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संपादकीय
रचनात्मकता के नाम पर भौंडापन और इतिहास से छेड़छाड क्यों....
By Deshwani | Publish Date: 13/2/2017 12:39:46 PM
रचनात्मकता के नाम पर भौंडापन और इतिहास से छेड़छाड क्यों....

 नई दिल्ली । अनिल कुमार

फिल्म समाज का आइना होता है... फिल्म के रचनाकार समाज को एक नई दिशा देने वाले केवट होते हैं... परन्तु यदि एक नाव को सही दिशा देने वाला नाविक गलत दिशा में अपनी ताकत लगाए तो संभवतः नाव कभी भी अपनी मंजील पर नहीं पहुंच सकता.. संभवतः इसकी संभावना ज्यादा हो जाएगी कि नाव बीच मझदार में फंस जाए और डूब जाए... और मुझे ऐसा लगता है कि आज की मीडिया इंडस्ट्री जिसमें बॉलीवुड सबसे बड़ा अंग है अपनी दिशा व उद्देश्य से भटक गया है... फिल्म इंडस्ट्री में जैसे स्टोरी की अकाल पड़ गई है और निर्देशक, डायरेक्टर एक ही तरीके के फिल्म निर्माण करने को मजबूर हैं...एक ही स्टोरी को सिक्वल के नाम पर परोस रहे हैं... हालांकि यहां पर भी कुछ अपवाद जरूर है... लेकिन हर साल जिस तादाद में फिल्में रिलीज होती है उसके मुकाबले ये अपवाद फिल्में कुछ समय के बाद निर्रथक लगने लगते हैं... कमाई के मामले में ये अपवाद फिल्में सारे रिकार्ड तोड़ देते हैं लेकिन अपने मूल उद्देश्य में कहीं पीछे रह जाते हैं...

अभी कुछ दिन पहले संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित नई फिल्म पद्मावती की शुटिंग शुरू हुई और विवादों में घिर गई... यह कोई पहली फिल्म नहीं है जो विवादों में रही है... (अब इस बात में कितनी सत्यता है यह एक अलग वाद-विवाद का विषय है, जिसपर अलग से बहस हो सकती है ) लेकिन जिस तरह से इतिहास और भारत की गौरवपूर्ण तथ्यों से छेडछाड कर मनोरंजन के लिए ( जिसमें सबसे ज्यादा कमाई कर सारे रिकॉर्ड तोड़ना भी शामिल है) बनाया जाए और तर्क दिया जाए कि हम लोकतंत्र में रहते हैं जहां हमें अभिव्यक्ति की आजादी है तो यह लाजमी है कि अपने पुरातन सभ्यता और गौरवपूर्ण तथ्यों से अपने को जुड़ाव महसूस करने वाले लोग इसे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते हैं... परिणाम हमसब को राजस्थान में शुटिंग के दौरान दिखा... हालांकि विरोध दर्ज कराने वाले समाज का ये तरीका गलत था... इससे पहले कई फिल्मों (बाजीराव मस्तानी, जोधा अकबर, मोहन जोदाड़ो... आदि) में इतिहास को बताने की कोशिश की गई है उससे यही प्रतीत होता है कि एक फिल्मकार अपनी रचनात्मक कला को प्रदर्शन करने के लिए गौरवपूर्ण इतिहास में भी मसाला डालने से नहीं चुकना चाहते हैं... 

पर सवाल उठता है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई.. क्या अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर फिल्मों में कुछ भी दिखाने की छूट मिल जानी चाहिए.. क्या फिल्म को ज्यादा मनोरंजक बनाने के लिए इतिहास से छेड़छाड करने की इजाजत दे देनी चाहिए... मैं इस बात से बिल्कुल सहमत हूं और मानता हूं कि एक फिल्मकार और रचनाकर को अपनी क्रिएटीव रचना को फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत करने और समाज के लोगों में जागरूकता फैलाने के साथ मनोरंजन करने का पूरा अधिकार है, उनके अधिकार को कोई भी उनसे किसी भी सूरत में नहीं छिन सकता है और न हीं किसी भी रूप में कुचलने का प्रयास कर सकता है.. परन्तु सवाल सिर्फ इतना है कि एक रचनाकार सत्यपरक घटनाओं में भी मनोरंजन का तडका लागने की जरूरत क्यों महसूस करते हैं... समाज में परिवर्तन जरूरी है... और हम सब को उस परिवर्तनशील समाज में अपनी भूमिका जरूर निभानी चाहिए... लेकिन आधुनिकता के इस दौर में परिवर्तन के नाम पर किसी को भी कुछ भी करने की इजाजत नहीं मिल जानी चाहिए... क्योंकि हम सभ्य समाज के बीच में रहते हैं.. न कि अकेले जंगलों में जीवन यापन करते हैं... और सभ्य समाज में एक साथ रहने के लिए कुछ कायदे होते हैं जिसे पूरी निष्ठा के साथ निभाने की जिम्मेदारी हमसब की होनी चाहिए... आखिर रचनात्मकता के नाम पर भौंडापन और इतिहास से छेड़छाड क्यों...  

फिल्म निर्माता या फिर फिल्मी कलाकारों द्वारा अक्सर यह बात रखी जाती है कि लोगों की मांग होती है.. लोग देखना चाहते हैं इसलिए हम दिखाते हैं और बनाते हैं... क्या यह सत्य है... एक जागरूक समाज के शिक्षित सभ्य इंसान होने के नाते वे लोग इस बात को क्यों नहीं स्वीकारते कि हम दिखाते हैं इसलिए लोग देखने को विवश है, क्योंकि उनके पास कोई ऑपशन नहीं होता है.. यह तर्क बिल्कुल नेताओं द्वारा दिये गये तर्क की तरह है.. जैसे राजनीतिक दल कहती है कि जनता उन्हें चुन कर भेजती है तभी तो वह नेता बनते हैं अब उन्हें यह बात कौन बताये कि आपने ऐसे व्यक्ति को टिकट हीं दिया है जिसपर भ्रष्टाचार और अपराधों का बौझ है अब जनता को तो वोट करना है तो उन्हीं में से किसी एक का चुनाव करेगी न... यदि आपने साफ छवि के व्यक्ति को टिकट दिया होता तो आम जनता साफ छवि के व्यक्ति को वोट करेगा... ठीक इसी प्रकार यदि फिल्म निर्माता समाज को प्रेरित करने वाले फिल्म बनाए जिसमें मनोरंजन भी हो तो लोग उसी को देखेंगे.. अब हर आम आदमी क्या घर में पिक्चर बनाकर तो नहीं देखेगी... आप उसे मुहैया कराते हैं ... जब वे इस चीज का आदि हो जाता है और डिमांड करने लगता है तो फिर आप कहते हैं कि यह समाज के लोगों का डिमांड है इसलिए हम निर्माण करते हैं। अब यह सोचने का वक्त है कि क्या समाज के बुद्धिजीवी वर्ग जो कहने को तो समाज के मार्गदर्शक कहलाते हैं... वे आने वाले पीढ़ी के लिए किस तरह के समाज की बुनियाद रखते हैं...एक आम नागरिक होने के नाते हम ऐसे फिल्मों को बढ़ावा देकर क्या अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं... क्या एक सभ्य समाज का निर्माण इस तरह से हो सकता है... एक बार चिंतन-मनन जरूर करें....

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