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संपादकीय
क्या है ‘कश्मीर समस्या’ का समाधान?: कृष्ण प्रभाकर
By Deshwani | Publish Date: 14/7/2017 1:55:48 PM
क्या है ‘कश्मीर समस्या’ का समाधान?: कृष्ण प्रभाकर

यदि आप से पूछा जाय कि कश्मीर की समस्या आखिर है क्या? तो आप क्या उत्तर देंगे? आपके संभावित उत्तर होंगे- वहां का आतंकवाद, वहां पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद तथा कराई जा रही घुसपैठ, धारा 370 और वहां के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय का भारत विरोधी कथित आचरण... आदि-आदि। फिर आपसे यदि यह कहा जाय कि इनमें से कोई भी कश्मीर की मूल समस्या नहीं। ये तो इस मूल समस्या की शाखाएं मात्र हैं तो?
सच भी यही है। वर्तमान ही नहीं बीते 70 वर्षों से हमारे समक्ष आनेवाला कश्मीर का समस्या-समुच्चय कश्मीर की मूल समस्या से उपजी समस्याओं की शाखा-प्रशाखा ही रहा है। दुर्भाय यह कि हमारी आज तक की सरकारें, राजनेता, बुद्धिजीवी आदि सभी मूल समस्या से हमारा ध्यान हटाने के लिए साशय इन शाखा-प्रशाखाओं को ही वास्तविक समस्या के रूप में प्रदर्शित कर इनके कथित उपचार का प्रयास करते रहे हैं।
दरअसल भारत सरकार की कश्मीर विषयक नीति ‘दान की गयी सम्पत्ति पर रहनेवाली विरक्तता’ से अधिक कभी रही ही नहीं है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ‘एक्सीडेंटल इंडियन’ व ‘एक्सीडेंटल हिंदू’ होने की वजह से चली इस नीति में तब से लेकर आज तक भारत सरकार ने अपने विधिक अधिकार व अपनी सम्प्रभुतावाले किन्तु पाकिस्तान द्वारा वलात् अधिगृहीत किये क्षेत्र के नागरिकों के प्रति अपने कर्तव्यों के लिए जहां ‘आंसू बहाने’ के अतरिक्त और कुछ भी नहीं किया है, वहीं उनकी इस नीति के विरोधी डा0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर आज के भाजपा नेताओं तक किसी ने भी अनुच्छेद 370 से आगे सोचने की जहमत ही नहीं उठाई है।
लंदन में पढ़नेवाले एक छात्र रहमत अली की कल्पना से जन्मे, अल्लामा इकबाल सरीखे साहित्यकार व मुहम्मद अली जिन्ना जैसे राजनेताओं के समर्थन से पल्लवित हुए तथा मुस्लिम लीग के डाइरेक्ट एक्शन के बाद अंगरेजों के सहयोग व समर्थन से अस्तित्व में आये ‘पाकिस्तान’ का स्वरूप वह नहीं था जो कल्पित, व प्रचारित-प्रसारित किया गया था।
भारत की प्रत्येक बर्बादी का दोष अंगरेजों के माथे मढ़नेवाले लोगों को यह पढ़कर आश्चर्य ही होगा कि कश्मीर का पाकिस्तान में न जाना तथा अंततः भारत का भूभाग बनना 1935 में ब्रिटिश संसद द्वारा पास किये इंडिया इंडिपेंडेंट एक्ट का परिणाम है। इस एक्ट के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने भारत को स्वाधीन करने से पूर्व उन 562 राज्यों की संप्रभुता उन्हें वापस की जो किसी संधि के अधीन उनके अधीन थे। इसके उपरान्त ही उन्होंने अपने अधिकारवाले भूभाग का तत्समय के भारत में रह रही हिन्दू व मुस्लिम जनसंख्या के आधार पर विभाजन किया। संभव है कि इस विभाजन के पीछे भी अंगरेजों के स्वार्थी उद्देश्य रहे हों। किन्तु यह भी सत्य है कि मुस्लिम लीग के डाइरेक्ट एक्शन के कारण गृहयुद्ध की स्थिति में पहुंच चुके तत्कालीन भारत की साम्प्रदायिक समस्या का यही एकमेव हल भी था।
इस विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर का भूभाग ब्रिटिश साम्राज्य का भूभाग न होने के कारण विभाजित नहीं किया गया। किन्तु इसने पाकिस्तान की उस कल्पना को ही बेमानी कर दिया जो इस राष्ट्र के अस्तित्व का प्रमुख आधार थी। अपने एकाकी सिद्धान्तों व चिंतन में लीन हो तत्कालीन समस्याओं से अनभिज्ञ हमारे नेतृत्व ने अनिच्छापूर्वक इस विभाजन को स्वीकारा किन्तु अपनी आदर्शवादिता के कारण विभाजन के सभी अवयव प्रयासपूर्वक भारत में ही रहने दिए। कल्पना करें कि साम्प्रदायिकता की समस्या से जूझ रहे वर्तमान भारत की उस समय क्या हालत हो जाएगी जब इसमें पाकिस्तान व बांग्लादेश की जनसंख्या को और सम्मिलित कर दिया जाय?
562 स्वाधीन राज्यों के अस्तित्व के उपरान्त तथा ब्रिटेन द्वारा भारत को छोड़ने के निर्णय के बाद तत्कालीन भारतीय वायसराय लार्ड माउण्टबेटन द्वारा इन राज्यों के नरेशों को दिए ‘किसी भी संघ में सम्मिलित होने के परामर्श’ के उपरान्त इन राज्यों के सम्मुख दो ही मार्ग थे। या तो वह भारत या पाकिस्तान संघ में अपना विलय करें, अथवा अपना स्वाधीन अस्तित्व बनाए रखें।
इसी के चलते पाकिस्तान के गवर्नर जनरल बने जिन्ना ने पहले तो तत्कालीन कश्मीर नरेश महाराजा हरीसिंह को भांति-भांति के प्रलोभन दे उन्हें पाकिस्तान के पक्ष में अपने राज्य का विलय करने के दबाव बनाए। इसमें असफल रहने पर कबायली आक्रमण के नाम पर अपनी सेना भेज इस पर कब्जे के प्रयास किये। भारतीय पक्ष ने देरी से ही सही, किन्तु समय रहते कार्यवाही कर श्रीनगर सहित भारतीय अधिकारवाले वर्तमान कश्मीर का भूभाग पाकिस्तान में जाने से बचा लिया किन्तु कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरीसिंह द्वारा बिना किसी शर्त भारत के पक्ष में किये गये विलय के बावजूद तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दखलंदाजी के चलते पूरा कश्मीर पाकिस्तानी कब्जे से मुक्त कराने से पहले की सैन्य कार्यवाही रोक दी गयी। परिणाम, गिलगिट, पीरपंजाल सहित महाराजा के अधिकारक्षेत्रवाला कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में ही बना रहा। बस यहीं से भारत सरकार के मतिभ्रम तथा पाकिस्तान के येन-केन कश्मीर को अपना भूभाग बनाने के षड्यन्त्र के चलते कश्मीर भारत की नासूर स्तर की समस्या बन गया।
चैम्बर आफ प्रिंसेज के अधिवेशन में तत्कालीन वायसराय लार्ड माउण्टबेटन द्वारा दिए किसी बड़े राज्य में विलय के परामर्श के बाद संवैधानिक रूप से अस्तित्व में आए ‘विलय पत्र’ में मात्र दो पक्ष हैं- एक इस विलय पत्र को प्रस्तुत करनेवाला तथा दूसरा इसे स्वीकार करनेवाला।
विधिक रूप से इसे ‘अस्वीकारना’, ‘सशर्त स्वीकारना’, ‘या तीसरे पक्ष की दखलंजादी’ और ‘कथित जनमत संग्रह जैसी मांग’ आदि सभी के सभी अवैध हैं। भले ही कुछ देर से सही, कश्मीर नरेश महाराजा हरीसिंह द्वारा इस विलय पत्र को अपनी संप्रभुता के समर्पण के लिए उसी भांति प्रस्तुत किया गया है, जैसे कि अन्य संप्रभु राज्यों के अधिपतियों द्वारा अपनी संप्रभुता के लिए भारत या पाकिस्तान संघ को विलयपत्र प्रस्तुत किये गये हैं। स्वाधीन भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउण्टबेटन द्वारा इसे उसी भांति स्वीकारा गया है जैसे उन्होंने अन्य विलय पत्र स्वीकारे हैं।
भारत संघ द्वारा इस विलय पत्र की स्वीकृति के उपरान्त (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगिट, पीरपंजाल आदि क्षेत्रों सहित) महाराज हरीसिंह की संप्रभुता वाले सम्पूर्ण क्षेत्र का एकमात्र स्वामी अब भारत संघ है। इसमें बाधाएं लगाना, दूसरे पक्ष द्वारा इस के कतिपय भूभागों पर बलात अधिपत्य जमाना, जनमत संग्रह जैसी मांग या इस आंतरिक हो गये विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ ले जाना आदि- सभी के सभी विषय भारत राष्ट्र की संप्रभुता के साथ विश्वासघात हैं। देश के दुर्भाग्य से इनमें से कुछ कार्य विधि के अच्छे जानकार होते हुए भी देश के प्रथम प्रधानमंत्री द्वारा किये गये हैं।
आज भी सम्पूर्ण पाक अधिकृत कश्मीरी क्षेत्र विधिक रूप से भारत का भूभाग है किन्तु इसे अपने नक्शे में दर्शाने तथा किसी के द्वारा न दर्शाए जाने पर घड़ियाली आंसूं बहाकर शोरगुल मचाने से अधिक भारत सरकार ने कुछ भी नहीं किया है।
स्वाधीनता के उपरान्त पाकिस्तान से लड़े गये चार युद्धों में स्वाधीन बांग्लादेश का निर्माण तो युद्ध का कारण रहा है किन्तु अपने ही क्षेत्र की स्वाधीनता के प्रश्न पर सैन्य कार्यवाही का प्रश्न तो दूर रहा, हम ढंग से विरोध व्यक्त करने में भी असफल रहे हैं। जहां तक बाजपेयी सरकार में लड़े कारगिल युद्ध का प्रश्न है, तो इसका कारण भी अपने क्षेत्र की पुनर्वापसी न होकर अपने शेष क्षेत्र को पाक अजगर के मुंह में जाने से रोकना भर रहा है।
भारत में अनुच्छेद 370 पर हाय-तौबा मचानेवाले दल भी महाराजा हरीसिंह के क्षेत्र तथा उसके बाद भारत का अंग बने पाकिस्तान द्वारा अधिकृत क्षेत्र में उसके द्वारा सुनियोजित रूप से कर दिये गये जनसंख्या तथा भूभाग के स्वामित्व के परिवर्तन के प्रश्न पर कभी भी मुखर नहीं रहे हैं। अपने विधिक किन्तु पाक के बलात अधिकार में जीने को विवश नागरिकों की कठिनाइयों के हल तलाशने में संप्रभु भारत सरकार ने कब-कब प्रयत्न किये हैं, स्मरण नहीं आता।
भाजपा के नेता तथा अन्य राष्ट्रवादी लोग कश्मीर में किसी भारतीय द्वारा एक इंच भूमि न खरीद पाने के नियमों पर खासे हाथ-पैर फेंकते रहे हैं किन्तु कभी भी इस धारा को अपने अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करने के विषय में सोच सकने तक में असफल रहे हैं।
जबकि विलयपत्र की स्वीकृति के उपरान्त का विधिक सत्य यही है कि महाराजा हरीसिंह के उस सम्पूर्ण भूभाग में आज की तिथि में वही विधान विधिसम्मत है जिसे विलय स्वीकारने वाले भारत संघ की सहमति से उस भूभाग पर लागू किया गया है। ऐसे में जबकि (केवल शेष भारतीय नहीं) किसी भी ‘गैर कश्मीरी को उस क्षेत्र में भूमि क्रय करने का अधिकार नहीं है तो पाकिस्तान द्वारा सुनियोजित रूप से किये गये बदलाव भी अवैध श्रेणी के अंतर्गत ही आते हैं।
2014 में केन्द्र में आई मोदी के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार तथा इसके सहयोग से कश्मीर में सत्तारूढ़ कश्मीर सरकार भी आतंकवाद आदि से भले जूझती दिखाई देती हो, कश्मीर के मूल प्रश्न पर भी कोई नीति रखती है- ऐसा नहीं दिखता। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी दिल्ली लालकिले से किये अपने संबोधन में बलोचिस्तान व गुलाम कश्मीर पर भाषण दे मामले को गरमाने के अलावा कुछ खास करते नहीं दिखते । सच तो यह है कि अपने ही भूभाग की वापसी के लिए कभी भी आक्रामक रूप से पहल न करनेवाली भारत सरकार से, वहां के हिन्दू बनाम मुस्लिम जैसे प्रश्नों पर उलझे राजनेताओं से व नीति निर्माताओं से, कश्मीर की कथित आजादी की मांग करनेवालों से तथा कश्मीर के प्रश्न पर भारतीय मुसलमानों की नाराजगी जैसे प्रश्न विचार भारत के राष्ट्रवादी मुसलमानों की राष्ट्रीयता पर प्रश्न चिह्न लगाने वाले लोगों से कभी भी यह आशा रखना ही ‘बेमानी’ है कि वे अपने राजनीति हित-लाभ से परे हट कभी कश्मीर की समस्या पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी विचार करेंगे।
 

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