संपादकीय
हज हाउस के भगवा रंग पर बवाल या सत्ताहीनता का मलाल
By Deshwani | Publish Date: 6/1/2018 3:12:57 PM
हज हाउस के भगवा रंग पर बवाल या सत्ताहीनता का मलाल

सियाराम पांडेय ‘शांत’

रंग आंखों को रोचक भी लगते हैं और चुभते भी हैं। पूरा मामला रंगों के काॅम्बिनेशन का है। रंग के साथ ढंग का जुड़ाव हो जाए तो उससे स्वभाव का बोध होता है। रंग सोच-समझ का विषय है। रंगों की समझ सबको नहीं होती लेकिन जिसे भी होती है, गजब की होती है। रंग को लेकर साहित्यकारों ने बहुत कुछ लिखा है। आयुर्विज्ञानियों ने रंग चिकित्सा का ही प्रावधान कर दिया है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति में रंग थेरेपी तो मूलतः मौसम के प्रभावों से बचने का विज्ञान ही है। कुछ शहरों और स्थानों के नाम ही रंगों के नाम पर रखे गए हैं। रंगों का अपना मनोविज्ञान है। हर आदमी अपने घर की सजावट अपने पसंद के रंगों से करता है। 

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के वजूद में आने के बाद रंगों के इस्तेमाल पर आपत्ति उठाई जा रही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश हज हाउस का रंग बदल गया है। उसका रंग पहले हरा और सफेद हुआ करता था, अब उसका रंग भगवा हो गया है। यह बात समाजवादी पार्टी को रास नहीं आ रही है। उसके नेता हज हाउस की दीवार का रंग बदलने को मुस्लिम समुदाय की भावनाओं से छेड़छाड़ करार दे रहे हैं। उनका आरोप है कि योगी आदित्यनाथ सरकार जान-बूझकर सरकारी कार्यालयों, स्कूलों की दीवारों को भगवामय बना रही है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ने इसका जवाब भी दिया है लेकिन यह जवाब सपा नेताओं को शायद ही रास आए क्योंकि उसके नेता चीजों को एक खास चश्मे से देखने के आदी हो गए हैं। सपा नेताओं का कहना है कि कुछ अधिकारी सरकार की चापलूसीवश दीवारों के भगवाकरण को अंजाम दे रहे हैं। अगर ऐसा है तो यह अधिकारियों का विवेक है। कार्यालय को चलाने का दायित्व अधिकारी का होता है। कार्यालय की साज-सज्जा का काम वह सरकार से पूछकर तो करता नहीं। अधिकारी अपनी पसंद कर्मचारियों को बताता है। सहमति होती है तभी साज-सज्जा का काम होता है। यह सच है कि साज-सज्जा में सरकारी धन प्रयुक्त होता है लेकिन कार्यालय का रख-रखाव, उसकी साज-सज्जा एक सामान्य प्रक्रिया है। अमूमन इसमें सरकार का कोई सीधा हस्तक्षेप भी नहीं होता। कुछ लोग अपने आगे या पीछे दीवार पर अपने आराध्य की तस्वीरें लगा लेते हैं। इस आधार पर सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। तस्वीरें लगाने का प्रावधान नहीं है लेकिन अगर कोई लगाता है तो इसमें आपत्ति जैसी कोई बात भी नहीं है। दीवारें हरी हैं, सफेद हंै, लाल हैं, नीली हैं, पीली हैं या भगवा हैं, इससे क्या फर्क पड़ता है? जनता के लिए जनता द्वारा चुनी गई सरकार जनता का हित कर पा रही है या नहीं,यह मायनेखेज तथ्य है। शोध और विश्लेषण तो इस पर होना चाहिए। रंगों को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

 

रंग धर्म भी है और कर्म भी है। रंग को रंग की तरह ही देखा जाए तो गनीमत है। सफेद रंग अपने आप में कुछ भी नहीं है लेकिन स्पेक्टम पर देखें तो वह सात रंगों का सम्मिलित स्वरूप है। जीवन में रंगों की बहुत अहमियत है। रंग न हो तो जिंदगी बदरंग हो जाती है। रंग है तो उमंग है। प्रकृति भी रंग-रंगीली है। उसका रंगीलापन आदमी ही नहीं, जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों में भी देखने को मिलता है। रंगों की विविधता बनी रहनी चाहिए। एक रंग निरंतर देखते रहने से नीरसता के भाव उत्पन्न होने लगते हैं। एक ही वस्तु को अलग-अलग रंगों में देखना व्यक्ति की मानसिक तर्कशीलता का इजहार करता है। यह व्यक्ति की सुरुचि का हिस्सा है। रंग का कोई स्थायी भाव नहीं होता। रंग बदले जा सकते हैं। रंग को लेकर राजनीति उचित नहीं है।

 

दुनिया में हर आदमी रंगों का शौकीन है। इसकी वजह यह है कि आंखें रंग ही देखती हैं। बदरंग चीजों को कोई देखना नहीं चाहता है। रंग ही हैं जो दृश्य को दर्शनीय बनाते हैं। रोचक बनाते हैं। तीर्थाटन और देशाटन के मूल में भी रंग ही हैं। रंग न होते, रंग कर्म न होते, रंग-ढंग न होते तो व्यक्ति एक ही जगह का होकर रह जाता। दुनिया भर के पर्यटक उद्योग खत्म हो जाते। दुनिया की नजरों में कई देश आ ही नहीं पाते। वैश्विकता की तो ऐसे में कल्पना ही नहीं होती। महाभारत समेत जितने भी युद्ध हुए, सबके अपने ध्वज होते थे। ये ध्वज कुछ खास रंग के होते थे। हर महारथी योद्धा के रथ पर एक खास ध्वज लहराता था। यह उसकी पहचान भी हुआ करता था और अभिरुचि का प्रतीक भी। अर्जुन के रथ पर कपिध्वज, कर्ण के रथ पर सूर्यध्वज ये प्रतीक थे। दुनिया के सभी देशों के अपने ध्वज हैं। और वे सभी खास रंगों से बने हैं। रंगों के अनुप्रयोग को लेकर भारत शुरू से ही बेहद शौकीन रहा है। आजादी की लड़ाई तिरंगे को आगे करके लड़ी गई थी। ऐसे में रंगों के इस्तेमाल पर सवाल वाजिब नहीं है। 

 

योगी का रंग या तो भगवा होता है या सफेद। सूफी संत का रंग हरा होता है लेकिन गृहस्थों का रंग उसकी पसंद का होता है। सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले गृहस्थ होते हैं। संत नहीं होते। वे अपने जीवन व्यवहार में अपनी पसंद के रंग ही पसंद करते हैं। उसे ही अपनाते हैं। अब रही बात सरकार बनने पर रंग बदलने की, पोस्टरों की शक्ल बदलने की तो यह आम बात है। जैसा राजा होता है, वैसी ही उसकी प्रजा होती है। योगी आदित्यनाथ संत हैं। उनका कार्यालय अगर भगवा होता है। उनका आसन भगवा होता है। कुर्सी का कपड़ा भगवा होता है तो यह बहस का विषय नहीं है। मायावती सत्ता में होती है तो शहर में लाइटें तक नीली हो जाती हैं। शहर में ज्यादातर पोस्टर नीले नजर आते हैं। सपा आती है तो उसके झंडे का रंग शहर के मन मस्तिष्क पर छा जाता है। लोहिया बसों पर समाजवादी पार्टी का रंग आपा अभी देख सकते हैं। जिसकी सरकार होती है, रंग तो उसका का होता है। पूजा विजेता की ही होती है। सपा और अन्य राजनीतिक दलों को समय का फेर समझना चाहिए। रहीम को याद करना चाहिए इन शब्दों में-‘रहिमन चुप हौ बैठिए, देख दिनन के फेर। जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर।’ रंग विषय नहीं है। विषय है दृष्टिबोध। हम क्या देखना चाहते हैं और क्या नहीं देखना चाहते हैं?

लखनऊ में हज समिति के कार्यालय की बाहरी दीवारें भी अब भगवा रंग में रंग गई हैं। इस कदम का विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। राजनैतिक पार्टियों का आरोप है कि सरकार जान-बूझकर मुसलमानों की भावनाओं को उकसा रही है। इसके विपरीत हज राज्य मंत्री मोहसिन रजा ने कहा है कि ऐसे मामलों को तूल देने की कोई जरूरत नहीं है। केसरिया रंग ऊर्जा का प्रतीक है। अब भवन अच्छा दिख रहा है। विपक्ष के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लिहाजा वह ऐसे मुद्दों को उछाल रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सुनील सिंह साजन की मानें तो सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए रंगों का खेल खेल रही है। अभी तक तो आश्रम भगवा रंग के होते थे, कार्यालय भवन नहीं। अधिकारी भी चापलूसी में लगे हैं। उन्होंने सरकार को रंगा सियार कह दिया है। रंगा सियार ज्यादा दिन नहीं छुप पाता है। उनका यह वाक्य सरकार पर सीधा आक्षेप नहीं तो और क्या है? वे राज्य मंत्री मोहसिन रजा पर भी चापलूसी कर अपनी कुर्सी बचाने का आरोप लगा रहे हैं। उनका सवाल है कि अगर विपक्ष के पास मुद्दा नहीं है, तो सरकार के पास कौन सा मुद्दा है? क्या विकास हो रहा है? मतलब असल लड़ाई रंग की नहीं है। असल लड़ाई एक खास मजहब के लोगों में अपने लिए जगह बनाने की है। विकास का श्रेय लूटने और दूसरे को धता बताने की है। नाकारा साबित करने की है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी पिछले दिनों योगी और मोदी सरकार पर चुनावी वादों को पूरा न कर पाने का आरोप लगाया था। उन्होंने तंज भरे अंदाज में ट्वीट किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो लोगों को चांद पर लोहिया आवास देगी। 

सवाल यह उठता है कि धरती पर तो जो विकास नहीं कर पाते, वही आसमान में विकास की सोचते हैं। विपक्ष को विरोध की राजनीति करनी चाहिए लेकिन विरोध के लिए विरोध और सकारात्मक विरोध के बीच का अंतर तो समझना ही चाहिए। बदलाव प्रकृति का नियम है। ब्दलाव की भाषा और संस्कार को समझे बगैर विकास का आधार तैयार नहीं होता, जब तक इस बात को समझा न जाएगा, तब तक इसी तरह बे सिर-पैर के मुद्दे हवा में उलझते और आम आदमी का समय खराब करते रहेंगे। उसे विकास पथ से भटकाते रहेंगे। 

-लेखक हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।

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