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संपादकीय
उ.प्र. के चुनाव परिणाम ''नियत की बरक्कत'' : राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
By Deshwani | Publish Date: 6/12/2017 11:04:04 AM
उ.प्र. के चुनाव परिणाम ''नियत की बरक्कत'' : राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

एक पुरानी कहावत है ‘नियत की बरक्कत’। भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश की शहरी निकायों के चुनाव में मिली महत्वपूर्ण सफलता इस कहावत के यथार्थ को चरितार्थ करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की ‘अच्छी नियत’ पर लोगों का भरोसा कायम है। केंद्र या राज्य सरकार के कतिपय नीति सम्बन्धी निर्णयों से दुरूहता झेलने वालों को भी यह भरोसा है कि भले नीतियों के क्रियान्वयन के दौरान उन्हें कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन प्रधानमंत्री और भाजपा सरकारों की नियत में खोट नहीं है। न प्रधानमंत्री और न ही योगी आदित्यनाथ सरीखे मुख्यमंत्री बदनियती अथवा निजी स्वार्थ से वशीभूत होकर कोई निर्णय कर रहे हैं। अपनी नियत पर जनता का भरोसा होने के कारण ही मोदी की लोकप्रियता में कोई ह्रास नहीं हुआ है और योगी आदित्यनाथ का न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश के निकाय और गुजरात विधानसभा चुनाव के पूर्व बड़ी दृढ़ता से कहा है कि आर्थिक सुधार की दिशा में उनका बढ़ता कदम राजनीतिक हानि की चिंता किए बिना बढ़ता रहेगा। हजार और पांच सौ के नोटबंदी के बाद सेवा एवं वस्तुकर (जीएसटी) के कारण समाज का वह वर्ग जो भाजपा का सर्वाधिक समर्थक रहा है, असंतुष्ट हो गया यह माना जा रहा था कि उसमें असंतोष का सर्वाधिक असर शहरी क्षेत्र में होगा लेकिन उत्तर प्रदेश के शहरी निकाय के चुनाव परिणाम यह साबित कर दिया है कि भाजा के वोट मतदाताओं में असंतोष से जिस परिणाम की अन्य राजनीतिक दलों को लाभ की अपेक्षा थी उन्हें निराश होना पड़ा। गुजरात में भाजपा की सत्ता पलटने के उपक्रम में जातीयता को बढ़़ावा देने के क्रम में असंभव वादे और मंदिर मंदिर परिक्रम कर अपने को धार्मिक साबित करने के क्रम में वस्त्र के ऊपर जनेऊ धारण करने के चित्रों को प्रदर्षित कर कांग्रेस अपने जिस नेता के भरोसे राजनीति कर मुख्यधारा में आना चाहती थी, उस नेता के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में वह एक भी नगर पंचायत का चुनाव नहीं जीत पाई यहंा तक कि निर्वाचन केन्द्र अमेठी में उसे उम्मीदवार तक खड़ा करने का साहस नहीं हुआ। यह सब क्यों हो रहा है क्योंकि आठ महीने पूर्व विधानसभा में भरपूर बहुमत के बावजूद होने वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी दूसरे स्थान से खिसककर तीसरे पर चली गई। जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसे चैथे स्थान पर स्थायित्व प्राप्त हो गया है। लेकिन जो बहुजन समाज पार्टी लोकसभा में खाता नहीं खोल सकी थी, विधानभा चुनाव में महज उन्नीस सीटें जीत सकी थी, वह जिसके तमाम नेता पार्टी छोड़ गये थे, और मायावती परिवारवादी पार्टी की कतार में भाई-भतीजे को मंच पर लाकर खड़ी हो गई थी, वह उभरकर दूसरे स्थान पर आई। विभिन्न जनपदों में जो मतदान हुआ है उसकी समीक्षा करने से पता चलता है कि मुस्लिम मतदाताओं ने सपा और कांग्रेस को छोड़कर बसपा को पहली पसंद बना लिया और वह भी इतने गोपनीय ढ़ंग से न तो भाजपा को आभास हो सका और न उसके सहारे से राजनीति में प्रभावी रहने वाली कांग्रेस या सपा को उसकी भनक लगी। शायद मायावती को भी इसकी भनक लगी, तभी वे न केवल चुनाव प्रचार में नहीं निकली अपितु चुनाव के समय मुंबई, भोपाल, बंगलुरू में समय बिताती रहीं। मुस्लिम मतदाताओं की प्राथमिकता में यह बदलाव 2007 के विधानसभा के समान यदि बना रहा तो अगले चुनावों में भी इसके परिणाम हो सकते हैं।

लेकिन जिस प्रकार मोदी-योगी की नियत पर भरोसे के कारण विपरीत परिस्थिति का माहौल बनाने में संपूर्ण विपक्ष एकजुट हो गया है, वैसा कुछ मायावती के बारे में नहीं कहा जा सकता, क्योंकि चाहे कांग्रेस की सरकारें रही हो या समाजवादी पार्टी की बसपा की भी नीति और नियत में कभी तालमेल नहीं रहा है। इन पार्टियों की नीति और नियत दोनों पर ही भरोसा न रहने के कारण उनका ह्रास हुआ है। भाजपा ने केंद्र सत्ता संभालने के उपरांत जिन नीतियों को अपनाया है वह चाहे स्वच्छता सम्बन्धी हो, गरीबों को सशक्त बनाने की हो, देश की सुरक्षा की हो, विदेषों से सम्बन्ध बनाने की या फिर अत्याचारों से दबी कुचली जा रहीं मुस्लिम महिलाओं के उद्धार की, सभी आलोचनाओं का सबब बनाई गई। नोटबंदी और जीएसटी को लेकर तो सबसे ज्यादा उद्यम मचाया गया, हिन्दुत्व का एजेंडा जैसा मजहबी गौर सम्वर्धन की नीति को ‘‘गौ रक्षक हत्यारों’’ से आदि के प्रयासों से मुसलमानों को इतना उभारने का काम किया गया कि उनमें ऐसी पृथकतावादी मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनाने की मनोवृत्ति का सार्वजनीकरण हो गया। जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री तक रह चुके व्यक्ति द्वारा पाकिस्तान की वकालत में अशोभनीय भड़काऊ शब्दावलि के सहारे भी खड़े हो गए। कतिपय आर्थिक सुधार के दूरगामी परिणामों की अनदेखी कर तात्कालिक लाभ हानि के आंकलन पर उतारू भाजपा के समर्थक कोर में इसी कारण भ्रम की पैठ नहीं हो सकी क्योंकि उसने विपक्षी एकजुटता में सांप्रदायिक मानसिकता का पोषण, भ्रष्टाचारियों को बचाने की नियत और भारत के बढ़ते स्वाभिमान से जलन और कुढ़न साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है। साढ़े तीन वर्ष के मोदी शासन में एक भी भ्रष्टाचार का प्रपंच नहीं खड़ा हुआ और योगी के आठ महीने के शासन में सबका साथ और सबका विकास के विपरीत किसी कदम का सबूत मिल सका। यही नही ंतो राम की मर्यादा और गौरव के अनुरूप अयोध्या के महात्म को स्थापित करने के निर्णय, कृष्णजन्मभूमि मथुरा तथा अन्य प्राचीन तीर्थ स्थानों को पर्यटन सुविधाओं युक्त करने की दिशा में उठाये गये कदमों ने आम आवाम में अतीत के प्रति गौरव और अपने महापुरूषों के प्रति श्रद्धा के लिए जागृति उत्पन्न किया है। भ्रष्टाचारियों पर निर्मोही होकर कार्यवाही करने की-चाहे वह राजनीतिक हो या नौकरशाह, प्रक्रिया में जांच एजेंसियों को पूर्णरूपेण स्वतंत्रभाव से काम करने का अवसर देकर ऐसे कृत्यों को अंजाम देने वालों को संरक्षण प्रदान करने की अब तक चली आ रही राजनीति से दूर-दूर तक सम्बन्ध न रखने के कारण भी भाजपा की प्रतिष्ठा बढ़ी है।

उत्तर प्रदेश के शहरी निकायों के चुनाव परिणाम में न केवल गुजरात के भावी चुनाव परिणाम का पूर्व संकेत दे दिया है, अपितु यह भी साबित कर दिया है कि भाजपा का संगठन अथवा सक्रियता की प्राथमिकता से शामिल नहीं हुआ है। उसने नेतृत्व के आकर्षण के साथ-साथ चुनाव प्रबंधन में किसी प्रकार की शिथिलता नहीं दिखाई और उसके कार्यकर्ताओं में पूर्ववर्ती सरकारों के समय दलीय प्राथमिकता से प्रशासन को दबोचने की प्रवृत्ति की आकांक्षा भले ही हो, उसको सम्बल न मिलने का विश्वास बना हुआ है। इसी कारण प्रशासनिक अमले को, दायित्व निर्वाहन में कठोरता वाले रूख के बावजूद, पूर्व की भांति भयभीत रहने की मानसिकता से उभरकर काम करने का माहौल बढ़ता जा रहा है। हमारे देश में नियत का बड़ा महत्व है, माता-पिता गुरू यदि बच्चों को दंडित भी करते हैं तो उसमें बदनीयता के समावेश की गुंजाइश नहीं रहती थी, आज भी नहीं है भले ही आधुनिकता और अपने दायित्व निर्वाहन की शिथिलता को औरों पर थोपने का अभ्यास क्यों न बढ़ता जा रहा हो। मोदी और योगी की नियत के प्रति असंदिग्धता भाजपा की सफलता का कारण बनी है। राजनीति न तो खानदानी व्यवसाय की तरह उत्तराधिकार क्षेत्र है और न अक्रांता के समान लूट खसोट का क्षेत्र, न ही सेवा के बदले प्राप्त करने की भावना एक याचना के लिए बना भिक्षाटन। सेवा निस्वार्थ होती है। सत्ता सेवा के लिए है। यद्यपि यह भी कहावत है कि जो सेवा करे सा मेवा खाय, लेकिन यह मेवा वह मेवा नहीं है जिसे अभी तक खाया जा रहा था, यह मेवा मतदाताओं की अनुकूलता है जो भाजपा प्राप्त करती जा रहा है। यह उसे मिलता रहेगा जब तक उसकी नियत पर भरोसा होगा, नीति चाहे कष्टदायी भी क्यों न हो।(लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद व वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

 
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