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संपादकीय
कमाई के चक्कर में धनपति भी मांग रहे भीख-सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 7/1/2018 3:05:00 PM

कविवर रहीम ने जब यह बात लिखी थी कि दान दीन को दीजिए मिटै दरिद की पीर। औषध ताको दीजिए जाके रोग शरीर तो क्या उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि सभी भिखारी जरूरतमंद नहीं हैं। जो वाकई जरूरतमंद हैं। गरीब हैं। दरिद्र हैं,उन्हें ही भिक्षा दी जानी चाहिए। यह वही रहीम थे जिन्हें जब सम्राट अकबर ने राज्य से निष्कासित कर दिया था तो वे चित्रकूट आए थे। यहां पहले तो जितना भी उनके पास धन था, उसे उन्होंने गरीबों और जरूरतमंदों को दान कर दिया था और बाद में पेट की भूख मिटाने के लिए वे खुद भी याचकों की जमात में खड़े हो गए थे। चित्रकूट की प्रशंसा में उन्होंने लिखा था कि ‘चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेश। जापर विपदा पड़त है सो आवत एहि देश।’ जब वाराणसी में गंगा दशहरा के अवसर पर दशश्वमेध घाट पर भीख मांग रहे एक भिखारी की दीनता का इजहार एक अंग्रेज लेखक ने अपनी पुस्तक में यह लिखकर किया था कि हजारों लोगों ने भिखारी को दान दिया लेकिन जब शाम को उसने हिसाब लगाया तो उसे इतना अनाज या पैसा भी नहीं मिला था कि वह दोनों वक्त अपनी पसंद का खाना खा सके। तब लगा था कि विदेशी भारतीय दानवृत्ति का मजाक उड़ा रहे हैं। उस दिन भी मन आत्मग्लानि से भर गया था और आज फिर उसी तरह का असमंजस मेरी आंखों के सामने है। 

 
कुछ दिन पहले रायबरेली जिले में एक करोड़पति भीख मांगते मिला था। वह अपने परिवार से बिछड़ गया था। पास में पैसे नहीं थे, इसलिए भीख मांग रहा था। पता चलने पर उसके परिजन उसे हवाई जहाज से तमिलनाडु ले गए। यह जानकर बेहद तसल्ली हुई थी। ऐसे भी लोग हैं जो भिखारियों को उनके अपने लोगों से मिला देते हैं लेकिन जब यह पढ़ता हूं कि किसी बेटे ने अपनी बुजुर्ग मां को स्टेशन पर छोड़ दिया। उसे भिखारी बनने को मजबूर कर दिया तो उतना ही कोफ्त भी होता है। कवि घाघ ने लिखा था कि ‘उत्तम खेती मध्यम बान। निषिध चाकरी भीख निदान।’ जब कोई चारा नहीं बचता तब आदमी भीख मांगता है लेकिन अब भीख मांगना कुछ आदमियों के लिए लखपति-करोड़पति बनने का जरिया बन गया है। लोग भिक्षाटन को निषिद्ध मानें तो मानते रहें लेकिन उनके लिए तो भिक्षाटन सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जैसा ही है। 
इन दिनों एक लखपति भिखारी सोशल मीडिया पर, अखबारों में चर्चा का विषय बना है। उसकी माहवार कमाई 30 हजार से अधिक है। इतना कमाने की तो एक सामान्य मजदूर कल्पना भी नहीं करता। दिल्ली,लखनउ, मुंबई आदि शहरों में ऐसे बहुतेरे युवक हैं जो प्राइवेट कंपनियों में 12 घंटे की नौकरी करने के बाद भी दस हजार रुपये नहीं कमा पाते। अखबारों में छपने वाले विज्ञापन में नौकरी 6 से 8 हजार से शुरू होती है और 15 हजार पर सिमट जाती है। झारखंड के सिमडेगा का रहने वाला छोटू बरई पैरों से दिव्यांग है जो महीने में 30,000 रुपए से कुछ अधिक ही कमा लेता है। इसके अलावा वह वह एक चेन मार्केटिंग कंपनी का सदस्य भी है। 40 साल के छोटू बरई की तीन पत्नियां हैं। वे भी कमाती हैं और उसे अपनी पूरी कमाई देती हैं और उसके बाद छोटू उन्हें सेलरी देता है। यह लखपति भिखारी बिना पूंजी के ही लाखों रुपए आसानी से कमा लेता है। उसने बांदी गांव में एक बर्तन की दुकान भी खोल रखी है जिसे उसकी एक पत्नी चलाती है। छोटू बारिक वेस्टिज बिजनेस का स्वतंत्र डीलर है। छोटू के निचले क्रम में 20 से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। जो मार्केटिंग करते हैं। उसका कहना है कि उसने शुरू में काफी मेहनत की लेकिन पैसा नहीं बचा पाता था। ऐसे में उसने भीख मांगने का जरिया चुना। हर दिन करीब 1000-1200 रुपये कमा लेता है। छोटू बरई जो कर रहा है, वह उसके लिए तो ठीक है लेकिन उसे यह तो सोचना चाहिए कि जब उसकी पोल खुलेगी तो लोगों का गरीबों पर से विश्वास उठ जाएगा। वे उन्हें दान देना बंद कर देंगे तब उनका जीवन यापन कैसे होगा?
 
खड़ग सिंह और बाबा भारती की कहानी ही पढ़ ली होती। बाबा भारती ने गरीब भिखारी बने खड़ग सिंह को अपने घोड़े पर बैठाया था लेकिन बाबा भारती को उतारकर अपना परिचय देते हुए उसने घोड़ा लूट लिया था। तब बाबा भारती ने कहा था कि यह बात किसी से मत बताना। खड़ग सिंह को ताज्जुब हुआ कि बाबा भारती ऐसा क्यों कह रहे हैं? उसने पूछा क्यों तो बाबा भारती का जवाब था कि जब लोगों को पता चलेगा कि गरीबों के वेश में डाकू भी होते हैं तो वे गरीबों को मदद देना बंद कर देंगे। यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। जो लोग पेशेवर ढंग से भिक्षावृत्ति कर रहे हैं। भिक्षावृत्ति का रैकेट मतलब सिंडिकेट चला रहे हैं, ऐसे लोग जरूरतमंदों के हक पर डाका डाल रहे हैं। 
 
रहीम ने लिखा है कि वे लोग मृतक के समान हैं जो किसी से कुछ मांगते हैं और उनसे पहले वे मर जाते हैं जिनके मुंह से ना निकलता है। ‘रहिमन वे नर मर चुके जे कहुं मांगन जाहिं। उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसै नाहिं।’ भिक्षा को कमाई का जरिया बनाने वाले दीनता और दीनता पर तरस खाने वालों की भावनाओं का भी अपमान कर रहे हैं। ऐसे लोगों को समय रहते बेनकाब करने की जरूरत है। इस देश में भारत जैन जैसे पेशेवर भिखारी भी हैं जो मुंबई में 70-70 लाख के दो अपार्टमेंट, एक जूस शाॅप के मालिक हैं जिसे किराए पर उठाते हैं। इसके बाद भी वह भिक्षावृत्ति से 60 हजार रुपये प्रतिमाह कमाते हैं। इस तरह के सैकड़ों हजारों भारत जैन हैं जो शौकिया भिक्षावृत्ति करते हैं और दान देने वालों की भावनाओं से खेलते हुए अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। 
भीख मांगना नियति है या शौक, यह सवाल ऐसे में मुझे अंदर से कचोट रहा है। इस तरह के सवाल क्यों उठने चाहिए, यह मैं समझ नहीं पा रहा हूं। इस सवाल से किसका हित होगा और किसका नहीं लेकिन अगर इस पर मंथन नहीं किया गया, असली और नकली भिखारियों की पहचान न की गई तो क्या होगा? अभी लोग भिखारियों को झिड़कते नजर आते हैं। नकली भिखारियों की पोल खुलने के बाद तो उनका मदद करने का नजरिया ही बदल जाएगा। ऐसे में गरीब , जरूरतमंदों के लिए फिक्रमंद होना किसी के लिए भी स्वाभाविक है। मेरे सामने ऐसे अनेक चेहरे हैं जिनके पास भीख मांगना ही विकल्प है। कुछ ऐसे भी चेहरे हैं जिन्होंने बचपन से लेकर बुढ़ापे तक भीख ही मांगा, इसके अलावा उन्होंने कुछ और किया ही नहीं। क्यों नहीं किया, इसका जवाब बेहतर तरीके से वही दे सकते हैं लेकिन देश में हर साल भिखारियों की संख्या बढ़ जाती है। चंदौली में एक बुढ़िया को मैंने छात्र जीवन से भीख मांगते देखा था लेकिन ज बवह मरी तो उसकी कथरी से 4 लाख के नोट और सिक्के मिले थे। उन पैसों को समाजसेवा में लगा दिया गया था जिससे कि उसकी आत्मा को शांति मिले। 
घर से दफ्तर जाते वक्त रोज ही अनेक चेहरे हाथ फैलाए नजर आते हैं। इनमें कुछ बच्चे होते हैं। कुछ महिलाएं। इन हाथ फैलाने वालों में हट्ठे-कट्ठे युवा भी होते हैं जो देश की श्रमशक्ति का हिस्सा बन सकते थे वे भीख मांग रहे हैं। सिखों की वह जमात जो अपनी विरादरी में किसी को भीख नहीं मांगने देती, उसे रोजगार से जोड़ देती है, उस समाज के लोग भी भंडारे जैसे पवित्र आयोजनों का नाम लेकर गली-गली चंदा मांगते हैं जबकि यह समाज खुद इतना संपन्न है कि वह अकेले ही एक भंडारा करा सकता है। ऐसे में यह सब क्या है? जिसके पास कुछ न हो, वह भिक्षाटन न करे तो क्या करे ? क्यों कोई अपनी मान-मर्यादा और स्वाभिमान को ताक पर रखकर याचकों की जमात में कटोरा लिए खड़ा हो जाता है? यह जमात छोटी-मोटी नहीं है। वर्ष 2015 में केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री ने राज्य सभा को बताया था कि भारत में 4,13,660 भिखारी हैं जिनमें 2.2 लाख पुरुष हैं जबकि 1.91 लाख महिलाएं हैं। उन्होंने बताया था कि सर्वाधिक 81 हजार भिखारी पश्चिम बंगाल से हैं। दिल्ली में 60 हजार, हैदराबाद और बंगलुरु में 30 हजार भिखारी हैं। तीर्थ नगरियों काशी, मथुरा, अयोध्या, प्रयाग में भिखारियों की बहुत बड़ी संख्या है। वैसे जो आंकड़े बताए जा रहे हैं, भिखारी उससे कहीं अधिक हैं। इस सर्वे में भीख मांगने का कारण भिखारियों का एक सामान्य मजदूर से अधिक कमाना बताया गया था। देश के 27 प्रतिशत भिखारी रोजाना 50 से 100 रुपये तक खर्च करता है लेकिन एक औसत आदमी रोज 80 रुपये ही बमुश्किल कमा पाता है। इसमें शक नहीं कि 71 प्रतिशत भिखारी बेहद गरीब हैं। इनमें से ज्यादातर को सिंडिकेट के नीचे रहकर भीख मांगनी होती है। 
 
पुलिस चूंकि भिखारियों के सिंडिकेट से भी कमीशन लेती है। इसलिए देश और प्रदेश के अधिकांश जिलों में भिखारियों का सिंडिकेट भिक्षावृत्ति का रैकेट चला रहा है। जब कभी कोई विदेशी गणमान्य आता है तभी सरकार को अपनी छवि की चिंता सताती है। किसी भिखारी को उनके सामने आने नहीं दिया जाता। बाकी समय भिखारी सड़कों और गलियों में निर्बाध विचरण करते हैं। इस काकस को तोड़ना आखिर किसकी जिम्मेदारी है? केंद्र और राज्य की सरकारें गरीबी मिटाने की बातें तो खूब करती हैं लेकिन सच तो यह है कि आजादी के इतने साल बाद भी वे असली और नकली भिखारियों की पहचान तक नहीं कर पाती। उन्हें परिचय पत्र नहीं दे पाती। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहा जाएगा? सरकार गरीबी उन्मूलन पर अब तक जितना पैसा खर्च कर चुकी है, उसमें भिखारियों का कायाकल्प तो किया ही जा सकता था। सरकार को उन लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए जिनके लिए भिक्षाटन आमदनी का जरिया है। अपने फायदे के लिए जो बच्चों और महिलाओं को भीख मांगने पर विवश करते हैं। अदालतें भी भिखारियों की तादाद कम करने की सलाह सरकार को दे चुकी हैं, इसके बाद भी भिखारियों की साल-दर साल बढ़वार चिंताजनक तो है ही। जीवनचर्या के लिए भीख मांगना और प्रापर्टी बनाने के लिए भीख मांगने के बीच जब तक अंतर नहीं किया जाएगा, तब तक भिखारियों के अच्छे दिन कभी नहीं आएंगे। 
-(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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