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संपादकीय
डार्विन का सिद्धांत और दशावतार की अवधारणा : प्रमोद भार्गव
By Deshwani | Publish Date: 31/1/2018 11:58:01 AM
दुनिया बदल रही है और बदलती दुनिया में अपने आप को बनाए रखने के लिए परिवर्तन आवश्‍यक है। इसी परिवर्तनशील आचरण के सार्थक उदाहरण हमारी सनातन संस्कृति और धर्म में व्याख्यायित दशावतार हैं, जो जीव विज्ञानी चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन की जैव विकास संबंधी अवधारणा की पुष्टि करते है। संभव है, डार्विन ने दशावतारों की आवधारण से ही अपना सिद्धांत सिद्ध करने की प्रेरणा ली हो ? क्योंकि खुद डार्विन की आत्मकथा में इस बात उल्लेख है कि अपनी यात्रा शुरू करने के पहले ही उन्होंने वैदिक साहित्य का अध्ययन कर लिया था। दशावतार और डार्विन में समानता होने का जिक्र स्वामी विवेकानंद और जवाहरलाल नेहरू भी कर चुके हैं। 
 
वास्तव में दशावतार जैव और मानव विकास को क्रमबद्ध रेखांकित किए जाने की सटीक अवधारणा हैं, क्योंकि इनमें एक सुस्पष्‍ट और तार्किक कालक्रम का सिलसिला मौजूद है। महाभारत में कहा गया है कि भगवान धर्म की रक्षा के लिए हर युग में पृथ्वी पर अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। इस मान्यता के अनुसार ही दशावतार का वर्णन किया जा सकता है। पहला अवतार मछली के रूप में आया। विज्ञान भी मानता है कि जीव-जगत में जीवन पानी में ही विकसित हुआ। दूसरा अवतार कच्छप हुआ, जो जल और जमीन दोनों स्थलों पर रहने में सक्षम था। तीसरा वराह (सुअर) था, जो थलचर था और बुद्धिविहीन था। चौथा, नरसिंह अवतार, जानवर से मनुष्य बनने के संक्रमण को प्रतिबिंबित करता है। यहां डार्विन से महज फर्क इतना है कि डार्विन मानवों के पूर्वज बंदरों को बताते है। पांचवा, वामन-अवतार, लघु रूप में मानव जीवन के विकास का प्रतीक है।
 
विष्‍णु का छठा अवतार, परशुराम स्वरूप मनुष्य के संपूर्ण विकास का अवतरण है। इसी अवतार के माध्यम से मानव जीवन को व्यवस्थित रूप में बसाने के लिए वनों को काटकर घर बसाने और बनाने की स्थिति को अभिव्यक्त किया गया है। परशुराम के हाथ में फरसा इसी परिवर्तन का द्योतक है। सातवां अवतार राम का धनुष-बाण लिए प्रगटीकरण, इस बात का संकेत है कि मनुष्‍य मानव बस्तियों से दूर रहकर भी अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हो चुका था। आठवें अवतार बलराम हैं, जो कंधे पर हल लिए हुए हैं। यह मानव सभ्यता के बीच कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के विकास को इंगित करता है। नवें अवतार कृष्‍ण हैं। कृष्‍ण मानव सभ्यता के ऐसे प्रतिनिधि हैं, जो गायों के पालन से लेकर दूध व उसके उत्पादों से मानव सभ्यता को जोड़ने व उससे अजीविका चलाने के प्रतीक हैं। कृष्‍ण ने अर्जुन को कुरूक्षेत्र में गीता का जो उपदेश दिया है, उसे उनका दार्शनिक अवतार भी कहा जा सकता है। दसवां, कल्कि एक ऐसा काल्पनिक अवतार है, जो भविष्‍य में होना है। इसे हम ‘कलियुग‘ अर्थात कल-पुर्जों के युग अथवा यंत्रवत संवेदनहीन युग से भी जोड़कर देख सकते हैं। 
 
ब्रिटेन के आनुवंशिकी और विकासवादी जीव विज्ञानी जान बर्डन सैंडर्सन हल्डेन को राजनीतिक असहमति के चलते भारत आना पड़ा। उन्होंने संभवतः जैव व मानव विकास के व्यवस्थित क्रम में अवतारों का पहली बार बीती सदी के चौथे दशक में अध्ययन किया। उन्होंने पहले चार अवतार मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह को सतयुग से, इसके बाद के तीन वामन, परशुराम और राम को त्रेता से और आगामी दो बलराम और कृष्‍ण को द्वापर युग से जोड़कर कालक्रम को विभाजित किया है। हाल्डेन ने इस क्रम में जैविक विकास के तथ्य पाए और अपनी पुस्तक ‘द कॉजेज आफ इवोल्यूशन‘ में इन्हें रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्‍ट किया कि विज्ञान जीव की उत्पत्ति समुद्र में मानता है, इस लिहाज से इस तथ्य की अभिव्यक्ति मत्स्यावतार में है। कूर्म यानी कछुआ जल व जमीन दोनों में रहने में समर्थ है, इसलिए यह उभयचर (एंफिबियन) कूर्मावतार के रूप में सटीक मिथक है। अंडे देने वाले सरीसृपों से ही स्तनधारी प्राणियों की उत्पत्ति माना जाता है, इस नाते इस कड़ी में वराह अवतार की सार्थकता है। नरसिंह ऐसा विचित्र अवतार है, जो आधा वन्य-प्राणी और आधा मनुष्‍य है, इस विलक्षण अवतार की परिकल्पना से यह स्पष्‍ट होता है कि मनुष्‍य का विकास पशुओं से हुआ है। यह लगभग वही धारणा है, जो चार्ल्स डार्विन ने प्रतिपादित की है। इन जैविक अवतारों के बाद हल्डेन ने मानवीय अवतारों में वामन को सृष्टि विकास के रूप में लघु मानव (हाबिट) माना। परशुराम को वे आदिम या बर्बर पूर्ण पुरुष के रूप में देखते हैं। 
 
राम सामंती मूल्यों को सैद्धांतिकता देने और एक आचार संहिता की मर्यादा से आबद्ध करने वाले अवतार हैं। हल्डेन बलराम को महत्व नहीं देते, किंतु कृष्ण को एक बौद्धिक पुरुष की परिणति के रूप में देखते हैं। सृष्टिवाद से जुड़ी इतनी सटीक व्याख्या करने के बावजूद हल्डेन की इस अवधारणा को भारतीय विकासवादियों व जीव विज्ञानियों ने कोई महत्व नहीं दिया। क्योंकि उनकी आंखों पर वामपंथी वैचारिकता का चश्‍मा चढ़ा था, जिसके तहत वे संस्कृत ग्रंथों को केवल पूजा-पाठ की वस्तु और कपोल-कल्पित मानते थे। धार्मिक प्रवचनकर्ता और टीकाकारों ने इन्हें खूब रेखांकित किया, किंतु वे धार्मिक आडंबर और लोक-परलोक के आध्यात्मिक खोल से बाहर नहीं निकल पाए। 
 
यदि हम इन अवतारों का गहराई से विज्ञान-सम्मत अध्यन करें तो हमारी अनेक प्रचलित मान्यताओं की वैज्ञानिकता सिद्ध होती है। वैज्ञानिक शोध व दृष्‍टांतों से जोड़कर उनका वस्तुपरक विश्‍लेषण करें तो इनमें चमत्कारिक रूप से कई जटिल विषयों के व्यावहारिक गुण-सूत्र मिलते हैं। ये अवतार सृष्टि के उद्गम से लेकर जैव विकास के ऐसे प्रतिमान हैं, जो भूलोक से लेकर खगोल तक विद्यमान थल, जल व नभ में विचरण करने वाले जीव-जगत की पड़ताल तो करते ही हैं, खगोलीय घटनाओं का वैज्ञानिक विवेचन और विश्‍लेषण भी करते हैं। इसीलिए इन अवतारों की परिधि में इतिहास और भूगोल तो हैं ही, ब्रह्माण्ड के रहस्य भी अंतनिर्हित हैं। स्पष्ट है कि वैदिक धर्म व दर्शन अंधविश्‍वास से दूर जिज्ञासा और ज्ञान पर आधारित है। ज्ञान और जिज्ञासा ही बौद्धिकता के वे मूल-भूत स्रोत हैं, जो ब्रह्माण्ड में स्थित जीव-जगत के वास्तविक रूप की अनुभूति और आंतरिक मर्म (रहस्य) को जानने के लिए आकुल-व्याकुल रहते हैं। इस वैज्ञानिक सोच को उपनिशद काल में कहा गया है-
 
यदा चर्मवदाकाशम् वेष्‍टयिस्यन्ति मानवाः
तदा देवम् अविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्‍यति।
अर्थात, जिस दिन लोग इस आकाश को चटाई की तरह लपेट कर अपने हाथ में ले लेंगे यानी ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जान लेंगे, उस दिन ईश्‍वर को जाने बिना मानवता के दुःखों को अंत हो जाएगा। फलतः दशावतार कवियों की कोरी कल्पना नहीं बल्कि जैव विकास-गाथा का पूरा एक कालक्रम हैं। 
(हिन्‍दुस्‍थान समाचार)
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