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संपादकीय
शादी में बर्बादी रोकने को बिहार तैयार : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 4/12/2017 12:37:27 PM
शादी में बर्बादी रोकने को बिहार तैयार : सियाराम पांडेय ‘शांत’

बिहार प्रयोग भूमि है। संस्कार भूमि है। यहां की माटी ने अगर देश को देवी सीता जैसी सती दी थी तो राम और लक्ष्मण को युद्ध के संस्कार भी इसी भूमि ने दिए थे। बुद्ध को ज्ञान भी यहीं गया में मिला। गया का बोधिवृक्ष आज भी इस बात की गवाही दे रहा है। गांधी जी ने आजादी की जंग यहीं के चंपारण से छेड़ी थी। आचार्य चाणक्य तक्षशिला जाने से पहले तक तत्कालीन मगध राज्य के नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य हुआ करते थे। नालंदा विश्वविद्यालय का गौरव पूरी धरती पर था। काशी अगर संस्कृति और विद्या की वैश्विक राजधानी थी तो बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय का रुतबा भी उससे कुछ कम नहीं था। देश को सर्वाधिक आईएएस, आईपीएस अधिकारी बिहार ने दिए हैं। वैज्ञानिक और गणितज्ञ देने में भी बिहार का कोई सानी नहीं रहा है। देश-दुनिया में बिहार के लोग अपनी प्रतिभा और क्षमता का लोहा मनवा रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।

बिहार के पास बुद्धि और विचार की प्रभूत क्षमता है, इसके बाद भी विकास के मायने में उसका पिछड़ापन बौद्धिक तबके को सोच-विचार के लिए बाध्य करता है। इसमें संदेह नहीं कि जगन्नाथ मिश्र और लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का बेड़ा गर्क हुआ। वहां जातिवाद, वंशवाद ,भ्रष्टाचार और कुशासन की विषबेल पनपी। नीतीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार को तरक्की के फलसफे से जोड़ा है। उसे कामयाबी के सूत्र बताए हैं। अव्यवस्था, अराजकता से बिहार को निजात दिलाई है। व्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया है। नक्सली समस्या से निपटने का काम किया है। राज्य में कानून का राज्य स्थापित किया है। यही वजह है कि बिहार की जनता उन पर आंख मूंद कर विश्वास करती है। 

इंदिरा गांधी की तानाशाही, आपातकाल और अधिनायकवादी नीतियों को कुचलने की रणनीति जयप्रकाश नारायण के गांव में कउरा मतलब अलाव की बोरसी तापते वक्त बनी थी। वह आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन था। ऐसा आंदोलन आगे कभी होगा, इसकी उम्मीद तो नहीं ही है। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक आंदोलन जरूर हुआ था लेकिन केजरीवाल की राजनीतिक फितरत के चलते अन्ना हजारे के आमरण अनशन पर तुषारापात हो गया। अगर यह कहें कि उनका आंदोलन गलत राह पर चला गया तो कदाचित अनुचित नहीं होगा। 

सुशासन बाबू कहे जाने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले तो राज्य में शराबबंदी की। इससे शराब पर खर्च होने वाली धनराशि, मद्यपान से उत्पन्न बीमारियों पर खर्च होने वाली राशि अब परिवारों पर खर्च हो रही है। इससे महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई है। यह और बात है कि दूसरे अन्य नशों पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। सरकार को इस बावत भी विचार करना चाहिए। 

विपक्ष और उस समय सरकार में सहयोगी रही लालू यादव की पार्टी राजद के स्तर पर भी शराबबंदी का प्रबल विरोध किया गया था लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति की बदौलत नीतीश कुमार ने असंभव को भी संभव कर दिखाया। आज शराबी परिजनों से परेशान महिलाएं न केवल राहत की सांस ले रही हैं बल्कि नीतीश कुमार की भलमानसहत को प्रणाम भी कर रही हैं। उन्हें इस अच्छे काम के लिए धन्यवाद भी दे रही हैं। शराबबंदी जैसे बड़े प्रयोग की सफलता के बाद अब बिहार एक और प्रयोग की ओर बढ़ गया है। दहेज प्रथा का उन्मूलन नीतीश कुमार का बड़ा सपना है। उन्होंने बिहार में दहेजबंदी कानून लागू करने की बात की है। दहेज लेना और देना सामाजिक बुराई है। नीतीश इस बुराई की जड़ पर प्रहार कर रहे हैं। करना चाहते हैं। कानून बनने और लागू होने में भले ही अभी समय हो लेकिन मानसिकता बनाने का काम, जनजागृति लाने का काम तो उन्होंने आरंभ कर ही दिया है। उनके मंत्री भी इस काम में उनका साथ दे रहे हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के बेटे उत्कर्ष की शादी बिना किसी बैंड बाजे के संपन्न हुई है। पहली बात तो यह कि इस विवाह में दहेज का लेन-देन नहीं हुआ। दूसरी यह कि बारातियों को भोज के नाम पर केवल प्रसाद के चार लड्डू दिए गए। निमंत्रण में किसी भी तरह का उपहार लाने के लिए अतिथियों को पहले ही मना कर दिया गया था। इस विवाह के लिए निमंत्रण कार्ड भी नहीं छपे। ईमेल के जरिए सभी को सूचित कर दिया गया। शादी में पैसों की बर्बादी रोकने का हर संभव यत्न यहां हुआ। 

सुशील मोदी के बेटे की यह शादी समाज में यह संदेश दे रही है कि ‘अगर रोकनी है बर्बादी। बंद करो खर्चीली शादी।’ बिहार में इन दिनों बिना दहेज की सादगी से जा रही शादियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इस शादी को भी इसी क्रम में देखा जा सकता है। उपदेश देने का अधिकार उसी के पास है जिसमें उपदेश पर अमल करने का माद्दा हो। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिना दहेज के होने वाली शादियों में यथा संभव जाने का भी प्रयास कर रहे हैं। वे सादगी से होने वाली दर्जनाधिक शादियों में पहुंचकर वर-वधू को आशीर्वाद भी दे चुके हैं। उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी के बेटे उत्कर्ष की शादी बिहार ही नहीं, देश भर में अपनी सादगी के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है। यह शादी कई मायनों में जरा हट कर है। उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बेटे उत्कर्ष तथागत और कोलकाता निवासी नवलजी केदारनाथ जी वर्मा की बेटी यामिनी की शादी बिना दहेज, बैंड-बाजा, बारात, नाच-गाने और भोज के हुई। आमंत्रित अतिथियों में कई राज्यों के राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री, बिहार सहित कई राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, विधानसभा के अध्यक्ष, विधान परिषद के उपसभापति, राज्य सरकार के मंत्री शादी समारोह में शामिल हुए। स्वागत में सभी को चार लड्डू मिले वह भी प्रसाद स्वरूप। खर्च के नाम पर विवाह पांडाल को फूलों से सजाने, कारपेट बिछाने, एलईडी स्क्रीन और भजन गायन का खर्चा है। उपमुख्यमंत्री की शादी में जब देश भर के मेहमान पहुंचे हों तो इतनी औपचारिकता तो बनती ही है। वैसे सुशील मोदी ने सादे तरीके से बेटे का विवाह कर अपने विरोधी लालू प्रसाद यादव को एक वैचारिक झटका भी दिया है। शाही तरीके से शादी होने पर लालू प्रसाद यादव और उनके बेटों को उनके खिलाफ प्रचार का जो सुख मिलता, उससे वे वंचित रह गए। लालू के एक बेटे ने तो सुशील मोदी से अपने बेटे की तरह ही उनके लिए ही बहू ढूंढ़ने की गुजारिश कर दी। इसे विचार परिवर्तन कहें या लालू के बेटे के खिलाफ केस दर्ज होने के बाद आया बदलाव। 

खैर, विषयान्तर हुए बगैर इस बात का जिक्र करना आवश्यक होगा कि बिहार में इस शादी के बाद एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि जब उपमुख्यमंत्री के बेटे की शादी बिना दहेज के हो सकती है तो बिहार के शादी योग्य बेटे-बेटियों के विवाह संस्कार में दहेज बंधन क्यों? उनकी शादी भी तो सादे तरीके से हो सकती है। भोज-भात पर खर्च होने वाली राशि को परिजन चाहंे तो अपनी क्षमता के हिसाब से जन कल्याणकारी कार्यों में खर्च कर सकते हंै। कुल मिलाकर यह एक बहुत अच्छी शुरुआत है। देश की जनता अपने नेताओं से प्रेरणा लेती है। सुशील मोदी और नीतीश कुमार बिहार में दहेजबंदी के जिस पुनीत उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, उसमें वे पूरी तरह सफल हों, इसकी प्रार्थना की जानी चाहिए। दहेज अभिशाप है। इसके लिए रोज ही कई विवाहिताओं को उत्पीड़ित होना पड़ता है। कई को अपनी जिंदगी से असमय हाथ धोना पड़ता है। महिलाओं को सम्मान देना है, उनके प्रति अपराध रोकना है तो बिहार में ही क्यों, पूरे भारत में शराबबंदी और दहेजबंदी कानून लागू किए जाने चाहिए। बुराइयां जिस किसी भी स्वरूप में हैं, देश, प्रदेश और समाज के लिए घातक हैं। उनका पूरी दृढ़ता के साथ विरोध किए जाने की जरूरत है। लड़की को कन्यारत्न कहा गया है। जब तक उसे सबसे बड़ा धन और दहेज नहीं माना जाएगा, तब तक दहेज दानव से मुक्ति नहीं मिलेगी। इसके लिए समाज की सोच भी बदलनी है। दहेजबंदी में सरकारों को राजनीतिक नुकसान भी संभव है लेकिन समाज और देश के व्यापक हित में कुछ नुकसान सहना सत्तासीनों की जिम्मेदारी भी है और नैतिकता भी। कबीर ने लिखा है कि आगा चलकर पीछा फिरिहैं होइहैं जग में हांसी। नीतीश कुमार और सुशील मोदी जिस राह पर चल रहे हैं, वही बिहार के समग्र विकास का विकल्प भी है। 

(लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

 
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