संपादकीय
संस्कृति, कानून और प्रदर्शन... कब तक..?
By Deshwani | Publish Date: 28/1/2017 2:53:10 PM
संस्कृति, कानून और प्रदर्शन... कब तक..?

नई दिल्ली। अनिल कुमार

भारत अनेकता में एकता की एक शानदार मिशाल है... इस पवित्र भूमि में अलग-अलग मजहब के लोग आपस में मिलजूल कर रहते हैं... यहां विभिन्न तरह की कला और संस्कृति देखने को मिलती है..  हर चार कोस में पानी और बोली (भाषा) बदलने के बाद भी सौहार्दपूर्ण से रहने वाले लोगों के पावन भूमि को हिन्दुस्तान के नाम से पहचाना जाता है। परन्तु आज एक ऐसा समय आ गया है जहां पर हजारों सालों से चली आ रही परंपरा और संस्कृति को राजनीति के हाथों गला घोंटा जा रहा है। अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए राजनीतिक दल कला और संस्कृति को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं....। हालांकि यह भी सत्य है कि कला, संस्कृति और धर्म के नाम पर समाज में कई तरह के आडंबर और भ्रम भी फैलाये जाते रहे हैं जिससे निजात पाने की सख्त आवश्यकता है परन्तु इसका कतई अर्थ यह नहीं है कि हजारों सालों से चली आ रही संस्कृति को यूं हीं खत्म कर दिया जाए... जनभावनाओं को दरकिनार कर उस पर कानून का डंडा चलाया जाए... 

अभी कुछ हीं दिन पहले तमिलनाडु में जल्लीकट्टू को लेकर उपजा विवाद है। जल्लीकट्टू तमिल समूदायों के लिए एक ऐतिहासिक सांस्कृति पर्व है जो हजारों सालों से चली आ रही है... तीन वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था... और पिछले एक महिने से लगातार तमिल समुदाय के लोग जल्लीकट्टू के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे थे.. नौबत इस हद तक बढ़ गई की पूरा तमिलनाडु सड़कों पर उतर आया... हालात बिगड़ने लगे.. लोग बेकाबु हो गये... अगजनी जैसे घटनाओं को अंजाम दिया जाने लगा... इसी बीच राज्य सरकार जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए विधानसभा में अध्यादेश ले आई तो वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपना फैसला सुरक्षित रखने का आग्रह किया जिसे मान लिया गया और फिर जल्लीकट्टू के आयोजन को हरी झंडी मिल गई।

जनभावनाओं के आगे झुकी सरकार के रवैये को देखकर अब देश भर में तमाम तरह के सांस्कृति कार्यक्रमों के आयोजन पर लगे प्रतिबंध को हटाने की आवाजें उठने लगी है। कर्नाटक के पारंपरिक खेल कंबाला को बचाने के लिए अब लोग सड़कों पर उतर आये हैं... कंबाला एक ऐसा खेल हैं जिसमें  भैंसों को नकेल डालकर कीचड़ भरे लंबे ट्रैक पर दौड़ाया जाता है। प्रदर्शन की शरुआत मंगलूरु से हुई, जहां स्कूल-कॉलेजों के छात्र मानव शृंखला बनाकर इस खेल से प्रतिबंध हटाने की मांग करने लगे। इनका तर्क है कि कंबाला में न तो जल्लीकट्टू की तरह हिंसा है, न कभी किसी हादसे की खबर कहीं से आई। जब तमिलनाडु सरकार अध्यादेश लाकर जल्लीकट्टू को मान्यता दे सकती है, तो कर्नाटक सरकार क्यों नहीं? वे इसे क्षेत्रीय सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला मानते हैं। तर्क दिया जा रहा है कि जब भैंसों के मालिक खुद उनकी इतनी चिंता करते हैं, तो किसी तीसरे को इसमें क्यों पड़ना चाहिए?  

आपको यह बात बता दें कि इसमें कोई बड़ी बात नहीं कि यह प्रतिरोध भी गति पकड़े और कल को एक नई तरह की समस्या का कारण बने। तमिलनाडु के जल्लीकट्टू आंदोलन ने उस अध्याय को जरूर खोल दिया है, जिसे बंद मान लिया गया था। अब आगे डर इस बात का है कि ऐसी मांगें अब देश के अन्य प्रदेशों से भी उठने लगेंगी। इससे पहले दही हांडी को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी कर रखा है और कई तरह की पाबंदी भी लगा रखी है जिसे लेकर लोगों में रोष है और अब वे अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर सकते हैं तो वहीं महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर बैलगाड़ी रेस फिर से शुरू करने पर शिवसेना पहले से ही राज्य सरकार पर दबाव बनाए हुए है और लंबे प्रतिरोध की भूमिका तैयार कर रही है। कोई बड़ी बात नहीं कि असम को बीहू पर्व पर बुलबुल की लड़ाई की याद सताने लगे, जिसमें लुप्तप्राय बुलबुल को तैयार करके तब तक लड़ाया जाता था, जब तक कि लड़ रहे दो बुलबुलों में से एक की मौत नहीं हो जाती थी। आंध्र और झारखंड भी कल मुर्गों की कुख्यात लड़ाई को सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान के रूप में रेखांकित करने लगे, जिसमें बड़ी-बड़ी रकम, कई बार तो सब कुछ दांव पर लग जाता है। क्रूरता की हद यह है कि इसमें मुर्गों के डैनों के नीचे व पैरों में ब्लेड बांध दिए जाते हैं, ताकि खेल ज्यादा से ज्यादा रक्तरंजित दिखे और रोमांच बढ़े। 

सुप्रीम कोर्ट ने पशुओं के साथ हो रही क्रुरता और लगातार इन खेलों से घायल होकर लोगों के मरने की घटनाएं सामने आने के बाद से इन सांस्कृतिक खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसके बाद से लोग लगातार इसके आयोजन को लेकर समय-समय पर प्रदर्शन करते आ रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु में सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने की आवाज सुनाई दी थी, परन्तु कर्नाटक में यह सोची-समझी राजनीति के रूप में दिख रही है। वहां अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं। सुप्रीम कोर्ट शीर्ष अदालत है। देश में किसी भी प्रकार की हिंसा चाहे वह पशुओं के साथ हीं क्यों न हो उसके संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट प्रतिबद्ध है... हालांकि आम जन को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि खेल के नाम पर किसी पशु या पक्षी के साथ क्रुर व्यवहार करना किसी भी रूप में तर्क संगत नहीं हो सकता है। देश के आम जन और कानून व्यवस्था के बीच तर्कपूर्ण बातचीत के बाद ऐसा कोई विकल्प तलाशना चाहिए जिससे लोगों की भावना भी भंग न हो और जानवरों के साथ क्रूरता जैसी घटना भी न घटे.... सदियों से चली आ रही हमारी परंपरा और संस्कृति यूं हीं खुशियों के साथ लोग मनाते रहे जिससे हमारे देश की पहचान होती है...  आखिर कब तक लोग वर्षों से चली आ रही परंपरा और संस्कृति को बचाने के लिए सड़क पर प्रदर्शन करते रहेंगे और कब तक कानून सिर्फ इन्हें रोकने के लिए डंडा इस्तेमाल करती रहेगी...

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