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संपादकीय
असली और नकली संत फिर सुर्खियों में : सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 23/11/2017 11:34:07 AM
असली और नकली संत फिर सुर्खियों में : सियाराम पांडेय ‘शांत’

देश के अच्छे दिन आ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि इस देश ने अच्छा सोचना आरंभ कर दिया है। वह पहले से ज्यादा सतर्क हुआ है। सज्जनों और असज्जनों की पहचान करने लगा है। तुलसीदास जी ने दुष्टों की भी वंदना कर ली थी लेकिन काशी विद्वत परिषद वंदना में नहीं, गलत की आलोचना करने को बेताब है। असली और नकली संतों की पहचान को लेकर वह गंभीर हो गई है। असली संतों को प्रतिष्ठा दिलाना और नकली संतों का सामाजिक बहिष्कार ही उसका मकसद है। यह देश के श्रद्धालु समाज पर उसका बड़ा उपकार भी होगा। लोग पाखंडी असंतों के जाल में फंसने से बचेंगे। इससे बड़ी उपलब्धि भला और क्या होगी? 

 

 

 

 

काशी विद्वत्परिषद बड़ा काम करने जा रही है। वह असली और नकली संतों को चिह्नित कर उनकी सूची जारी करेगी और इसे अपनी वेबसाइट पर जारी करेगी। यह बेवसाइट 8 दिसंबर को लांच होनी है। हालांकि यह काम उसे बहुत पहले करना चाहिए था लेकिन जब जागे तभी सवेरा। काशी विद्वत्परिषद परिषद ने देश के सभी शैव और वैष्णव अखाड़ों को पत्र लिखकर उनसे संबद्ध संतों के नाम मांगे हैं। वे किस स्थान पर रह रहे हैं और उनका संपर्क नंबर क्या है, यह जानना चाहा है। परिषद का दावा है कि सनातन धर्म के सभी सम्प्रदायों के संतों-महंतों का पूर्ण विवरण उसकी वेबसाइट पर प्रदर्शित भी किया जाएगा। वेबसाइट पर शास्त्रीय नियमों का हवाला तो दिया ही जाएगा। अवैध तरीके से संत समेत अन्य उपाधियां न लिखने की चेतावनी भी दी जाएगी। माना जा रहा है कि कई तथाकथित संतों के भ्रष्ट आचरण और जेल जाने से व्यथित होकर परिषद ने उक्त आशय का निर्णय लिया है। 

 

 

 

 

काशी विद्वत्परिषद के मंत्री राम नारायण द्विवेदी की मानें तो आदि शंकराचार्य द्वारा देश में सिर्फ चार पीठों की स्थापना की गई थी लेकिन आज देश भर में तथाकथित शंकराचार्यो की भीड़ दिखाई दे रही है। कई कथावाचक भी खुद को संत लिखने लगे हैं। संत कहलाने लगे हैं। संत और कथावाचक का अर्थ सुस्पष्ट तो होना ही चाहिए। परिषद की कोशिश यह भी है कि कथावाचकों द्वारा खुद को संत लिखने पर भी लगाम कसने की कवायद की जाए। परिषद ने देश के सभी अखाड़ों के महामंडलेश्वरों से आग्रह किया है कि वे अपने अखाड़ों से संबद्ध संतों को सूचीबद्ध तो करें ही, उन्हें परिचयपत्र भी जारी करें जिससे कि असली और नकली संत को समझने में आम जन को कोई परेशानी न हो। तथाकथित संतों पर लगाम की नीति बनाने और कार्रवाई के लिए प्रदेश व केंद्र सरकार से भी परिषद की वार्ता चल रही है। 28 नवंबर को काशी विद्वत्परिषद की आमसभा आयोजित की गई है। जिसमें संतों पर लगाम लगाने पर विमर्श किया जाएगा। देश भर के चुनिंदा 60 विद्वानों की उपस्थिति में काशी विद्वत परिषद की कार्यकारिणी को 17 प्रांतों तक विस्तार दिया जाएगा। गलत ढंग से खुद को संत या शंकराचार्य लिखने वालों पर मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। 

 

 

 

संत और असंत का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। संत कौन है? संत की परिभाषा क्या है? संत और साधु के बीच कोई विभेद है या नहीं अथवा दोनों ही शब्द एक दूसरे के पर्याय हैं, इन सवालों पर आत्ममंथन तेज हो गया है। संत और असंत के इस फर्क को स्पष्ट करने का काम काशी विद्वत्परिषद करने वाली है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों के शंकराचार्य के चयन का दायित्व स्वामी करपात्री जी महाराज ने काशी विद्वत्परिषद और अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ को सौंपा था। शंकराचार्यों के चयन में यह अर्हता अनिवार्य की गई थी कि जिसने तीन वेदों का भाष्य और अधिकांश स्मृतियों की सुस्पष्ट व्याख्या की है, वही शंकराचार्य बनने का अधिकारी है लेकिन आज देश में कितने शंकराचार्य घूम रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है और उनमें से कितने संस्कृत जानते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। और यह सब इन दोनों संस्थाओं की लापरवाही से भी हुआ है। देश में संतों को लेकर जो अविश्वास का वातावरण बना है, उसका सीधा सा कारण यह है कि साधु और संत के रूप में दीक्षा करते वक्त उसका इतिवृत्त नहीं जाना गया। उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व, कार्य व्यवहार और लोक व्यवहार को जानने की कोशिश नहीं की गई। संत बनाने की अखाड़ों की परंपरा बहुत कठिन है। किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। योगियों को तो बारह साल भिक्षाटन के बाद अपनी माता और पत्नी से भिक्षा मांगनी होती है। मां कहकर भिक्षा लेनी होती है। 

 

 

 

साधु-संतों का जीवन भिक्षा पर ही चलता है। जन सहयोग की बदौलत ही वे लोककल्याणकारी कार्यों को अंजाम देते हैं। संतों ने जितने विद्यालय, अस्पताल खोले हैं। जितनी र्धशालाएं बनवाई हैं, उतना काम तो सरकारों के स्तर पर भी नहीं हुए हैं। लेकिन जबसे संत समाज स्व तक सिमटा है तब से उनके कार्यव्यवहार पर भी अंगुलिया उठनी आरंभ हुई है। संत का व्यवहार जनता के प्रति उनका व्यवहार विनम्र और शालीन होना चाहिए। ‘मातृवत पर दारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत।’ विद्वान, संत और साधु का स्वभाव तो इसी नीति वाक्य से तय होता है। कबीरदास जी ने लिखा है कि ‘साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देई जुड़ाय।’ और कवि पद्माकर ने इसी बात को कुछ इन शब्दों में निरूपित किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘या जग जीवन को है यहै फल जो छल छाँडि भजै रघुराई। शोधि के संत महंतनहूं पदमाकर बात यहै ठहराई।’ मतलब जो सांसारिक छल-छद्मों से दूर रहकर ईश्वर का भजन करता है। सही मायने में वही संत हैं। सवाल उठता है कि क्या भगवाधारी ही संत होते हैं। जो भगवा वस्त्र धारण नहीं करते, वे संत नहीं कहे जा सकते। अगर ऐसा है तो महात्मा गांधी को संत क्यों कहा गया? विनोबा भावे को संत क्यों कहा गया? संत की सामान्य परिभाषा यह है कि जो देश, प्रांत और समाज के लिए जीता है। दूसरों का दुख देकर जिसका हृदय पीड़ा से भर जाता है। सही मायने में वही संत है। संत बहुत बड़ी उपाधि है। वह सज्जनता की, वैराग्य की, त्याग की, तितीक्षा की और अहमन्यता के विनाश की सुपरलेटिव डिग्री है। 

 

 

 

संत के कर्म और व्यवहार ही उसका परिचय होते हैं। उसके लिए कभी परिचयपत्र की जरूरत नहीं रही लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब संतों के गले में परिचयपत्र लटकता नजर आए। अगर देश-विदेश के श्रद्धासिक्त जनमानस को इलाहाबाद के माघ मेले में ही यह नजारा देखने को मिल जाए तो कदाचित विस्मित होने की जरूरत नहीं है। इसकी अपनी वजह भी है। देश में तथाकथित संतों की बाढ़ आ गई है। यह कुछ उसी तरह का चलन था जब संतों ने खुद को भगवान घोषित करना आरंभ कर दिया था। उस समय कुछ लोग अपने आगे भगवान लिखने भी लगे थे और भक्तों के स्तर पर वे इस बात का प्रचार भी करवाने लगे थे। आज भी कुछ संत ऐसे हैं कि वे खुद को किसी भगवान से कम नहीं समझते। साथ में दुष्टावास हो जाए तो सज्जनों को भी पीड़ा भुगतनी ही पड़ती है।

 

 

 

श्रद्धालु अमूमन दो तरह के होते हैं। पहले वे जो भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें जीवन के कष्टों से मुक्ति मिल जाए और दूसरे वे जो भगवान से शक्ति मांगते हैं ताकि वे उस शक्ति का सदुपयोग कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकें। अपनी ही नहीं, दूसरों को भी परेशानियों से निकालने में मददगार साबित हो सकंे। ये दूसरे प्रकार के व्यक्ति ही संत कहलाने के योग्य हैं क्योंकि वे विजयी होना जानते हैं। जो मनुष्य भयभीत रहता है, वह हर समय एक रक्षक की तलाश में रहता है। ऐसा मनुष्य व्यक्ति हमेशा लुका-छुपी का खेल खेलता है। अपने बचाव के लिए ढाल तलाशता है और यह सब करने में ही अपना जीवन व्यर्थ कर देता है। संत प्रवृत्ति के लिए लिए कोई भी परिस्थिति प्रतिकूल नहीं होती। विषम परिस्थति आने पर भी वह डटकर उसका सामना करता है और जरूरतमंदों का मार्गदर्शक बनकर उभरता है। ऐसा मनुष्य ही आविष्कार को जन्म देता है। उसके ज्ञान से धरती पर रहने वालों का भी जीवन सार्थक होता है। हर वह मनुष्य जो जीवन के हर मोड़ पर सीखने का भाव रखता है और जो हर कठिन घड़ी को जीवन में आगे बढ़ने के अवसर के रूप में देखता है, वही संत है। 

 

 

 

विद्वान और मूर्ख में सबसे बड़ा फर्क यह होता है कि विद्वान कुछ करने या कहने से पहले सोच लेता है और मूर्ख कहने और करने के बाद सोचता और उस पर पश्चाताप करता है कि यह उसने क्या कर दिया? संत और असंत के बीच भी कमोवेश इसी तरह का अंतर है। संत किसी कार्य को ईश्वर की इच्छा और आदेश मानकर करता है। ईश्वर का काम है, इसलिए वह उसमें कोई कोताही, कोई प्रमाद और आलस्य नहीं बरतता जबकि असंत के लिए हर काम उसका अपना होता है। वह अपने काम का श्रेय ईश्वर को नहीं देता। खुद लेता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि जिससे कार्य की हानि नहीं होती, वह संत होता है। ‘ साधु ते होंहि न कारज हानी।’ वे इस बात को और आगे तक ले जाते हैं। बंदउं संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोई। संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु। बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु। संत का जन्म ही परमार्थ के लिए होता है। ‘परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर।’ लेकिन अब कुछेक साधु अपनी असाधुता, अपने अनर्थकारी कृत्यों के लिए जाने जा रहे हैं। जेल जा रहे हैं।

 

 

 

पिछले दिनों अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी नरेंद्रानंद गिरि ने कुछ नकली संतों की सूची जारी की थी। उनकी ओर से दूसरी सूची जारी करने की बात कही गई है। हालांकि इसका विरोध भी हुआ था लेकिन सच कहने का साहस भी अपने तरह की बड़ी साधुता है। उम्मीद की जा रही है कि वे इलाहाबाद के माघ मेले में या फिर इससे कुछ पहले कुछ और नकली साधुओं का नाम उजागर कर सकते हैं। माघ मेले में उनके प्रवेश के बहिष्कार की अपील कर सकते हैं। उन्हीं की राह पर कमोवेश काशी विद्वत्परिषद भी चल पड़ी है। यह अपने आप में उत्तम विचार है लेकिन महामंडलेश्वरों की सूची के आधार पर ही संतोष कर लेना मुनासिब नहीं होगा। बहुत सारे गृहस्थ संत भी हैं जो देश हित में बेहतर कार्य कर रहे हैं। अच्छा होता कि साधु-समाज उन्हें भी चिह्नित करता और उन्हें माघ मेले में सम्मानित करता। इससे लोकोपकार में रुचि रखने वालों का भी मनोबल बढ़ेगा।

 

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं) 

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