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“स्वस्थ्य बिहार, समृद्ध बिहार” कार्यक्रम के तहत एक दिवसीय कार्यशाला का हुआ आयोजन
By Deshwani | Publish Date: 29/8/2019 11:18:47 PM
“स्वस्थ्य बिहार, समृद्ध बिहार” कार्यक्रम के तहत एक दिवसीय कार्यशाला का हुआ आयोजन

पटना। “स्वस्थ्य बिहार, समृद्ध बिहार”-बिहार में स्वास्थ्य प्रणाली को बेहतर बनाने एवं स्वास्थ्य के परिणामों में सुधार की यात्रा की कहानी साझा करने के लिए स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार द्वारा  एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य, भारत सरकार के प्रतिनिधि, बिहार सरकार के स्वास्थ्य पदाधिकारी, एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि के साथ अन्य साझेदारों ने अपने विचार प्रकट किये. इस दौरान मातृ, शिशु, प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य, संक्रामक रोग नियंत्रण जैसे कालाजार एवं टीबी में आये उतरोतर सुधार को साझा किया गया, साथ ही इनमें आवश्यक सुधार की जरुरत पर बल दिया गया. 

 
 
इस कार्यशाला की शुरुआत माननीय स्वास्थ्य मंत्री, बिहार सरकार श्री मंगल पाण्डेय, डॉ विनोद पॉल,   सदस्य, नीति आयोग, डॉ आलोक कुमार, सलाहकार, नीति आयोग, बिहार सरकार, डॉ. सुभाष शर्मा, विकास आयुक्त, बिहार सरकार, श्री संजय कुमार, प्रधान सचिव, स्वास्थ्य विभाग के अलावा श्री हरि मेनन, राष्ट्रीय निदेशक, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, डॉ. गैरी डार्मस्टाड, एसोसिएट डीन, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसए ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. 
 
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति, बिहार श्री मनोज कुमार ने कहा सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने की देश की प्रतिबद्धता में बिहार भी माकूल हिस्सेदारी के लिए तैयार है. यह कार्यशाला स्वास्थ्य प्रक्षेत्र में आये बदलाव को साझा करने के साथ उसपर मंथन का अवसर प्रदान करेगा. 
 
 
श्री संजय कुमार, प्रधान सचिव, स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार ने विगत कुछ वर्षों में बिहार की स्वास्थ्य यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी. विगत सालों में राज्य की शिशु मृत्यु दर में काफी गिरावट आई है। एस आर एस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2005 में शिशु मृत्यु दर 61 था, जो घटकर 2019 में 35 हो गयी है. मातृ मृत्यु अनुपात 2004-06 में 312 था, जो घटकर 2014-16 में 165 हो गई. यह राष्ट्रीय स्तर पर हुए बदलाव की तुलना में अधिक है. वर्ष 2001 में राष्ट्रीय मातृ मृत्यु दर 301 था, जो घटकर वर्ष 2018 में 130 हो गई. 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर वर्ष 2008 में 75 से घटकर 2017 में 41 हो गया.  इस बदलाव के साथ बिहार राष्ट्रीय औसत के करीब पहुँच रहा है. नवजात मृत्यु दर 32.2 से घटकर 24.7 रह गया, इसमें भी सबसे अधिक उपलब्धि 0-2 दिन के अन्दर होने वाले मौतों को कम करने में हुई है. 
राज्य में कालाजार प्रभावित प्रखंडों की संख्या में काफी कमी आई है. वर्ष 2013 में कुल 31 जिले कालाजार प्रभावित थे जो वर्ष 2018 में घटकर 5 हो गया है. इसके साथ ही लैंगिक असमानता में भी कमी आई है. बिहार में 34 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं, जबकि राष्ट्रीय आंकड़ा 22 प्रतिशत है. सामाजिक सेवाओं पर खर्च 2004-05 में 493 रूपये से बढ़कर 2017-18 में 4850 हो गया. सुदूर क्षेत्रों में भी मोबाइल उपयोग करने वाले की संख्या में इजाफा हुआ है. वर्ष 2004-05 में यह आंकड़ा 64 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 94 प्रतिशत हो गया. स्वास्थ्य मानकों में निरंतर सुधार करते हुए बिहार देश के औसत क़रीब पहुँच गया है.  
 
 
टीकाकरण आच्छादन में बढ़त देखने को मिल रही है फलतः वर्ष 2005 में जो 20 प्रतिशत था से बढ़कर वर्तमान में 85 प्रतिशत हो गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर चिकित्सीय सुविधा बहाल करने के लिए नए चिकित्सकों एवं पैरामेडिकल कर्मियों की नियुक्ति पर विशेष बल दिया जा रहा है. 
इस अवसर पर माननीय स्वास्थ्य मंत्री, बिहार सरकार श्री मंगल पाण्डेय ने कहा बिहार में यह पहला अवसर है जब एक साथ नीति निर्माता एवं राज्य तथा केंद्र विशेषज्ञ एक साथ बैठकर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने की दिशा में परिचर्चा कर रहे हैं. वर्ष 2005 से लेकर अभी तक बिहार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर बदलाव हुए हैं. वर्ष 2005 में प्रति माह प्रति प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर औसतन मरीजों की संख्या जहाँ केवल 39 थी, से बढ़कर वर्तमान में 10500 हो गया है. उन्होंने इस बदलाव में बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन एवं केयर द्वारा वर्ष 2011 से प्रदान कराये जा रहे तकनीकी सहयोग की भूमिका की सराहना की. साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल करने में आगे भी उनके सहयोग करते रहने की अपील की. 
 
 
डॉ विनोद पॉल, सदस्य, नीति आयोग ने विगत कुछ वर्षों में राज्य के स्वास्थ्य सेवाओं में आये सुधार की प्रशंसा करते हुए बताया कि अधूरे कार्यों में तेजी लाकर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवता में सुधार लाया जा सकता है. उन्होंने नवजात शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए गृह आधारित शिशु देखभाल पर बल दिया. इसके लिए प्रत्येक शिशुओं की आशाओं द्वारा 4 बार गृह भ्रमण करने की अनिवार्यता पर बल दिया. आयुष्मान भारत योजना के तहत बीमार नवजातों की बेहतर देखभाल प्रदान करने तथा हेल्थ एवं वेलनेस सेंटर के प्रसार पर जोर दिया. इस साल सितम्बर माह को पोषण माह के रूप में मनाया जाने के लिए अनुपूरक आहार को थीम बनाया गया है. छ माह से लेकर 2 साल तक के बच्चों में अनुपूरक आहार की दर को 18 प्रतिशत से बढाकर 36 प्रतिशत करने में पोषण अभियान उपयोगी साबित होगा. 
 
 
बिल एवं मेलिंडा गेटस फाउंडेशन, भारत के राष्ट्रीय प्रमुख श्री हरि मेनन ने कहा कि बिहार सरकार ने फाउंडेशन के तकनीकी सहयोग को कुछ पायलट तक सीमित न रखकर पुरे राज्य में क्रियान्वित करने की बात कही. बिहार की स्वास्थ्य उपलब्धियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बहुत सारे स्वास्थ्य मानकों में सुधार आया है. 
 
 
उन्होंने बताया कि जहाँ लोक स्वास्थ्य सेवा एवं एम्बुलेंस सेवा में दो गुनी वृद्धि हुई है वहीँ राज्य का प्रतिरक्षण दर सार्वभौमिक प्रतिरक्षण के करीब पहुँच चूका है. जीविका के मंच का इस्तेमाल कर एक ओर जहाँ वर्षों से चली आ रही जेंडर से जुड़ी चुनौतियों का समाधान कर रहे हैं दूसरी ओर इस मंच के माध्यम से स्वास्थ्य एवं पोषण के नए आयाम गढ़ रहे हैं. 05 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर एवं नवजात शिशु मृत्यु दर में कमी लाकर बिहार सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपनी अहम् भूमिका अदा कर सकता है. 
डॉ. शुभाष शर्मा, विकास आयुक्त, बिहार सरकार ने मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाने पर बल दिया. डॉ. गैरी डार्मस्टाड, एसोसिएट डीन, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी, यूएसए ने बिहार सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं को दिए जाने वाले फाउंडेशन के सहयोग को जारी रखने की बात कही. 
 
 
इस मौके पर विगत वर्षों की सकारात्मक उपलब्धियों पर आधारित विभिन्न कार्यक्रमों से संबंधित पोस्टर का प्रदर्शन, विभिन्न स्टाल का आयोजन, ऑडियो एवं वीडियो का प्रसारण किया गया.
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