम है जब 'कालाधन' दान के रूप में सबसे ज्यादा बाहर आता है। चुनाव खर्च के लिए सभी सियासी दलों को भारी मात्रा में धन की आवश्यकता पड़ती है। उसे पूरा करने के लिए रसूख वाले लोग अपनी पोटली से कालाधन निकालकर राजनीतिक दलों को चंदा के रूप में देते हैं। चुनाव में धन की जरूरत होती है। इसलिए सच्चाई जानने के बाद भी सियासी दल मना नहीं कर पाते। 
 
2019 का चुनाव प्रचार सिर्फ दौलत पर टिका है। भारत का लोकतंत्र सबसे विशालकाय है। इस बात का तमगा दुनिया पहले ही दे चुकी है। लेकिन मौजूदा लोकसभा चुनाव के प्रचार में अनुमानित करीब 55 हजार करोड़ खर्च कर भारत का चुनावी खर्च सभी रिकार्ड तोड़कर सबसे महंगा चुनाव बन जाएगा। 17वीं लोकसभा यानी 2019 का चुनावी दंगल हिंदुस्तानी लोकतंत्र के इतिहास का ही नहीं बल्कि विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास का भी सबसे खर्चीला चुनाव होगा। खर्च के मुकाबले में भारत का चुनाव इस बार अमेरिका को भी पीछे छोड़ देगा। अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति चुनाव प्रचार पर कुल 650 करोड़ अमेरिकी डालर खर्च हुए थे, यानी हमारी मुद्रा के हिसाब से 46 हजार करोड़। हमारे पिछले लोकसभा इलेक्शन में पांच करोड़ अमेरिकी डालर यानी पैंतीस हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस बार यह आंकड़ा उसे आसानी से पार कर जाएगा।
 
एक तल्ख सच्चाई यह है कि चुनावों में राजनीतिक दलों का मात्र एक ही मकसद होता है, किसी भी सूरत में चुनाव जीतना। चुनावों में प्रत्येक दल पानी की तरह पैसा बहाते हैं। दरअसल, इलेक्शन का खर्चीला होना सियासी व्यवस्था का सबसे चिंतनीय इश्यू बन गया है। इस कटु सत्य को सभी राजनीतिक दल भी स्वीकारते हैं। लेकिन जब खर्च को लेकर पारदिर्शता की बात उठती है तो सभी दल एक-दूसरे की बगले -झांकने लगते हैं। कोई भी सही आंकड़ा पेश नहीं करता। सभी दल कम से कम खर्च होने की बात करते हैं। चुनावों में खर्च को लेकर पारदर्शिता की काफी समय से मांग उठ रही है। लेकिन इसके लिए राजनीतिक दल तैयार नहीं हैं। सूचना के अधिकार को हथियार बनाकर लोग जब चुनाव आयोग से चुनावी खर्च को लेकर आरटीआई के माध्यम से जवाब मांगते हैं तो उनके पास भी अधिकृत आंकड़े नहीं होने के चलते पूर्ण सूचना मुहैया नहीं करा पाते।
 
देश में हर वक्त चुनाव होते ही रहते हैं। मसलन पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव में प्रतिवर्ष अरबों-खरबों का धन खर्च किया जाता है। अगर सही मायनों में आंकलन करें, तो चुनाव में उम्मीदवारों द्वारा भारी भरकम खर्च की जाने वाली धनराशियों को जोड़ें तो उक्त धन लगभग एक पंचवर्षीय योजना की कुल राशि के बराबर हो जाता है।
 
चुनावी खर्चों पर आंकलन करने वाली अमेरिकी कंपनी 'कारनीज एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस थिंकटैंक' की ताजा रिपोर्ट बताती है कि भारत में होने वाले 2019 के आम चुनाव में खर्च के सभी पूर्व रिकार्ड धराशाही हो जाएंगे। खर्च का जो मोटा आंकलन लगाया है उसके मुताबिक मौजूदा मनरेगा और किसान सम्मान निधि के बजट क्रमशः 60 हजार करोड़ व 35 हजार करोड़ से भी ज्यादा रकम 17वीं लोकसभा चुनाव में भारत के सियासी सभी दल खर्च करने वाले हैं। हालांकि चुनावी खर्च को लेकर चुनाव आयोग ने चुनावी बांड की व्यवस्था तो की है, लेकिन चुनाव जब अपने उफान पर होगा तो सभी नियम-कानून तेज बहाव में बह जाएंगे। सभी उम्मीदवारों की चुनाव जीतने की लालसा ही सर्वोपरि हो जाती है। चुनावों में अपनी कश्ती को किनारे लगाने के लिए नेता साम, दाम, दंड, भेद यानी हर हथकंडे अपनाते हैं।
 
लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होने के बाद सभी दल अपनी-अपनी चुनावी रणनीति में लग गए हैं। चुनाव जीतने को लेकर सभी गुणा-भाग लगा रहे हैं। हिंदुस्तान में अगले 23 मई तक चुनावी शोर जारी रहेगा। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज का सर्वे बताता है कि इस बार चुनाव में सभी दल करीब 30 हजार करोड़ का बजट अखबार, टीवी, सोशल मीडिया पर खर्च करेंगे। प्रचार के दौरान इतने भारी-भरकम खर्च को लेकर आम लोगों के जेहन में एक सवाल उठता है कि आखिर इतना पैसा आता कहां से है। पैसों के आने का जरिया क्या है?
 
दरअसल यह धन रसूख वाले लोगों द्वारा दिया चंदा रूपी धन होता है। जिसका हिसाब लिखित तौर पर नहीं होता है। चुनाव के वक्त सियासी दलों और नेताओं को मिलने वाली आर्थिक मदद और दान देने वालों का सही-सही पता कोई नहीं लगा सकता। यह धन बहुत ही गुपचुप तरीके से आता है। ज्यादातर दानदाता ऐसे होते हैं जो अपनी पहचान जाहिर नहीं करते। इसलिए खर्च का वास्तविक आंकड़ा जुटा पाना बहुत ही कठिन है। दानरूपी धन कालाधन होता है। हुकूमत बनने के बाद वही दानदाता किसी न किसी रूप में बाद में वसूल करते हैं।
 
मौजूदा सियासत धन-बल पर टिकी है। बिना पैसे की सियासत अब कोई नहीं कर सकता। चारों ओर पैसों की बरसात करनी पड़ती है। ग्रामीण अंचल के ग्राम प्रधानी चुनाव के लिए भी प्रत्येक उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपये खर्च करते हैं। निगम पार्षद और विधायक पद के चुनाव में तीन करोड़ से 15 करोड़ तक खर्च किए जाते हैं। इन खर्चों के बाद भला कोई ईमानदार उम्मीदवार कैसे सस्ते चुनाव लड़ने की उम्मीद कर सकता है। आज तो राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए लोग सौ-दो सौ करोड़ तक खर्च कर देते हैं। ऐसी दशा में सियासत में ईमानदारी से टिकना मुश्किल हो गया है।
 
एक जमाना था जब लोग सीमित संसाधनों में भी चुनाव जीत जाते थे। तब चुनाव जीतने के बाद उम्मीदवारों का मुख्य उद्देश्य जनसेवा करना ही मात्र होता था। लेकिन अब सियासत अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ाने के लिए ही की जाती है। चुनाव जीतने के बाद उम्मीदवार सबसे पहले चुनाव पर खर्च किए धन की वसूली करता है। उसके बाद कुछ जनसेवा की सोचता है। यह सच है कि सिर्फ समाज सेवा के नाम पर अब कोई चुनाव नहीं जीत सकता। दरअसल, यहीं से ही राजनीति के कलुषित होने की शुरूआत हो जाती है। चुनाव सुधारों को लेकर नए सिरे से गंभीरता से विचार करना होगा। व्यवस्था की कमियों को समाप्त किया ही जाना चाहिए। चुनाव के वक्त रसूख वालों द्वारा दिए जाने वाले चंदे पर चुनाव आयोग की पैनी नजर होनी चाहिए, क्योंकि चंदारूपी धन ही सही मायनों में काला धन होता है।
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