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संपादकीय
गौरक्षा-सात नवम्बर 1966 की काली यादें : बृजनन्दन यादव
By Deshwani | Publish Date: 7/11/2017 11:55:08 AM
गौरक्षा-सात नवम्बर 1966 की काली यादें : बृजनन्दन यादव

सात नवम्बर 1966 का स्मरण होते ही दिल दहल उठता है। 07 नवम्बर 1966 को दिल्ली में गौ वध बन्दी की मांग करते हुए साधु संतों और गौ भक्तों पर जो बीता उनको शायद इसकी कल्पना भी नहीं रही होगी। गो वध वन्दी की मांग करने पर गौ भक्तों पर इंदिरा गांधी ने गोलियां चलवा दी थी। उस समय ऐसा वातावरण बनाया गया था जैसे सरकार जान लेने पर तुली हो। यही नहीं, रात के अन्धेरे में गोभक्तों को बड़ी बेरहमी से पीटा गया और ट्रकों में लादकर दिल्ली से बाहर ले जाया गया और बिना देखे कि उनमें कुछ जीवित हैं, उन पर पेट्रोल डालकर जला दिया गया। इससे पहले एक घटना का उल्लेख करना जरूरी है। 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री की हत्या के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गाँधी का चुनाव जीतना मुश्किल था।

 

स्वामी करपात्री महाराज के आशीर्वाद से इंदिरा गांधी चुनाव जीती। इंदिरा गांधी ने उनसे वादा किया था चुनाव जीतने के बाद गाय के सारे कत्ल खाने बंद हो जायेगें। वादे से मुकरना नेहरु परिवार की खानदानी आदत है। वही हुआ चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गांधी पलट गयी। करपात्री जी ने इंदिरा गांधी से कहा गाय के सारे कत्ल खाने बंद करो। इंदिरा गांधी ने धोखा दिया। कोई कत्लखाना बंद नहीं किया। करपात्री महाराज का धैर्य जवाब दे गया। करपात्री जी ने एक दिन लाखो भक्तांे और संतों के साथ संसद का घेराव कर दिया और कहा की गाय के कत्लखाने बंद होंगे, इसके लिये बिल पास करो। बिल पास करना तो दूर इंदिरा गांधी ने उन भक्तों संतों के ऊपर गोलियां चलवा दी। सैंकड़ो गौ सेवक एवं संत मारे गए। वह तिथि थी 07 नवम्बर 1966। तब करपात्री जी ने उन्हें श्राप दे दिया की जिस तरह तुमने गौ सेवकों पर गोलिया चलवाई है उसी तरह तुम मारी जाओगी। जिस दिन इंदिरा गांधी ने गोलियां चलवाई थी उस दिन गोपा अष्टमी थी और जिस दिन इंदिरा गांधी को गोली मारी गई उस दिन भी गोपा अष्टमी ही थी। करपात्री जी महाराज का श्राप फलित हुआ। इस आन्दोलन में 250 संतों ने अपने प्राणों की आहुति दी। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने गृहमंत्री गुलजारी लाल नन्दा को कहा कि आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दे दो। इसके उत्तर में नन्दा ने कहा कि यह कार्य उचित नहीं है जिसके बाद उन्होंने अपना त्यागपत्र दे दिया। 1966 में महात्मा रामचन्द्र वीर ने अनशन करके स्वयं को नरकंकाल जैसा बनाकर अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने 72 दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने 65 दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने 52 दिन और जैन मुनि सुशील कुमार जी ने 4 दिन तक अनशन किया। इस घटना की देशभर में घोर निन्दा हुई। बाद में इंदिरा को भी गलती का अहसास हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इसी वर्ष गौरक्षा का प्रस्ताव पास किया। गोरखपुर से प्रकाशित हिन्दी कल्याण मासिक पत्रिका ने 1966 में ही गौरक्षा विशेषांक निकालकर लोगों को जागरूक किया। इसके बाद देश में गौ रक्षा का आन्दोलन कुछ समय के लिए ठण्डा पड़ गया।

 

सन् 1985 ई. में विश्व हिन्दू परिषद ने गोवंश हत्या बन्दी हेतु राष्ट्रव्यापी प्रखर आन्दोलन करने की घोषणा की थी। परंतु कुछ ही वर्षों के बाद रामजन्म भूमि आन्दोलन को प्रधानता देकर गोरक्षा आन्दोलन को खटाई में डाल दिया गया जिससे गोरक्षा आन्दोलन ठण्डा पड़ गया। ऐसा ही एक और आन्दोलन विश्व मंगल गौग्राम यात्रा का था। इस आन्दोलन के माध्यम से संघ के स्वयंसेवकों ने समाज में जागृति लाने का काम किया। जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती के नेतृत्व में गोभक्तों ने गांव-गांव में जाकर गोरक्षा के लिए लोगों को जागृत किया। 28 सितम्बर 2009 से 17 जनवरी 2010 के बीच आयोजित इस यात्रा की मुख्य व उपयात्राओं के अन्तर्गत देश के 4.11 लाख ग्रामों में सम्पर्क हुआ है। कुल 2.34 लाख स्थानों पर हुई सभाओं में लगभग डेढ़ करोड़ जनता उपस्थित रही है। गोवंश रक्षा की माँग के समर्थन में लगभग साढ़े आठ करोड़ नागरिकों के हस्ताक्षर हुए हैं, जिनमें सभी मत-पंथों के लोग सम्मिलित थे। इसके बाद 2004 को रामलीला मैदान नई दिल्ली में बहुत बड़ा गोरक्षा सम्मेलन हुआ जिसमें लगभग 50 हजार गौभक्तों ने भाग लिया था। उसी दिन लोकसभा में भी प्रदर्शन हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के यहां से बुलावा आया। प्रतिनिधिमण्डल ने प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपा। कुछ नहीं हुआ वहीं आज जब केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार है तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। जनसंघ ने अपने प्रथम अधिवेशन में गौरक्षा की बात कही थी। आज उसे साकार करने का समय आ गया है। अब देखना है कि मोदी सरकार गोवध बन्दी का कानून बनाती है या फिर वह भी अन्य राजनीतिक पार्टियों की तरह अपना समय व्यतीत करती है। कई प्रदेशों में गोहत्या प्रतिबंधित है लेकिन वहां गोहत्या हो रही है। उत्तर प्रदेश में गोहत्या पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है इसके बावजूद गोहत्या हो रही है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार का एक सराहनीय प्रयास रहा कि सरकार बनते ही प्रदेश के सारे बूचड़खाने बन्द करवा दिये गये। यह सामान्य निर्णय नहीं था। यह अलग बात है कि अभी हाल हीं में लखनऊ में संपन्न विहिप के गौरक्षा सम्मेलन में विहिप नेता खेमचन्द्र शर्मा ने मंच पर मुख्यमंत्री योगी की उपस्थिति में कहा कि देश में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा गोमांस निर्यातक प्रदेश है। वहीं मुख्यमंत्री ने स्पष्ट घोषणा करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश से अब एक तिनका भी गोमांस का निर्यात नहीं होता है। योगी ने एक अच्छी घोषणा जरूर की कि पूरे प्रदेश के हर जिले में गोशाला बनवायी जायेगी।

 

द्वापर युग में लीला पुरूषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने जनता को गोपालन का संदेश दिया था। आज भी देश में हजारों गौशालाएं चल रही हैं। ऐसे ही एक गौशाला राजस्थान के पथमेढ़ा में है। वह राजस्थान-मध्यप्रदेश के बार्डर पर है। पथमेढ़ा गौधाम में वर्तमान में एक लाख से ऊपर गाय हैं। उक्त परिसर कई एकड़ में फैला है। गायों के ठहरने के लिए बड़े-बडे़ अहाते बने हैं। प्रत्येक परिसर में 10 हजार गायों के ठहरने की व्यवस्था है। उस गौशाला में गो चिकित्सालय भी चलता है। वहां की गौशाला का घी देशभर में जाता है। उससे होने वाली आमदनी को गौशाला में लगाया जाता है। इस गौशाला से लोगों को पालने के लिए बछडे़ एवं गाय निःशुल्क दिये जाते हैं। गौशाला के स्वामी दत्तशरणानन्द जी महाराज हैं। उनकी खासियत यह है कि वह फोटो नहीं खिंचवाते हैं। वह विगत 22 वर्षों से गौ सेवा में लगे हैं। गो संरक्षण एवं गो सवंधर्न का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। सरकार को भी इस प्रकार के प्रकल्प खड़ा कर उसको औद्योगिक रूप देना चाहिए। अगर हमें गोवंश को बचाना है तो गोबर और गोमूत्र के प्रयोग से हमें हर वह वस्तु बनानी होगी जो मनुष्य मात्र के लिए उपयोगी हो। इसके अलावा यह भी सिद्ध हो गया है कि अगर कृषि की उर्वरा शक्ति को बरकरार रखना है तो गौपालन को बढ़ावा देना पड़ेगा। गौपालन को बढ़ावा देने से जहां लोगों को पौष्टिक दूध उपलब्ध होगा वहीं कृषि की सेहत भी अच्छी होगी। गोमूत्र का उपयोग दवाईयों के बनाने में भी हो रहा है और गोमूत्र से बनी दवाईयां कई असाध्य रोगों को ठीक करने में भी कामयाब हुई हैं। गाय के दूध से मन में न केवल सात्विक विचार आते हैं, अपितु हमारा शरीर भी निरोगी रहता है। जो लोग भैंस का दूध पीते हैं, उनकी विचार शक्ति अधिक प्रखर नहीं होती। हिन्दू धर्म ग्रंथों में ऐसा भी वर्णन है की गौमाता के शरीर पर हाथ मात्र फेरने से असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। सरकार को इस बारे में पहल करनी चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए माइक्रो डेयरी योजना और मिनी माईक्रो इकाइयों की स्थापना की है लेकिन इन इकाइयों में पशुओं की संख्या अधिक होने से आम आदमी की पहुँच से यह योजना कोसों दूर है। सरकार को चाहिए कि गौवंश को बढ़ावा देने के लिए दो गाय खरीदने के लिए लोन के साथ किसान को अनुदान देना चाहिए साथ ही पशु चिकित्सा की व्यवस्था भी सुदृढ़ करना चाहिए। आज गायों की प्रजाति घट रही है। यह चिंता का विषय है कि देशी गायें समाप्त हो रही हैं। (लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)

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