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संपादकीय
सृष्टि रक्षा का महापर्व है छठ : आमोदकान्त
By Deshwani | Publish Date: 23/10/2017 1:09:48 PM
सृष्टि रक्षा का महापर्व है छठ : आमोदकान्त

सूर्य षष्ठी को मनाया जाने वाला अनुपम लोकपर्व छठ, मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। हिन्दुओं के इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलम्बी भी मनाते देखे गये हैं। वर्ष में दो बार (चैत्र और कार्तिक) मनाया जाने वाला यह छठ पर्व सामान्य रूप से पुत्र कामना का पर्व माना जाता है, लेकिन यह सही नहीं है। इस पर्व में संतान की कामना का विधान है, न केवल पुत्र कामना का। इसे लोकगीतों में होने वाली कामना ''पाँच पुतर, अन, धन, लछमी, लछमी मँगबे जरूर'' में देखा-सुना जा सकता है। पुराणों में वर्णित राजा प्रियवद तथा उनकी पत्नी मालिनी के लिए महर्षि कश्यप द्वारा कराया जाने वाला पुत्रेष्टि यज्ञ और फिर मृत पैदा हुए पुत्र के हृदयविदारक वियोग की कथा ने छठ पर्व के महत्व को बताया है तो ब्रह्माजी की प्रकट हुई मानस कन्या देवसेना ने सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से खुद के उत्पन्न होने की बात बताकर कन्याओं के महत्व को प्रतिष्ठित किया। उनके तेज और सृष्टि में कन्याओं की उपयोगिता को सिद्ध किया। पुत्र कामना को पूरा करने को षष्ठी रूपी कन्याओं की पूजा करनी होगी। इसलिए यह कन्या रूपी देवी का पर्व है।

ऋग्वैदिक कालीन ग्रंथों के अलावा विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण में होने वाले छठ पर्व का उल्लेख ऋग्वैदिक काल से प्रारम्भ होकर मध्य काल तक व्यवस्थित रूप में प्रतिष्ठित हो गया था। सृष्टि और पालन शक्ति की आस्था से जुड़ा होने के कारण सूर्य की उपासना सभ्यता के विकास के साथ बढ़ता गया। देवता के रूप में सूर्य वन्दना का पहली बार उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। उपनिषद, निरुक्त में भी इसकी चर्चा हुई। यहाँ तक कि निरुक्त के रचियता यास्क ने द्युस्थानीय देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर रखा और उससे निकलने वाली किरण षष्ठी के प्रभाव को बताया।

पौराणिक काल के आरोग्य देव सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता है। ऋषि-मुनियों के अनुसन्धान में एक खास दिन इसका प्रभाव विशेष मिला। यही छठ पर्व के उद्भव की बेला थी। सृष्टि रक्षा का महापर्व की आधारशिला रखने का समय था। अपने पौत्र शाम्ब को कुष्ठ रोग से निजात दिलाने को भगवान कृष्ण ने यूं ही नहीं सूर्योपासना कराई। शायद उन्हें भी पता था कि शाक्यद्वीपीय ब्राह्मणों के आशीर्वाद से होने वाले सूर्योपासना पद्धति से ही रोग से मुक्ति मिल सकती है। महाभारतकालीन पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी सूर्योपासना से परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी उम्र की कामना की थी। इसलिए यह आरोग्य का पर्व है।

यह पर्व एक लोक कल्याणकारी राज्य के लिए भी उतना ही महत्व का है, जितना कि माताओं की संतान प्राप्ति की कामना के लिए। यही वजह है कि लंका विजय के बाद होने वाले रामराज्य की स्थापना के दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया। सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद लिया और तब राज्य की बागडोर संभाली। यह लोक-कल्याण का पर्व है।

महाभारत कालीन सूर्यपुत्र कर्ण के प्रतिदिन कमर तक जल में खड़ा होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देने का उल्लेख किसी से छिपा नहीं है। उनके दानवीर होने का प्रमाण यही पर्व माना जाता है। अर्घ्य के समय दिया जाने वाला दान उसी परंपरा का निर्वहन है। इसलिए यही दान का पर्व है।

इस पर्व का वैज्ञानिक आधार भी है। चैत्र और कार्तिक की षष्ठी तिथि को होने वाले एक विशेष खगोलीय परिवर्तन से निकलने वाली सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र होतीं हैं। मानव और पृथ्वी के जीव मात्र के लिए खतरा उत्पन्न करने वाली होती हैं। ऐसे में इसके सम्भावित कुप्रभावों से मानव की यथासम्भव रक्षा करने का सामर्थ्य देने वाला यह पर्व ही महापर्व छठ में रूप में जाना गया।

यह वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी पर पहुंचने वाला सूर्य का प्रकाश वायुमंडल, आयन मंडल से होता हुआ गुजरता है। ऐसे में वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदलता है, फिर सूर्य की पराबैगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित कर लेता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुँचता है। पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाली सूर्य की पराबैगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहनसीमा में होती है। मनुष्यों पर उसका कोई विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उस धूप की वजह से हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं तथा मनुष्य या जीवन को लाभ होता है। इसलिए यह विज्ञान और सृष्टि का पर्व है।

चूंकि, सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुई सूर्योदय और सूर्यास्त के समय पृथ्वी पर सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँचकर सघन होती हैं, इसलिए इसे मनाने का समय भी कुछ ऐसा ही निर्धारित है। व्रतधारी सूर्योदय और सूर्यास्त को अर्घ्य देते हैं।

यह पर्व, लोक-संस्कृति का महापर्व भी है। इसकी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष का जुड़ाव भक्ति और अध्यात्म से परिपूर्ण है। बांस से बने सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तन, गन्ना, गुड़, रस, चावल और गेहूँ के आटे से बना प्रसाद ठेकुआ समाज के हर वर्ग से जुड़ा है। इसमें हर गरीब और समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण का भाव छिपा है। यही वजह है कि यह सुमधुर लोकगीतों से युक्त लोक जीवन की भरपूर मिठास का पर्व है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ नहीं हैं। किसान और ग्रामीण जीवन है। व्रत के लिए न के बराबर धन चाहिए तो पुरोहित या गुरु के बिना भी इसकी अभ्यर्थना की जा सकती है। हालांकि, ऐसा करने में पूजा पद्धति प्रभावित हो सकती है। बावजूद इसके कोई विशेष जरूरत नहीं है। अर्घ्य आदि के लिए व्रतधारी पास-पड़ोस से सहयोग ले लेते हैं और व्रत को पूरा करते हैं।

इतना ही नहीं, यह सेवा, भक्ति और समर्पण भाव का पर्व है। लोग सामूहिक रूप से नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था में जुटे रहते हैं। चंदा आदि से ही इसका प्रबंधन करते हैं। सरकार की सहायता की राह नहीं देखते, बल्कि खुद के प्रयासों से आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। खरना से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। सामान्य और गरीब लोग अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा और भक्ति भाव से सामूहिक कर्म का विराट उदाहरण पेश करते हैं।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े हैं)

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