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संपादकीय
विमुद्रीकरण के एक साल बाद भी स्याह को सफेद न कर पाने का मलाल : सियाराम पांडेय‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 8/11/2017 11:35:34 AM
विमुद्रीकरण के एक साल बाद भी स्याह को सफेद न कर पाने का मलाल : सियाराम पांडेय‘शांत’

विमुद्रीकरण जिसे देश में नोटबंदी कहा जा रहा है, के एक साल पूरे हो गए। कांग्रेस जहां 8 नवंबर को काला दिवस मना रही है, वहीं भाजपा ने इसे जनजागृति दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। नोटबंदी निश्चित रूप से एक साहसिक कदम था। दुनिया के कोई भी देश नोटबंदी का निर्णय इस तरह नहीं लेते। जाहिर तौर पर इससे काला धन पर अंकुश लगाने में सरकार को मदद मिली। लोगों का घर में रखा पैसा बैंकों में आ गया। इससे आर्थिक ठहराव के दौर से गुजर रहे बैंकों को नई संजीवनी मिली। नोटबंदी से मोदी सरकार बेहद उत्साहित है और अब वह इसकी सफलता को देखते हुए नोटबंदी पार्ट-2 लागू करने पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि इस बार उसके निशाने पर लोगों की बेनामी संपत्ति होगी। इसे लेकर सरकार की ओर से रोडमैप भी प्रस्तुत किया जा सकता है। 10 नवंबर के पहले ही सभी केंद्रीय मंत्रियों की बैठक बुलाया जाना इस बात का संकेत है कि सरकार भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ अंकुश लगाने में पीछे नहीं हटने जा रही है। बेनामी संपत्तियों को जब्त करने के संकेत तो प्रधानमंत्री पहले भी दे चुके हैं। कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के शुरुआती जांच आंकड़ों पर गौर करें तो उसे 56 बैंकों से जो डाटा मिले हैं, उसके अनुसार 35000 कंपनियों के 58000 बैंक खातों में नोटबंदी के बाद 17 हजार करोड़ जमा हुए और निकाले गए। केंद्र सरकार ने कई शेल कंपनियों का पता लगाने की बात भी कही है। सरकार गुजरात और हिमाचल चुनाव के मद्देनजर चुप्पी साधे हुए हैं। उसे लग रहा है कि नोटबंदी पार्ट-2 का असर विधानसभा चुनाव में भी पड़ सकता है लेकिन कार्रवाई का रोडमैप तय करने में कोई बुराई नहीं है। 

 

गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद आयकर विभाग एक लाख ऐसी कंपनियों या लोगों को नोटिस जारी करेगा, जिन्होंने देश में नोटबंदी के बाद बड़ी मात्रा में नकद धन जमा कराया था और जिन करदाताओं की टैक्स रिटर्न विस्तृत जांच के लिए चुनी गई है। सूत्रों की मानें तो नोटिस इसी हफ्ते से भेजने शुरू कर दिए जाएंगे। पहली बार उन 70 हजार एंटिटी को नोटिस भेजा जाना है जिन्होंने बैंकों में 50 लाख या उससे ज्यादा धन जमा किया था, लेकिन आयकर रिटर्न फाइल या विभाग के सवालों के जवाब नहीं दिए। नोटबंदी के बाद करीब 20,572 टैक्स रिटर्न की विभाग जांच कर रहा है। 17.73 लाख संदिग्ध मामले सामने आए हैं, इनमें 3.68 लाख करोड़ रुपयों का पता लगा लिया गया है जो कि 23.22 लाख बैंक खातों में नोटबंदी के बाद जमा किए गए थे। देश में नोटबंदी के बाद आयकर रिटर्न की ई-फाइलिंग में 17 फीसद की तेजी यह बताती है कि नोटबंदी सफल रही है। जो लोग कर नहीं देते थे, अगर वे भी कर दे रहे हैं तो इसका मतलब यह है कि नोटबंदी से देश में आर्थिक जागृति और पारदर्शिता आई है। 

 

विमुद्रीकरण वाजिब था या नहीं, इस मुद्दे पर हर राजनीतिक दल अपनी बात को सही ठहराने में जुटा है। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि नोटबंदी का फैसला अभूतपूर्व था। सरकार ने अर्थव्यवस्था का भविष्य बदला है। वे देश के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व वित्तमंत्री मनमोहन सिंह के उन आरोपों का जवाब दे रहे थे जिसमें उन्होंने नोटबंदी को केंद्र सरकार की संगठित लूट करार दिया था। जिसका खुद का कारोबार न चलता हो। जो अपने कर्मचारियों की स्थिति सुधारने की बजाय, उन्हें समय पर वेतन देने की बजाय अपनी कंपनी बंद कर देता हो, ऐसा व्यक्ति अगर नोटबंदी की सलाह दे और उस पर कांग्रेस और भाजपा जैसे दो बड़े दल गौर करें। नोटबंदी के प्रयास करें और इसके बाद वही व्यक्ति नोटबंदी को गलत ठहराए, इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है। हम बात कर रहे हैं अर्थक्रांति प्रतिष्ठान के संस्थापक अनिल बोकिल की जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही नहीं, इससे पहले राहुल गांधी को भी बड़ी नोटों को बंद करने की सलाह दी थी। अर्थक्रांति प्रतिष्ठान इंजीनियरों और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की संस्था है। उसने सरकार के सामने प्रस्ताव रखा कि आयात शुल्क को छोड़कर 56 तरह के टैक्स वापस लिए जाएं। 1000, 500 और 100 रुपए के नोट वापस लिए जाएं क्योंकि देश की 78 प्रतिशत आबादी रोज सिर्फ 20 रुपए खर्च करती है। ऐसे में, उन्हें 1000 रुपए के नोट की क्या जरूरत है? सभी तरह के बड़े लेन-देन सिर्फ बैंक से जरिए चेक, डीडी और ऑनलाइन हों। धन के लेन-देन की सीमा तय हो। 

 

अब वे कह रहे हैं कि जनता को विश्वास में लिए बगैर यह सब कर दिया गया। सवाल उठता है कि बोकिल ने अर्थशास्त्र की किस किताब में यह पढ़ लिया कि देश की 78 प्रतिशत आबादी सिर्फ 20 रुपये खर्च करती है। बीस रुपये में उसका काम कैसे चलता है? इस महंगाई के दौर में 20 रुपये की हैसियत क्या है?यह किस तरह का अर्थशास्त्र है। अगर इस देश की क्रय क्षमता 20 रुपये है तो यह तो इस देश की अर्थ व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। नोटबंदी अच्छी है या बुरी, इससे देश को लाभ हुआ या नुकसान, इसकी चर्चा किए बगैर यह कहना मुनासिब समझता हूं कि जो कायदे से अपनी कंपनी न संभाल पाया, उसकी सलाह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यकीन कैसे कर लिया? माना कि देश को बड़ी नोटों की जरूरत नहीं थी तो बड़ी नोटों के बराबर छोटी नोटों की व्यवस्था कैसे होती? जब 2000 और 500 की नई नोट छाप कर देने में, उसके करेंसी चेस्ट बनाने में सरकार को पसीने छूट गए तो छोटी नोटों का रखरखाव क्या बैंकों के लिए इतना आसान था?

 

वित्तमंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि साधन संपन्न आदमी जब साधन को जेब में रख लेता है तो यह अन्याय है। क्योंकि इससे गरीबों का हित प्रभावित होता है। राजनीतिक व्यवस्था में धन का अतिरेक भ्रष्टाचार की वजह बनता है। उनकी सरकार ने सत्ता में आने के बाद आर्थिक क्षेत्र में सुधार के अनेक प्रयास किए हैं। एसआईटी के गठन, ब्लैक मनी लॉ, विदेशों से ट्रीटी को संशोधित करना और लेन-देन में पारदर्शिता लाने को इसी रोशनी में देखना मुनासिब होगा। खर्च किस तरह से हो, उस पर शर्त लगाना, बेनामी कानून लाना, परोक्ष व्यवस्था में बदलाव के सहज परिणाम लोगों ने साल भर देखे हैं। वे मानते हैं कि नोटबंदी हर समस्या का हल नहीं है लेकिन इसने एजेंडा बदला है। बड़़े नोट कम हुए हैं। टेरर फंडिंग पर काफी हद तक रोक लगी है। 10 लाख ऐसे हैं जिन्हें टैक्स नेट में आना पड़ा। शेल कंपनियों का पता लगाना सरल हुआ। बकौल जेटली, सरकार ने जो कुछ भी किया है, देश हित में किया है। नैतिक रूप से सही कदम उठाया है लेकिन इसके बाद भी अगर पूर्व प्रधानमंत्री नोटबंदी को संगठित लूट बता रहे हैं तो उन्हें यह बताना चाहिए कि 2जी, कॉमनवेल्थ और कोल गेट में कितनी लूट हुई। 

 

सवाल यह उठता है कि कांग्रेस ने अगर काले धन पर अंकुश लगाया होता तो भाजपा को श्रेय लेने का मौका ही नहीं मिलता। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मानें तो कांग्रेस सरकार ने 14 करोड़ लोगों की गरीबी दूर की। ये 14 करोड़ लोग कौन हैं? कहां रहते और क्या करते हैं, मनमोहन सिंह इस पर भी रोशनी डालते तो शायद ज्यादा मुफीद होता। इस बात को उन्हें लोकसभा चुनाव में कहना चाहिए था। नहीं कह पाए तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ही कह देते। भाजपा सरकार आती ही नहीं। एक भोजपुरी गीत है कि ‘जब कुल गुड़ गोइठां होइ जइहैं, दंतवै निपोर के का करबा।’ गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि ‘ का बरखा जब कृषि सुखानी।’ अवसर पर कही गई बात ही सार्थक होती है। मानव मन का विज्ञान तो यही कहता है। नोटबंदी को कांग्रेस भले ही सरकारी भूल मानें लेकिन इस देश की जनता को इसमें मोदी के नीयत की खोट नजर नहीं आती। कांग्रेस को लगता है कि नोटबंदी से आर्थिक असमानता बढ़ी है। विकथ्य हैै कि देश की 90 प्रतिशत पूंजी देश के 8-10 पूंजीपतियों के हाथ में है और वर्षों से है। यह अनवरत चला आ रहा है। गरीब और गरीब होता गया है और नेताओं तथा नौकरशाहों की संपत्ति में बेतहाशा इजाफा हुआ है। आर्थिक असमानता का इतना बड़ा अंतर कांग्रेस को अपने दौर में नजर क्यों नहीं आया, विचारणीय बिंदु तो यह है। 

 

पैसा सब कुछ नहीं है, यह कहने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे लेकिन पैसा बहुत कुछ है। पैसे के बिना जिंदगी का आनंद चला जाता है। आदमी दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। मौलिक सुविधाओं से वंचित हो जाता है। ऐसे ही लोगों के लिए नीतिशास्त्रों में शायद यह बात कही गई थी कि पैसा ही धर्म है, पैसा ही कर्म है। पैसा ही सबसे बड़ी तपस्या है। जिसके घर में पैसा नहीं होता, उसके घर में हाय पैसा हाय पैसा वाली स्थिति बन जाती है। पैसे को लेकर टकटकी बंध जाती है। ‘टका धर्मः टका कर्मः टका एव परमं तपः। यस्य गेहे टकान्नास्ति हा टका टकटकायते।’ नीतिग्रंथ बु़िद्ध और विवेक के साथ धर्मपूर्वक धनार्जन की राय देते हैं। जीवन के चार प्रमुख लक्ष्यों में धर्म के बाद अर्थ का दूसरा स्थान है। कई जगह तो ‘धनाद धर्मः ततः सुखम’ कहा गया। धन से धर्म होता है। मतलब धन सर्वोपरि है लेकिन धनार्जन में अगर धर्म का विचार किया जाए तो अधिक धन रखने की वजह से दंडित न होना पड़ा। कुछ लोगों के धनलोलुप होने का खामियाजा पूरे देश को न भुगतना पड़े। धर्म शास्त्रों में चार तरह के संयम बताए गए हैं। ‘समय संयम, विचार संयम, अर्थ संयम और इंद्रिय संयम।’ अर्थ के अपरिग्रह की बात कही गई है। संतोष को धन कहा गया है और दुनिया के सारे धन को इसके समतुल्य तुच्छ माना गया है। लोभ को सबसे बड़ा पाप कहा गया है। नीति कहती है कि धन की रक्षा यत्नपूर्वक की जानी चाहिए लेकिन नोटबंदी के दौर में बोरों नोट नदियों तालाबों में फेंक दिए गए। उन्हें या तो जला दिया गया या काटकर बर्बाद कर दिया गया था। सरकार के इस तर्क में दम है कि उसकी आलोचना वही लोग कर रहे हैं जो अपना काला धन पूरी तरह सफेद नहीं कर पाए। जिन्होंने कभी टैक्स नहीं दिया, लेकिन अब उन्हें टैक्स देना पड़ रहा है। अच्छा होता कि नोटबंदी पर बहस करने की बजाय देश को आगे ले जाने और विवेकसम्मत निर्णय लेने पर मंथन होता। यही वक्त की मांग भी है। 

-लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। 

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