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संपादकीय
सरकारी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है...
By Deshwani | Publish Date: 20/2/2017 12:57:17 PM
सरकारी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है...

 अनिल कुमार । नई दिल्ली 

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इस देश के सभी नागरिकों को समानता के साथ जीने का अधिकार संविधान देता है। स्वतंत्र रूप से अपनी बात को जाहिर करने, लिखने, बोलने की आजादी देता है... लेकिन लोकतंत्रिक देश के लिए एक दुर्भाग्य है कि उस देश का कानून अंधा होता है... उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता है... अब कोई कुछ भी देख हीं नहीं सकता तो फिर न्याय कैसे करेगा-किसके पक्ष में करेगा... कानून की तीसरी आंख (कानून के रखवाले) अपनी मर्जी और सुविधानुसार फैसला सुनाते हैं... परिणाम स्वरूप कानून को जेब में लेकर घूमने वाले लोग अपराध करने के बाद भी बच निकलते हैं और एक आम आदमी से यदि अनजाने में या फिर मजबूरी में भी कोई गलती हो जाए तो अनेको-अनेक कानूनी धाराएं उस पर लगा दिए जाते हैं और फिर उसका सारा जीवन जेल में कटता है या फिर कोर्ट का चक्कर काटने में कटता है...

अब.. ऐसा नहीं है कि रईसों या फिर ब़डे लोगों को अपराध करने पर सजा नहीं होती है या फिर कानून उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करता है.. होता है..लेकिन मेरा सिर्फ इतना कहना है कि आम नागरिक और खास लोगों के बीच मिलने वाले न्याय और कार्रवाई की प्रक्रिया में आसमान-जमीन का अंतर होता है... अब अपराधी तो अपराधी होता है तो फिर अलग-अलग तरह की व्यवस्था क्यों...?

अभी कुछ दिन पहले हीं तमिलनाडू विधानसभा का जो नजारा पूरे देश में देखने को मिला उससे हजारों सवाल एक आम नागरिक के जहन में उत्पन्न हुआ होगा...हालांकि तमिलनाडू विधानसभा का यह नजारा कोई नया या फिर अपवाद नहीं है.. बल्कि इससे पूर्व भी कई राज्यों के विधानसभा और देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर संसद में इससे घटिया नजारा देखने-सुनने को मिला है... हम बचपन से पढ़ते चले आ रहे हैं और हमें हर सरकारी जगहों पर एक सूचनापट दिखाई पड़ जाता है- " सरकारी संपत्ति आपकी अपनी संपत्ति है"... नीचे कुछ लंबी चौड़ी कानून की धाराएं और सजा लिखी होती है जिसपर शायद कभी किसी का ध्यान नहीं जाता है... अब यदि किसी आम नागरिक ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया भले हीं उसने जानबूझ कर न किया हो और मौके पर पकड़ा गया तो उसे नीचे वर्णित धाराओं के तहत सजा भुगतनी पड़ती है और जुर्माना भी भरना पड़ता है... विधानसभाओं और संसद में जो नजारा दिखा क्या वह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दायरे से बाहर है... जिस तरह से कुर्सीयों और टेबलों को उछाला गया.. तोड़-फोड़ मचाई गई... सरकारी फायलों को फाडा गया... लोकतंत्र के मंदिर को जंग का अखाड़ा बना दिया गया.. क्या यह सब कानून में  करने की इजाजत है.. यदि नहीं है तो फिर कानून के तहत ऐसे नेताओं के खिलाफ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के तहत धाराएं क्यों नहीं लगाई गई... क्यों नहीं जुर्माना वसूला गया... क्यों नहीं जेल भेजा गया... यह सब तो संपूर्ण देश ने देखा... माना कि एक जनप्रतिनिधि होने के नाते उसे कुछ विशेष सुविधाएं मिलती है लेकिन क्या उसे लोकतंत्र के मंदिर का अपमान करने का लाइसेंस मिल जाता है...

बहरहाल एक जनप्रतिनिधि को लोकतंत्र के मंदिर में ज्वलंत मुद्दा उठाना, विरोध जताना, किसी मुद्दे पर सहमत न होने पर सदन से वाकआउट करना और किसी विशेष कारणों से सदन का बहिष्कार करना भी विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है.. उससे यह हक कोई भी सतारूढ़ दल या पार्टी किसी भी रूप में नहीं छीन सकती है... लेकिन विपक्ष लगातार सदन की कार्यवाही में भाग न लेकर सिर्फ हंगामा और वाकआउट करे, विरोध के लिए कुर्सीयां उछाले, मेज को तोड़े... अध्यक्ष के उपर सरकारी कागज को फाडकर उछाले.. उनसे धक्का-मुक्की करे तो फिर उसकी भूमिका पर सवाल उठना लाजमी है... मैं यहां किसी एक दल विशेष या पार्टी या पक्ष-विपक्ष की बात नहीं कर रहा हूं.. इसे संपूर्णता के साथ देखा जाए तो यह सवाल बेहद ही लाजमी होता है कि आखिर लोकतंत्र में रहने वाले लोगों के साथ कानून समानता का व्यवहार क्यों नहीं कर पाता है... क्यों नहीं न्यायपालिका सबको न्याय दे पाता है... आखिर अपराध को अपराध की तरह न्यायपालिका क्यों नहीं देख पाती है और यदि देखती है तो फिर चुप क्यों रह जाती है...

(मेरा इरादा किसी भी व्यक्ति या संस्था या फिर न्यायपालिका का अपमान करने का नहीं है...)

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