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संपादकीय
तिलक के मन्त्रवत उद्घोष का उत्सव : डॉ दिलीप अग्निहोत्री
By Deshwani | Publish Date: 31/12/2017 1:38:34 PM
तिलक के मन्त्रवत उद्घोष का उत्सव : डॉ दिलीप अग्निहोत्री

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक कल्पनाशक्ति के धनी है। महापुरुषों की जन्मजयंती उत्सव के रुप में मनाने की परंपरा रही है। राम नाईक के सुझाव पर एक नया अध्याय जुड़ा। उनके सुझाव पर स्वतन्त्रता संग्राम को प्रभावी दिशा देने वाले उद्घोष या नारे की एक सौ एक वीं जयंती उत्सव के रुप में मनाई गई। यह नारा था-'स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है,और हम इसे लेकर रहेंगे।' यह शब्द महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक के थे। विदेशी दासता से मुक्ति के संग्राम में इससे ज्यादा प्रभावशाली दूसरा कोई नारा नहीं हो सकता। 

 

यह संयोग था कि बालगंगाधर तिलक ने यह नारा कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन 1916 में दिया था। इस हिसाब से दो बात ध्यान में आती है। एक यह कि यह उद्घोष लखनऊ में हुआ इसलिए मुख्य समारोह भी यहीं होना चाहिए था। दूसरा यह कि इसके सौ वर्ष होने पर भी समारोह आयोजित किया जा सकता था। राम नाईक ने इसका सुझाव पिछली प्रदेश सरकार को भी दिया था। लेकिन वह स्थिति अलग थी। राज्यपाल पहले भी अपने कर्तव्य को पालन करते थे। 

 

लेकिन पिछली सरकार उनके कई सुझावों के प्रति गंभीर नहीं रहती थी। जबकि वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मानते है कि राज्यपाल का प्रत्येक सुझाव प्रदेश को प्रेरणा देने वाला होता है। इसलिए योगी आदित्यनाथ ने पहले ही कहा था कि राज्यपाल के सुझाव पर एक सौ एक वी जयंती उत्सव के रूप में मनाई जाएगी। इस अवसर पर मुख्य आयोजन लोक भवन में हुआ। इसमें योगी आदित्यनाथ के आमंत्रण पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और तिलक के वंशज भी शामिल हुए।

 

तिलक ने इस नारे के साथ ही स्वदेशी, ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति का भी विचार दिया था। जिसे महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया था। इनको अपने आंदोलन का प्रमुख आधार बनाया था। तिलक मानते थे कि प्रत्येक व्यक्ति में एक दैवीय तत्व होता है। इसके लिए उसे धर्म के अनुरूप आचरण की स्वतंत्रता होनी चाहिए। विदेशी दासता में यह संभव नहीं है। अतः उनसे मुक्ति पहली आवश्यकता है। लेकिन देश के लोगों को यह समझना होगा कि ऐसी स्वतन्त्रता में स्वेच्छाचारिता नहीं होनी चाहिए। उत्तरदायी राजनीतिक व्यवस्था ही स्वराज है। वह बताना चाहते थे कि यह केवल राजनीतिक आवश्यकता ही नहीं नैतिक और प्राकृतिक अधिकार भी है। तिलक ने जब यह नारा बुलंद किया, उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में दुविधा की स्थिति थी। इसकी स्थापना अंग्रेज के द्वारा की गई थी। प्रारंभिक वर्षो में यह सुधार की मांग और प्रस्ताव पारित करने वाली संस्था थी। देश को आजाद कराने के विषय में संकोच का भाव था। तिलक को यह तरीका पसन्द नहीं था। वह कांग्रेस को आजादी की लड़ाई करने वाली संस्था बनाना चाहते थे। उस दौर के कई दिग्गजों को इस हद तक जाना पसंद नहीं था। यह भी कह सकते है कि उनमें ऐसी बात करने का साहस नहीं था। 

 

बाल गंगाधर तिलक ने मात्र एक नारे से स्थिति बदल दी। असमंजस समाप्त कर दिया।कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को निर्धारित दिशा मिल गई। तिलक का उद्घोष स्वतन्त्रता के दीवानों के लिए मंत्र बन गया। उन्होंने किन्तु, परन्तु जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी। स्पष्ट विचार दिया कि स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। इसका मतलब था कि हमको अंग्रेजों से कुछ भी मांगना नहीं है। हमको उनसे कोई सुविधा, सुधार नहीं चाहिए,उन्होने हमारे देश पर अवैध रूप से कब्जा किया है। यह हमारे जन्मसिद्ध अधिकार का हनन है। इसकी अगली पंक्ति में आत्मबल का सन्देश दिया। 

जन्मसिद्ध अधिकार को हम हासिल करके रहेंगे। इसमें यह भाव भी समाहित था कि इसके लिए चाहे जितने कष्ट उठाने पड़े, हम पीछे नहीं हटेंगे। देश को आजाद कराना एकमात्र उद्देश्य है। तिलक ने केवल यह विचार ही व्यक्त नहीं किये। बल्कि इसके लिए उन्होने बहुत कष्ट भी उठाए। अंग्रेजों ने उन्हें कालापानी की सजा देकर मांडले जेल भेजा गया था। छह वर्ष कालापानी की सजा के दौरान ही उन्होने नौ सौ पृष्ठों की गीता रहस्य पुस्तक लिखी थी। अपने केसरी अखबार के माध्यम से वह लगातार चालीस वर्षों तक जनजागरण करते रहे। इसके अलावा द ओरियन, द आर्कटिक होम इन वेदाज और वैदिक क्रोनोलॉजी एंड वेदांग ज्योतिष उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ है। वह कई बार जेल गए। फिर भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते रहे। यह भी उल्लेखनीय है कि तिलक के राष्ट्रवाद में राष्ट्रवाद में सार्वजनिक उत्सवों का विशेष स्थान था। उन्होंने शीवाजी और गणपति उत्सव के माध्यम से समाज मे जागरूकता,समरसता, लाने का प्रयास किया था। वह अपनी संस्थाओं को अंग्रेजियत के ढांचे में ढालना नहीं चाहते थे। सामाजिक, राजनीतिक सुधार के नाम पर हम उनका विदेशीकरण नहीं कर सकते। 

जाहिर है कि लखनऊ में हुए इस समारोह में प्रेरणा के अनेक तत्व थे। राम नाईक ने ठीक कहा कि तिलक का नारा सिंहगर्जना की भांति था। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की विफलता के बाद देश मे जो निराश आई थी, उसे इस एक वाक्य ने दूर कर दिया था। 

यह मात्र एक नारे का नहीं बल्कि व्यापक राष्ट्रीय चिंतन से प्रेरणा लेने का अवसर था। तिलक का ऐलान विदेशी आक्रांताओं को हटाने के लिए था। इसके साथ ही वह आजादी को असीमित नहीं मानते थे। इसमें जिम्मेदारियों का भी समावेश होता है। योगी आदित्यनाथ ने इस अवसर पर यही कहा। उनका कहना था कि आजादी देश के विरुद्ध नारेबाजी के किसी को अधिकार नहीं हो सकता। उनका इशारा कश्मीर घाटी और जेएनयू के चंद लोगों की ओर था। देश को विदेशी प्रभुता से आजाद कराने वालों से ही प्रेरणा लेनी होगी। इस समारोह में महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के वंशजों को सम्मानित करना भी सराहनीय था। इनमें बालगंगाधर तिलक, मंगल पांडेय, तात्या टोपे, बहादुर शाह जफर, वीर सावरकर, भगत सिंह, अशफाक उल्ला, चंद्रशेखर आजाद, रामकृष्ण खत्री, शचीन्द्रनाथ बख्शी, दीनदयाल उपाध्याय, उधम सिंह, राजगुरु, चापेकर बन्धु, आदि के वंशजों और लखनऊ के कई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानित किया गया। जाहिर है कि ऐसे समारोह प्रेणादायक होते है। व्यक्ति ही नहीं, कई बार कतिपय नारे भी व्यवस्था बदलने की प्रेरणा बन जाते हैं। तिलक के द्वारा लखनऊ में दिया गया यह उद्घोष ऐसा ही था। राम नाईक ने इस ओर ध्यान देकर एक मील का पत्थर स्थापित किया है। इस अवसर पर महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संबंधों पर भी चर्चा हुई। योगी आदियनाथ ने पहले ही ऐसे संबंधों के लिए महाराष्ट्र का चयन किया था। इस आयोजन से दोनों प्रदेशों के बीच सहयोग का मार्ग भी प्रशस्त हुआ। इसके माध्यम से अंततः देश की प्रगति में योगदान होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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