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संपादकीय
प्रसंगवश/आर.के.सिन्हा....आतंकियों-अपराधियों से क्यों ना हो सख्ती
By Deshwani | Publish Date: 17/12/2017 4:14:17 PM
प्रसंगवश/आर.के.सिन्हा....आतंकियों-अपराधियों से क्यों ना हो सख्ती

अजमल कसाब, माओवादियों, नक्सलियों और पृथकतावादियों वगैरह से पुलिस पूछताछ के दौरान सख्ती क्यों न करे? अहम सवाल यह है कि क्या आरोपियों, अपराधियों और गवाहों से पुलिसिया जांच सही तरीके से होती है? पुलिस कस्टडी में विचाराधीन कैदियों की मौत या फिर तफ्तीश के समय पुलिस की कठोर कार्रवाई सम्बंधी खबरें लगातार हम देखते-सुनते हैं। ज्यादातर मामले बढ़ा -चढ़ा कर पाठकों/दर्शकों के समक्ष परोसे जाते हैं। आखिरकार, कमी या गड़बड़ किस स्तर पर है? क्या पुलिस आतंकियों और कट्टर अपराधियों से भी भाईचारे के अंदाज में पूछताछ करे? क्या उस स्थिति में आरोपी और अपराधी पुलिस के समक्ष सच बोल देंगे? ये कुछ अहम सवाल हैं। इनके उत्तर देश के पुलिस महकमों को खोजने होंगे। यह कोई नहीं कह रहा है कि हमारे यहां पुलिस की कार्यशैली में सुधार नहीं हुए। लेकिन, यह भी कोई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगा कि पुलिस की कार्यशैली में सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है।

दोनों सही

दोनों बातें अपनी जगह सही हैं। पुलिस शातिर अपराधी तत्वों से कठोरता से तो पेश आनी ही चाहिए, पर उसे सभी को मवाली और बदमाश मानने की मनोवृति भी त्यागनी होगी। एक बार मशहूर पुलिस अधिकारी दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर पी.एस.भिंडर ने कहा था, “ अगर पुलिस से अपराधियों के विरूद्ध कड़ी कार्रवाई के अधिकार को ही छीन लेंगे तो फिर आप किसी अपराधी से अपने जुर्म को कुबूल करने की आशा छोड़ दीजिए। फिर तो वो अपना अपराध कभी मानेगा ही नहीं। ” भिंडर की बात में वजन है। उसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। खाकी का असामाजिक तत्वों में भय तो कायम रहना ही चाहिए। साथ ही, सामान्य कानूनप्रिय शांत नागरिकों के मन में पुलिस की छवि सहयोगी और मित्र की भी बने तो पुलिस की कार्यप्रणाली में सही मायने में सुधार हो। 

यह सही है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सशक्त मानवाधिकार और जनवादी संगठनों की उपस्थिति भी आवश्यक है। अगर ये नहीं होंगे तो दीन-दुखियों के हितों को आखिर देखेगा कौन? उनके हितों पर चोट लगने की स्थिति में कौन आगे आएगा? अगर कहीं पुलिस की बर्बरता आमजन पर होती है तो कुछ संगठनों का पुलिस के खिलाफ आवाज उठाना पूरी तरह से सही माना जाएगा। लेकिन, यह भी न हो कि मानवाधिकार और जनवादी संगठनों से जुड़े एक्टिविस्ट पुलिस की निंदा ही करते रहें और हर समय खून के प्यासे निर्दोषों को मारने वाले आतंकवादियों, माओवादियों और नक्सलियों के साथ ही नजर आएं। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले पुलिस कस्टडी में यातना, यंत्रणा और उत्पीड़न सम्बंधी मामलों में कमी लाने की बाबत एक गाइडलाइन जारी की थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश भी दिए थे कि वे अपने मानवाधिकार आयोगों में रिक्तियों को भरें।

सवाल यह है कि मानवाधिकार का अधिकारी कौन होना चाहिए? आम नागरिकों के लिए तो मानवाधिकार होना ही चाहिए। यह तो उनका कानूनी और संवैधानिक अधिकार है, लेकिन, मुझे सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज पसायत साहब की बात याद आती है जो कि उन्होंने कुछ बरस पहले दिल्ली में ही मानवाधिकारियों की एक गोष्ठी में कही थी। उनकी टिप्पणी एकदम सार्थक और सटीक है। जस्टिस पसायत ने कहा था कि कानून और संविधान में आस्था रखने वाले आम नागरिकों के लिए तो मानवाधिकार एकदम सही है लेकिन, जो संविधान में विश्वास ही नहीं रखते, जब चाहें निर्दोषों की बेरहमी से हत्यायें करते रहते हैं, उनका मानवाधिकार कैसा? मानवाधिकार मानवों के लिए है, देशद्रोहियों और पाशविक वृति के लोगों के लिए नहीं।

पुलिस पर यह आरोप भी लगते रहते हैं कि वो आरोपियों की कसकर पिटाई करके उनसे अपना जुर्म स्वीकार करवा लेती है। ये बात भी है कि पुलिस के सामने ‘सच’ बोलने वाले कोर्ट में अपने बयान से ज्यादातर मुकर जाते हैं। हाल ही में गुरुग्राम के रेयन स्कूल के छात्र प्रद्युमन की नृशंस हत्या के बाद भी यही देखा गया था। उस मामले में स्कूल के बस ड्राइवर सौरभ राघव ने आरोप लगाया था कि पुलिस और स्कूल मैनेजमेंट के दबाव में उसने आरोपी कंडक्टर अशोक के खिलाफ झूठा बयान दिया। राघव का आरोप है कि पुलिस ने उसकी पिटाई की। यह तो एक उदाहरण मात्र है। ऐसी ही चंद पुलिसिया कारवाई पूरे देश की खाकी को दागदार बना देती है।

देन गोरों की 

वैसे हर हालात में पुलिस को अपनी कठोर और अमानवीय छवि में सुधार तो लाना ही होगा। इसमें अब और विलंब के लिए कोई तर्क स्वीकार करना देशहित में नहीं होगा। उसकी यह छवि ब्रिटिश काल से चली आ रही है। गोरों के भारत छोड़ने के बाद भी भारतीय पुलिस की छवि में सुधार नहीं हो रहा। हालांकि, यह कोई नहीं मानेगा कि भारतीय पुलिस ने अपने को सुधारने की कोशिश ही नहीं की। लेकिन, कोशिश पर्याप्त नहीं हुई। इसीलिए, उसकी समाज में एक नकारात्मक छवि बनी हुई है। एक आम नागरिक मानता है कि पुलिस वाला सिर्फ भद्दी गालियां देकर ही बात कर सकता है। पुलिस को किसी अपराध के प्रत्यक्षदर्शियों, आरोपियों, अपराधियों से पूछताछ के लिए विनम्रता पूर्ण सभ्य तरीकों को तलाश करना ही होगा। पुलिस अब भी घिसे-पिटे तरीकों पर कब तक चलती रहेगी। अब जबकि दुनिया हाई-टेक हो चुकी है तो पुलिस को भी अपराधी की अपेक्षा और चुस्त और दुरुस्त होना पड़ेगा। 

अव्वल महाराष्ट्र

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस के खिलाफ शिकायतों में महाराष्ट्र शीर्ष स्थान पर है। इन शिकायतों में पुलिस पर सहयोग न करने, जांच के लिए पैसे की मांग करने, शिकायतकर्ता के उत्पीड़न की शिकायतें शामिल हैं। हालांकि, इनमें से कई शिकायतें गलत भी साबित हुईं। कुछ मामलों में कुछ पुलिसकर्मियों को मामूली और गंभीर दंड भी दिया गया। 2014 में महाराष्ट्र पुलिस के खिलाफ तकरीबन 6 हजार 5 सौ शिकायतें मिलीं। इनमें से 386 लोगों को गिरफ्तार किया गया जबकि 487 पुलिसकर्मियों पर मुकदमे दर्ज किए गए। वहीं 2,355 शिकायतें गलत भी पाई गईं। वर्ष 2015 में शिकायतों की संख्या डेढ़ हजार से बढ़कर तकरीबन आठ हजार हो गईं। इसमें से 454 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया और 3,962 शिकायतें गलत पाई गईं। वर्ष 2016 में राज्य में पुलिस के खिलाफ फिर एक हजार ज्यादा यानी कि नौ हजार से ज्यादा शिकायतें मिलीं।

मुझे लगता है कि अपराधियों से पुलिस सख्ती से पूछताछ करे इस अधिकार को किसी भी स्थिति में पुलिस द्वारा छीना जाना सही नहीं ठहराया जा सकता। यह समझना होगा कि हत्या, चोरी, लूट, रंगदारी, बलात्कार जैसे अपराध करने वाले इंसान अलग किस्म के ही होते हैं। तो फिर उनसे प्रेम से तो बात नहीं बनेगी। बहरहाल, अगर पुलिस थानों के उन कक्षों में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए जाएं और पूछताछ की रेकार्डिंग रख ली जाये,तो पुलिस उत्पीड़न सम्बंधी सारे आरोपों पर विराम लग जाएगा। बिहार, पुडुचेरी, अंडमान और निकोबार समेत कुछ अन्य राज्यों की जेलों में सीसीटीवी कैमरे लगने शुरू भी हो गए हैं। पुलिस कर्मियों को और अधिक संवेदनशील और मानवीय बनाने की मुहिम चलनी आवश्यक है। फोरेंसिक जांच में हमारे यहां पुलिस अभी भी काफी कमजोर है। उसे इस पक्ष को और मजबूत करना होगा। पुलिस थाने में किसी आरोपी या अपराधी की मौत अथवा गंभीर रूप से चोटग्रस्त होना पुलिस के लिए शर्मनाक है। इस तरह के मामले प्रकाश में बार-बार लगातार आते हैं। 

एक बात और कि शॉर्ट कट उपायों से किसी केस की जांच करने से भी कोई लाभ नहीं होगाI चूंकि, तफ्तीश कमजोर रह जाती है, इसीलिए केस कोर्ट में जाकर ख़ारिज हो जाता है। इसलिए जहां जांच के स्तर पर सुधार समय की मांग है, वहीं पुलिस को अपनी छवि को और उजला करना होगा। फिर भी, पुलिस से कट्टर और खूंखार अपराधियों से सख्ती का अधिकार कदापि वापस नहीं लिया जा सकता। 

(लेखक राज्य सभा सदस्य एवं हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय संवाद एजेंसी के अध्यक्ष हैं)

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