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संपादकीय
जाते-जाते प्रणव दा ने कही मन की बात -सियाराम पांडेय ‘शांत’
By Deshwani | Publish Date: 24/7/2017 5:58:33 PM
जाते-जाते प्रणव दा ने कही मन की बात -सियाराम पांडेय ‘शांत’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेडियो पर अपने मन की बात अक्सर कह लेते हैं लेकिन राष्ट्रपति के पास एक या दो अवसर ही ऐसे होते हैं जब वह अपने देश के लोगों को संबोधित करते हैं। उसमें भी उनके मन की बात कम, सरकार का दृष्टिकोण ज्यादा होता है लेकिन जब राष्ट्रपति की विदाई का भावुक क्षण हो तो वह अपने मन की बात कहने के लिए स्वतंत्र होते हैं। जो बातें हमेशा उसके मानस में उमड़ती-धुमड़ती रहीं,वह भी भावनाओं का प्रबल वेग पाकर सहज ही जुबां पर आ जाती हैं। संसद में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा। ऐसा नहीं कि संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहने वाले वे पहले शख्स हैं। इससे पहले भी संसद को अनेक बार लोकतंत्र का मंदिर कहा जा चुका है। यह अलग बात है कि संसद को मंदिर मानने और तदनुरूप आचरण के मामले में माननीयों के आचरण पर अक्सर सवाल उठते रहे। लेकिन, निवर्तमान होते राष्ट्रपति के तौर पर प्रणव मुखर्जी का यह अभिकथन कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। खासकर उस परिवेश में जब संसद विमर्श की बजाय, विवाद का गढ़ बन गई है। जहां विरोध केवल विरोध के लिए होने लगा है। मंदिर तो पूजा की जगह होती है। वहां तो तन और मन दोनों की पवित्रता वांछित होती है। वहां जाने वाला हर व्यक्ति भक्त होता है। दास होता है। आजकल लोकतंत्र के मंदिर में क्या कुछ नहीं हो रहा। संसद में गतिरोध को लेकर उनकी चिंता उन्हीें के शब्दों में जाहिर हुई है। हालांकि पहले भी वे इस मुद्दे पर मुखर टिप्पणी कर चुके हैं लेकिन संसद में दिया गया उनका विदाई भाषण किसी मील के पत्थर से कम नहीं है। उन्होंने कहा है कि संसद में गतिरोध से सरकार ही नहीं, विपक्ष को भी नुकसान है। मंदिर विरोध और हंगामे की नहीं, आत्मचिंतन की जगह है। संसद में भी कुछ इसी तरह के व्यवहार की हर सांसद से अपेक्षा की जाती है। प्रणव मुखर्जी ने संविधान को समस्त भारतवासियों की आशाओं का दस्तावेज माना है। जो इतनी गहराई में जाकर सोचता है, वही भारत को सही मायने में जान पाता है। प्रणव मुखर्जी इस देश के सुधी चिंतक हैं जिन्होंने देश के प्रति अपनी प्रेम भावना पर कभी दलगत राजनीति को हावी नहीं होने दिया। उम्मीद की जा सकती है कि प्रणव मुखर्जी जैसे गंभीर राजनीतिक चिंतक की इस बात को गंभीरता से लिया जाएगा और अब संसद के समय की बर्बादी नहीं होगी।
विकथ्य है कि प्रणव मुखर्जी को राजनीति में आगे बढ़ाने का काम इंदिरा गांधी ने किया था। वे उनकी निडरता के कायल थे। जिस तरह इंदिरा गांधी की प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया मानती थी, उसी तरह नरेंद्र मोदी की प्रतिभा का लोहा आज पूरी दुनिया मानती है। प्रणव मुखर्जी ने अगर खुद को नरेंद्र मोदी की ऊर्जा का मुरीद बताया है तो उनमें वे इंदिरा गांधी की तरह ही देश के लिए सोचने वाला व्यक्तित्व देखते हैं। नरेंद्र मोदी जो कुछ भी करते हैं, विलक्षण ढंग से करते हैं। वे पहले नेता है जिन्होंने संसद में साष्टांग लोट लगाई थी। प्रणव मुखर्जी ने मोदी में देश के लिए इंदिरा गांधी की तरह की दूरदृष्टि देखी है। हीरे को जौहरी ही पहचानता है। यह बात एक बार पुनश्च प्रमाणित हो गई है। जाते-जाते प्रणव दा की कोशिश भाजपा और कांग्रेस के बीच की बहुत सारी गलतफहमियों को दूर करने की भी रही है। कांग्रेस के लोग जहां फिल्म ‘इंदु सरकार’ के निर्माण के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिमाग बता रहे हैं और उनकी आलोचना का एक भी अवसर नहीं छोड़ रहे, वहीं राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी को बेहद ऊर्जावान करार देकर कांग्रेस ही नहीं, पूरे विपक्ष की जुबान पर ताला लगा दिया है। उन्होंने केवल खुद को मोदी की ऊर्जा का मुरीद बताया बल्कि उनके साथ की बहुत अच्छी यादों को अपने साथ लेकर जाने की भी बात कही। मतलब जाते-जाते भी वे कांग्रेस और भाजपा के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करते नजर आए।

आपातकाल पर बनी फिल्म ‘ इंदु सरकार’ को लेकर संप्रति हर कांग्रेसी उत्तेजित है। इस फिल्म का प्रसारण रोकने की धमकी दी जा रही है। फिल्म के निदेशक मधुर भंडारकर के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं, प्रणव मुखर्जी ने इस मुद्दे पर छोटे से वाकये का जिक्र कर आपातकाल पर चल रही बहस को एक तरह से विराम देने की कोशिश की है। अपने विदाई भाषण में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सराहना की। उन्हें निडर नेता बताया। संसद में सांसदों से कहा कि आपातकाल के बाद हम पहली बार साथ लंदन गए थे। वहां की मीडिया ने पूछा कि आपातकाल से आपको क्या मिला? उन्होंने कहा कि हमने उन 21 महीने में देश के सभी तबकों को एक साथ किया। कांग्रेसियों के लिए इससे अधिक राहत की बात और क्या हो सकती है? उनके इस भाषण के बाद कांग्रेसी अब खम ठोंकर कह सकते हैं कि देश के विभिन्न तबकों को एक करने के लिए आपातकाल लगाना तत्कालीन जरूरत थी। भले ही विपक्ष इससे संतुष्ट हो या न हो।
बंगाल के एक छोटे गांव से निकलकर राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने वाले प्रणव दा ने एक शिक्षक और पत्रकार के रूप में अपने करिअर को शुरुआत की थी। वे जहां भी रहे, अपने सार्थक कर्म की बदौलत उन्होंने सेवा के उच्च मानदंड स्थापित किए। संसदीय परंपराओं को मजबूती दी। लोकतांत्रिक व्यवस्था को सदृढ़ बननाने में अहम भूमिका निभाई। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होने के नाते ही वे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में कामयाब रहे। अपने उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों की बिना पर ही वे देश की जनता के दिलों पर लंबे समय तक राज करते रहे। 22 साल तक मंत्री रहे और 28 साल तक कांग्रेस की कार्य समिति के सदस्य लेकिन कभी भी उनके दामन पर कोई दाग नहीं लगा।

मुहावरे जिंदगी को दिशा देते हैं। वे जिंदगी को नया अर्थ देते हैं। हमारे पूर्वजों ने अपने वर्षों के अनुभवों की बिना पर मुहावरे गढ़े हैं। उन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ‘रात गई, बात गई’ भी कुछ इसी तरह का मुहावरा है। ‘बीति ताहि बिसार दे आगे की सुध लेहु’ के पीछे भी बड़ा जीवन दर्शन है लेकिन सज्जनों के लिए अतीत को भूलना इतना आसान नहीं होता। देश के तेरहवें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपने विदाई समारोह में जो कुछ भी कहा, उसका निहितार्थ तो यही है। उन्होंने जाते-जाते भी देश की चिंता की। संसद में विरोध के नाम पर होने वाले समय की बर्बादी की चिंता की। भारतीयों द्वारा एक ही संविधान को मानने को देश की खूबसूरती कहा। जो लोग संविधान की भावना के विपरीत जाकर आचरण करते हैं। उनके लिए प्रणव दा का बयान एक नसीहत है। देश रहेगा तभी तो राजनीति होगी। इसलिए राष्ट्रीय हितों की प्राथमिकता पर ही उन्होंने हमेशा जोर दिया और आज भी उनका इशारा इसी ओर था। अतीत को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए लेकिन अतीत की गलतियों से सबक जरूर लेना चाहिए। आचार्य चाणक्य ने कहा था कि दुष्ट और कांटे की प्रवृत्ति एक जैसी होती है, उनसे निपटने का दो ही तरीका है या तो उनसे बचकर निकल लिया जाए या उनका मुंह तोड़ दिया जाए। प्रणव मुखर्जी भी इसी राय के रहे हैं। आतंकवादियों के खिलाफ वे हमेशा रहे। उनके लिए देश हित ही हमेशा पहले रहा। यह बात दया याचिकाओं पर फैसला करते वक्त भी नजर आया। बतौर राष्ट्रपति उन्होंने 32 दया याचिकाओं पर फैसला किया, इनमें से कुछ 2000 से अटकी थीं। इनमें से अफजल गुरू, अजमल कसाब, याकूब मेमन समेत 28 लोगों की दया याचिकाएं उन्होंने खारिज भी कीं। कसाब को 2012, अफजल गुरू को 2013 और याकूब मेमन को 2015 में फांसी दी गई थी।

संसद में लोकसभा और राज्यसभा सांसद के रूप में बिताए गए उनके बेदाग कार्यकाल जनप्रतिनिधियों के लिए किसी नजीर से कम नहीं है। उनका जीवन एक खुली किताब है जिसे जहां से भी पढ़ा जाए, सुधरने और आगे बढ़ने की, कुछ अलहदा कर गुजरने की प्रेरणा मिलती है। वे मानते हैं कि उन्हें एक इंसान के रूप में निखारने में संसद की बड़ी भूमिका रही है। सज्जनों का बिछुड़ना भी अतीव त्रासद होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने इस बात को कुछ इन शब्दों में व्यक्त किया है। ‘ मिलत एक दारुन दुख देंही, बिछुरत एक प्रान हर लेंही।’ देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को जब संसद में विदाई दी जा रही थीं तो हर आंखें नम थीं। वे खुद भी बहुत भावुक थे। वे घर जाकर बैठने वालों में नहीं हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम की तरह वे भी कुछ खास करेंगे। उनकी योजना अपनी आत्मकथा लिखने की तो है ही, संभवतः वे कलाम की तरह ही लोकशिक्षण का मौका संभालेंगे। शिक्षक तो शिक्षक ही होता है। उनकी प्रेरणाएं हमेशा इस देश का मार्गदर्शन करेंगी, इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता।

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