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संपादकीय
मौजूदा शिक्षा प्रणाली में बदलाव का वक्त.....
By Deshwani | Publish Date: 30/3/2017 12:35:54 PM
मौजूदा शिक्षा प्रणाली में बदलाव का वक्त.....

प्रतीकात्मक फोटोः बदलता शिक्षा प्रणाली

अनिल कुमार। नई दिल्ली

 जब से देश भर के कई राज्यों में बोर्ड और इंटरमीडिएट की परिक्षाएं शुरू हुई तब से कई राज्यों में नकलबाजों की चर्चाएं जोरो पर है.... चाहे वह देश की राजनीति तय करने वाला राज्य उत्तर प्रदेश हो या फिर पड़ोसी राज्य हरियाणा, मध्य प्रदेश या फिर गुजरात... लगभग सभी जगह एक ही जैसी तस्वीर देखने को मिल रही है... शासन प्रशासन इन नकलबाजों पर नकेल कसने में नाकाम साबित हो रही है...

बहरहाल हमारे देश में नागरिक को पीने का स्वच्छ पानी, 24 घंटे बिजली और रहने को आवास, स्सती और उच्च स्तरीय चिकित्सा उपलब्ध कराना हर बार चुनावी मुद्दा बनता है... लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद इन वादों पर कितना अमल किया जाता है और कितना पूरा हो पाता है यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है.. लेकिन शिक्षा जो कि किसी भी देश के विकास के लिए सबसे जरूरी पैमाना होता है उस पर बहस और चर्चा ही न हो.. चुनाव में मुद्दा हीं न बने तो यह उस देश के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है... और हमारा देश भी अब शायद कुछ दशकों से उसी राह पर चलता दिखाई दे रहा है...

हालांकि समय-समय पर कुछ प्रयास जरूर हुए हैं लेकिन भारत जैसे विशाल देश के लिए इतना ही प्रयाप्त नहीं है... संसद द्वारा 26 अगस्त 2009 को कानून के रूप में अधिसूचित ‘राइट टू एजुकेशन’ (आर.टी.ई.) के अंतर्गत केंद्र सरकार की ओर से 6-14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी गई और इसे 1 अप्रैल 2010 को लागू भी कर दिया गया। इसके अंतर्गत अन्य बातों के अलावा स्कूली लड़के-लड़कियों को अलग शौचालय, स्वच्छ पेयजल, अच्छे क्लास रूम, पर्याप्त अध्यापक आदि उपलब्ध करना वांछित है परंतु लागू होने के 7 वर्ष बाद भी यह योजना स्कूलों को बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने में असफल रही है। अधिकांश सरकारी स्कूलों में उपरोक्त आवश्यक सुविधाएं नदारद हैं।

इसके अलावा थोड़ी अपर क्लास अर्थात प्राइमरी और सैकेंडरी स्कूलों की बात करें तो हालत और भी ज्यादा खराब है.... एक आंकड़े के मुताबिक करीब 10 लाख अध्यापक-अध्यापिकाओं के अलावा अन्य स्टाफ की भी कमी है। आपको यह बात जरूर बता दूं कि ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून के अनुसार देश में सभी सरकारी और निजी स्कूलों में प्रत्येक 30-35 छात्रों पर एक अध्यापक होना चाहिए परंतु देश में एक लाख के आसपास (97,923) प्राइमरी और सैकेंडरी स्कूल ऐसे हैं जो मात्र एक-एक अध्यापक के सहारे ही चल रहे हैं जो इन स्कूलों के मुख्याध्यापक, अध्यापक, क्लर्क और चपरासी सभी कुछ हैं। हमारे देश में खराब शिक्षा व्यवस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ज्यादातर स्कूल 1-1 कमरे में चल रहे हैं और इनमें प्राइमरी स्कूलों की संख्या 82,000 है। और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि जब भी कभी किसी कारणवस स्कूल में अध्यापक नहीं आ पाता है तो तब तक स्कूल की छुट्टी चलती है... और इसका सुध लेने वाला कोई नहीं है...

कई ऐसी रिपोर्ट हर साल सर्वे का माध्यम से आती है जिसमें शिक्षा को सशक्त बनाने की बात कही जाती है लेकिन वह सिर्फ कागजों तक हीं सीमित रह जाती है... उसके इम्पलीमेंटेशन पर कोई ध्यान हीं नही दिया जाता है... एक टीवी चैनल के रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी जीडीपी का मात्र 4 प्रतिशत हीं शिक्षा पर खर्च कर पाता है जबकि भारत से छोटे -छोटे देश अपनी जीडीपी का 6 से 10 प्रतिशत तक खर्च करते हैं....

अब सवाल आता है कि क्या सिर्फ शिकायत कंट्रोल रूम बना देने से या फिर अधिकारी को सस्पेंड कर देने से या फिर सबकुछ ठीक कर दिया जाए तो क्या परीक्षाओं में नकल रूक जाएगी.... मेरा मानना है बिल्कुल नहीं... जब तक शिक्षा के फोर्मेट में बदलाव नहीं होगा तब तक नकलबाजी और इसका गोरखधंधा नहीं रूकने वाला है... मसलन मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक बोझ की तरह लगता है... मेरे पास बचपन से विषय चुनने की आजादी नही होती है... जिस विषय या क्षेत्र में मैं अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता हूं उस विषय को चुनने की आजादी हमें नहीं मिलती... हमें एक बोझ की तरह आंख-कान मिच कर अनावश्य विषय मजबूरी में पढ़नी पडती है और यही वजह है कि नकल करने की आदत पड़ जाती है या फिर पास करने के दबाव में नकल करना मजबूरी हो जाती है... यदि प्रत्येक विद्यार्थी को अपने बौद्धिक क्षमता के अनुरूप आठवीं के बाद विषय चुनने की आजादी दे दी जाए तो मेरा मानना है कि नकल तो रूकेगी हीं साथ हीं हमारे देश के युवा स्वावलंबी बनेगें... उनके सामने रोजगार का एक नया विकल्प होगा और वह देश के विकास में अपना बेहतर योगदान दे सकता है.... 

हमारे देश कि वैदिक शिक्षा पद्धति देश की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा पद्धति है, लेकिन हम आधुनिकता के आड में इसे भूलकर तरह-तरह तरह के शिक्षा प्रणाली को अपना रहे हैं... क्या आधुनिक दौर में अपनाए जा रहे विषयों को भारतीय वैदिक शिक्षा प्रणाली के तहत संचालित नहीं किया जा सकता है...एक विद्यार्थी जो पेंटिंग में अच्छा कर सकता है उसे मैथ और साइंस का विषय क्यों पढ़ना... एक छात्र जो डॉक्टर बनने की काबिलियत रखता है वह इतिहास और भूगोल क्यों पढ़े.... एक छात्र जो इंजीनियर बन सकता है वह अन्य तरह के विषय पर अपना ध्यान केंद्रित क्यों करे.... जो विद्यार्थी जिस क्षेत्र में अपना भविषय उज्जव देखता है... जिस क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है हमसब की जिम्मेदारी बनती है कि उसे उसी क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए अवसर उपलब्ध कराये... और यह सब 12वीं के बाद नहीं बल्कि आठवीं के बाद होनी चाहिए.... क्योंकि किसी भी देश की प्रगति के लिए उसकी युवा पीढ़ी का बौद्धिक और शारीरिक रूप से मजबूत होना बहुत जरूरी है। यदि शुरूआती चरण में ही बच्चे स्तरीय शिक्षा से वंचित रह जाएंगे तो नींव ही कमजोर रह जाने के कारण ऊंची कक्षाओं में उनसे उच्च शिक्षा स्तर की आशा कदापि नहीं की जा सकती और वे देश के लिए उपयोगी नागरिक सिद्ध नहीं हो सकते। ऐसे में प्राइमरी व सैकेंडरी चरण पर ही स्कूलों का बुनियादी ढांचा मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है ताकि शुरू से ही बच्चों की शिक्षा का स्तर उन्नत हो सके और वे बड़े होकर उपयोगी नागरिक सिद्ध हों। 

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